जब पार्वती का पुण्य हजार गुना बढ़ गया
शिव को बचाने के लिए पार्वती ने मगरमच्छ को दान किया अपना पुण्य. आगे खेल हो गया.
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फोटो - thelallantop
औपचारिक स्वयंवर नहीं हुआ था पर मां पार्वती भगवान शिव का वरण कर चुकी थीं. दोनों मन से एक दूसरे के हो चुके थे. प्रसन्न पार्वती एक चट्टान पर बैठ गईं. तभी शिव को लीला करने की सूझी. वह एक ब्राह्मण बालक का रूप धर के पास के तालाब में प्रकट हुए. उस समय उन्हें एक मगरमच्छ ने पकड़ रखा था. बालक की 'बचाओ बचाओ' की आवाज सुनकर पार्वती वहां पहुंचीं. पार्वती ने मगरमच्छ से रिक्वेस्ट की, 'ग्राहराज! यह अपने मां बाप का इकलौता बालक है. इसे छोड़ दो.' मगरमच्छ बोला कि छठे दिन को जो सबसे पहले मेरे पास आता है, मैं उसे खाता हूं. यही मेरा लंच-ब्रेकफस्ट सब है. मैं तो इसे नहीं छोड़ूंगा. तब पार्वती जी बोलीं कि मैंने हिमालय में जो कठिन तपस्या की है, उसका पुण्य तुम ले लो, बदले में इसे छोड़ दो. मगरमच्छ इस पर मान गया. देवी ने अपना सारा पुण्य मगरमच्छ को ट्रांसफर कर दिया, जिससे वह सूर्य की तरह चमकने लगा. तब मगरमच्छ के भीतर इंसानियत जाग गई. बोला कि देवी तुम महान हो, ऐसे मुश्किल से कमाया गया अपना पुण्य किसी को नहीं देना चाहिए. मैं इस बालक को भी छोड़ देता हूं और तुम्हारा पुण्य भी लौटा देता हूं. पार्वती ने कहा कि अब मैं अपना पुण्य आपको दे चुकी हूं. मेरे लिए कोई तपस्या ब्राह्मणों से श्रेष्ठ नहीं है. बालक को छोड़ दो और पुण्य भी तुमको मुबारक. मगरमच्छ बालक को छोड़कर अंतर्धान हो गया और देवी पार्वती ने दोबारा तपस्या शुरू कर दी. तभी भगवान शंकर प्रकट हुए और सारा राज खोलकर बोले कि अब तपस्या न करो देवी. तुमने अपना तप मुझे ही दिया है. वही अब हजार गुना होकर तुम्हारे लिए अक्षय हो जाएगा. इतना सुनकर पार्वती प्रसन्न हुईं और शिव को औपचारिक रूप से चुनने के लिए स्वयंवर की प्रतीक्षा करने लगीं. (ब्रह्म पुराण, गीता प्रेस, पेज 80,81)
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