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सरकारी आंकड़ों ने महंगाई का सच सामने ला दिया!

महंगाई पर बोले जयंत सिन्हा, लोगों ने ट्रोल कर दिया.

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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (फोटो: पीटीआई)

महंगाई है या नहीं, अब ये एक राजनैतिक मुद्दा है. सरकार के सांसद ये मानने को तैयार ही नहीं हैं कि महंगाई जैसा कुछ होता है और अगर होता है, तो भारत में भी होता है. दूसरी तरफ विपक्ष है, जिसके वित्तमंत्री जीएसटी काउंसिल में जाकर सीएसटी बढ़ने पर सहमति जता आते हैं. लेकिन उसी पार्टी के सांसद संसद सत्र में इसे मुद्दा बना लेते हैं. तो आम आदमी जाए कहां. किसकी बात पर भरोसा करे. कैसे मालूम करे कि भारत में महंगाई है कि नहीं. हम आपकी मदद करेंगे. आंकड़ों की बात करेंगे और उनके मायने भी आपको बताएंगे. तब आप फैसला कीजिएगा कि महंगाई के मुद्दे पर कौन सही, कौन गलत.

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एक छोटी सी बच्ची प्रधानमंत्री मोदी के नाम खत लिख रही है. ये कन्नौज की 5 साल की बच्ची कृति दुबे हैं. खत में लिखती है,  

"मेरा नाम कृति दुबे है. मैं कक्षा एक में पढ़ती हूं. मोदी जी आपने बहुत महंगाई कर दी है. यहां तक कि पेंसिल, रबड़ तक महंगी कर दी है. और मैगी के दाम भी बढ़ा दिए हैं. अब मेरी मां पेंसिल मांगने पर मारती हैं, मैं क्या करूं? बच्चे मेरे पेंसिल चोरी कर लेते हैं."

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एक छोटी सी बच्ची के खत ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित तब किया. जब देश में महंगाई पर चर्चा चल रही है. 1 अगस्त यानी कल लोकसभा में चर्चा हुई, 2 अगस्त यानी आज राज्यसभा में महंगाई पर देश के माननीय सांसद चर्चा कर रहे हैं. महंगाई के मुद्दे पर विपक्ष ने हल्ला बोला तो सत्ता पक्ष की तरफ से बचाव में कम दलीलें नहीं दी गईं. एक बयान झारखंड के हजारीबाग से बीजेपी सांसद जयंत सिन्हा ने भी दिया.

जयंत सिन्हा कहते हैं, गरीब की थाली आंकड़ों से नहीं वस्तुओं से भर गई है. चावल, दाल, सब्जी, दूध कुछ भी महंगा नहीं हुआ है. विपक्ष को इंगित करते हुए कहते हैं - आप महंगाई ढूंढ रहे हैं, आपको महंगाई मिल ही नहीं रही है, क्योंकि महंगाई है ही नहीं. हजारीबाग से ही जयंत सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा भी सांसद रहे हैं. अब वो भले ही सरकार के खिलाफ मुखर हों मगर 2009 में वो बीजेपी से ही चुनकर लोकसभा पहुंचे थे. तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. 2011 में लोकसभा में महंगाई पर बोलते हुए तब जयंत सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने विपक्षी नेता होने के नाते जो कहा, उस पर गौर करिए. हजारीबाग की जनता की बात रखते हुए उन्होंने कहा,

"मैं क्या खाऊं,मैं परिवार कैसे चलाऊं? मेरे पास उसे समझाने के लिए कोई तर्क नहीं है, क्योंकि मैं उसे यह भी नहीं कह सकता कि देश जो 8% की दर से ग्रो कर रहा है, तुम उसी ग्रोथ को खा लो, तुम्हारी भूख मिट जाएगी."

