अब आते हैं 19 नवंबर 2021 पर. पीएम मोदी ने घोषणा की कि उनकी सरकार उन तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने जा रही है, जिनके खिलाफ किसान पिछले एक साल से दिल्ली की सीमाओं पर धरना दे रहे हैं. इस एक घोषणा के बाद अब सब कुछ बदलता नजर आ रहा है.
कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा के बाद वेस्टर्न यूपी में आरएलडी की राजनीति पर क्या असर होगा? सपा-आरएलडी गठबंधन का क्या होगा? आरएलडी की बार्गनिंग या कहें चुनाव में मोल-तोल करने की क्षमता घटेगी या बढ़ेगी? क्या इस बात की भी संभावना है कि आरएलडी बीजेपी के पाले में चली जाए? इन सारे सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं.
अखिलेश यादव की फाइल फोटो. (फाइल फोटो- PTI)अगले साल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, उत्तराखंड और मणिपुर. सीटों के लिहाज से उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा राज्य है. यहां विधानसभा की 403 सीटें हैं. पीएम के ऐलान से एक दिन पहले ही अमित शाह को पश्चिम उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गई थी. कहा जा रहा था कि किसान आंदोलन की वजह से बीजेपी को इस इलाके में बड़ा नुकसान होने वाला है.
CSDS के आंकड़ों के मुताबिक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 32 फ़ीसदी मुसलमान और 12 फ़ीसदी जाट हैं. किसानों में सबसे बड़ी आबादी जाटों की है. कहा गया कि तीन कृषि कानूनों की वजह से किसान आरएलडी के साथ जुड़ने लगे थे. पंचायत चुनाव में सपा और आरएलडी ने गठबंधन किया था. इसका असर भी देखने को मिला. इन चुनावों में सपा-आरएलडी को बढ़त मिली थी. लेकिन अब कहा जा रहा है कि कृषि कानून रद्द होने से बीजेपी के प्रति किसानों की नाराजगी कम होगी और वो उसके पाले में जा सकते हैं.
सीनियर पत्रकार केपी मलिक का कहना है,
मेरा मानना है कि तीनों कृषि कानून वापस लेने से RLD की राजनीति को नुकसान पहुंचेगा. क्योंकि किसान इन कानूनों को लेकर ही बीजेपी से छिटक रहे थे और आरएलडी के पाले में जा रहे थे. यहां एक बात का जिक्र जरूरी है. 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे की. इस दंगे से जाट और मुसलमानों के बीच कहीं ना नहीं खाई बन गई थी. किसान आंदोलन के जरिए ये खाई पटती नजर आ रही थी. लेकिन कानून रद्द होने से ये खाई एक बार फिर बढ़ेगी. क्योंकि दोनों पक्षों में खटास कम नहीं हुई है. नाराजगी अगर कम हो जाती है तो ये भारतीय जनता पार्टी के लिए फायदेमंद और आरएलडी के लिए नुकसान होगा.वहीं सीनियर पत्रकार शरद प्रधान का मानना है कि मोदी ने जिस उद्देश्य से ये कानून रद्द किया है वो 100 फीसदी पूरा नहीं होगा. उन्होंने कहा,
मोदी चाहते हैं कि उन्हें किसानों की वाहवाही मिल जाए. हालांकि ये जरूर है कि बीजेपी को जितना नुकसान हो सकता था, वो नुकसान अब कम होगा. लेकिन ऐसा नहीं है कि किसान बीजेपी के फेवर में उमड़ने लगेंगे. क्योंकि किसानों ने बहुत संघर्ष किया है. उन्हें आतंकवादी, अलगाववादी और खालिस्तानी कहा गया. ये सब वो इतना जल्दी कैसे भूल सकते हैं?

सीनियर पत्रकार केपी मलिक लल्लनटॉप को बताते हैं कि जाटों की पहली प्रायॉरिटी RLD हुआ करती थी, लेकिन चीजें धीरे-धीरे बदली हैं.
RLD के बाद अगर जाट किसी राजनीतिक पार्टी को पसंद करता है तो वो बीजेपी है. समाजवादी पार्टी को जाटों ने कभी पसंद नहीं किया. और ना ही कभी सपा के साथ गया. और ये बात अखिलेश को भी पता है. अखिलेश को ये भी पता है कि अगर आरएलडी की सीटें ज्यादा आ गईं तो वो चुनाव बाद बीजेपी के साथ भी बार्गनिंग कर सकते हैं. अखिलेश डरे हुए हैं कहीं ना कहीं, आरएलडी 30-32 सीटें मांग रही है. अखिलेश 20-22 सीटें देने को तैयार हैं, उसमें से भी उनका कहना है कि हमारे तीन-चार लोग RLD के सिंबल पर चुनाव लड़ेंगे.वहीं शरद प्रधान का कहना है,
अगर बीजेपी जयंत चौधरी को कोई लालच देती है तो ये देखना होगा कि वो क्या करते हैं. क्या वो अपने पिता की तरह फैसले लेते हैं. क्योंकि बीजेपी चाहेगी कि आरएलडी का गठबंधन सपा के साथ ना हो. पूरा प्रयास करेंगे कि आरएलडी उनके पाले में चली आए. इससे सपा को नुकसान हो सकता है. ये बहुत जल्द पता चल जाएगा. क्योंकि बीजेपी का अगला टारगेट वही होगा.हालांकि केपी मलिक का कहना है कि आरएलडी का मामला बहुत अच्छा है नहीं वेस्ट यूपी में. वहीं अजीत सिंह भी नहीं रहे. और अब ये जो कानून वापस हुए हैं, ये आरएलडी पर दूसरी चोट है. मलिक की मानें तो इससे आरएलडी की बार्गनिंग क्षमता घटेगी. ये भी हो सकता है कि सपा-आरएलडी का गठबंधन ना हो. या आरएलडी को बीजेपी में जाना पड़े.
हालांकि वो मानते हैं कि आरएलडी इलेक्शन से पहले बीजेपी के साथ नहीं आएगी, अगर आती है तो खत्म हो जाएगी. उनका कहना है,
वेस्टर्न यूपी में बागपत और उसके आसपास के क्षेत्र को देखें तो अपने हिसाब से ये संपन्न क्षेत्र हैं. बीजेपी ने पिछले सात सालों में काम किया है. जो रोड पिछले लंबे समय से नहीं बन रहे थे वो बने, बिजली ठीक हुई है, बाकी काम हो रहे हैं, ऐसे में जाटों को लगता है कि बीजेपी बुरा विकल्प नहीं है.शादाब रिजवी लंबे समय से वेस्टर्न यूपी में पत्रकारिता कर रहे हैं. उनकी राय बाकी दोनों पत्रकारों से अलग है. रिजवी का कहना है,
आरएलडी के लिए किसान आंदोलन एक संजीवनी की तरह था. लेकिन वापस होने के बाद जहां तक मुझे लगता है आरएलडी इसे अपनी जीत के तौर पर पेश करेगी. आरएलडी अब तक किसान आंदोलन को लेकर मुखर थी, लेकिन अब इसकी वापसी को लेकर मुखर होगी. वो लोगों को शहादत की याद दिलाएगी. घर-घर माहौल बनाएगी. ये बताएगी कि इस जीत में आरएलडी का कितना योगदान है.रिजवी के मुताबिक बीजेपी इस बात को लेकर माहौल जरूरी बनाएगी कि आरएलडी बीजेपी से मिल सकती है. हालांकि गठबंधन सपा के साथ रहेगा. फिलहाल खबर ये है कि 21 नवंबर को सपा और आरएलडी के बीच गठबंधन और सीटों के बंटवारे को लेकर ऐलान होना था जिसे कैंसिल कर दिया गया है.