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यशवंत सिन्हा तब विपक्ष में थे, जयंत सिन्हा सत्ता पक्ष में है. विपक्ष और सत्ता के सुर हमेशा अलग होते हैं सो यहां भी है. अब जयंत सिन्हा के बयान से आप कितना इत्तेफाक रखते हैं, हम ये नहीं जानते हैं. मगर महंगाई है ही नहीं, इस बात से कम से कम हम इत्तेफाक नहीं रखते हैं. वजह को हम विस्तार से आपको बताते हैं. क्योंकि सत्ता पक्ष के नेता भले ही कुछ बोलें, मगर लिखित में तो सरकार भी मानती है कि पिछले सालों की तुलना में मंहगाई बढ़ी है. सरकार के ही नेता कहते हैं हमने मुफ्त में राशन दे दिया. अब हर किसी को राशन तो फ्री में मिलता नहीं, मगर जिसे मिलता भी है, उसे राशन को पकाने के लिए गैस भी चाहिए. तो सबसे पहले हम गैस पर ही आ जाते हैं. बाकी वस्तुओं पर बारी-बारी से प्रकाश डालेंगे.

यूपी के श्रावस्ती से BSP सांसद राम शिरोमणि वर्मा ने सरकार से पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम में हुई वृद्धि पर तीन साल का ब्योरा मांगा. 28 जुलाई को नरेंद्र मोदी सरकार में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री रामेश्वर तेली ने लिखित में बताया.

- 1 अगस्त 2019 को घरेलू LPG सिलेंडर 574 रुपये 50 पैसे का था
- 12 फरवरी 2020 को दाम बढ़कर 858 रुपये 50 पैसे हो गया
- 1 जुलाई 2020 को दाम घटकर 594 रुपये का हुआ  
- 1 जुलाई 2021 को LPG सिलेंडर बढ़कर फिर से  834 रुपये 50 पैसे हुआ
- 22 मार्च 2022 को 949 रुपये 50 पैसे
- 7 मई 2022 को 999 रुपये 50 पैसे
- 19 मई 2022 को 1003 रुपये
- 6 जुलाई 2022 को दाम रिकॉर्ड 1053 रुपये पहुंच गया

सनद रहे - ये दाम राजधानी दिल्ली का है, देश के कई दूसरे राज्यों में दाम और ज्यादा हैं. आंकड़ों पर नजर डालेंगे तो विगत 3 साल के भीतर LPG सिलेंडर का दाम लगभग दोगुने के बराबर हो गया. यानी सरकार आंकड़ों के जरिए लिखित में साफ बता रही है कि महंगाई बढ़ी है. मगर सत्ता पक्ष के नेता और  पूर्व वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा कहते हैं महंगाई कहीं नहीं है. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम का भी फर्क पड़ा है. इससे इनकार नहीं, मगर केंद्र सरकार ने सब्सिडी भी कम कर दी, जिससे बोझ आम आदमी के कंधे पर पड़ा. इसे लेकर सरकार द्वारा जारी आंकड़ों पर गौर कीजिए-

केंद्र सरकार LPG सिलेंडर पर 3 तरह की सब्सिडी देती है.
- Direct Benefit Transfer for LPG जिसको सरकारी भाषा में DBTL सब्सिडी कहते हैं. 
- दूसरी प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की सब्सिडी जिसको PMUY सब्सिडी कहते हैं. 
- तीसरी, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज यानी PMGKP सब्सिडी. जो 2020-21 यानी कोरोना काल में शुरू हुई.

इन तीनों तहत मिलने वाली सब्सिडी का ब्योरा  केरल से CPIM के राज्यसभा सांसद डॉ. वी शिवदासन ने सरकार से लिखित में मांगा.  1 अगस्त यानी कल ही, इसका भी जवाब पेट्रोलियम राज्य मंत्री रामेश्वर तेली ने लिखित में दिया. जिसके मुताबिक साल 2017-18 में डारेक्ट सब्सिडी 20 हजार 905 करोड़ की दी गई, इसी साल उज्जवला योजना के तहत 2 हजार 559 करोड़ की सब्सिडी दी गई. दोनों को मिलाकर उस वित्त वर्ष में कुल 23 हजार 464 करोड़ रुपये की सब्सिडी LPG सिलेंडर पर दी गई.

फिर आता है चुनावी साल. 2018-19 का वित्त वर्ष. इस बार डायरेक्ट सब्सिडी 31 हजार 539  करोड़ और उज्जवला योजना के तहत 5 हजार 670 करोड़ की सब्सिडी दी गई. कुल सब्सिडी हो गई 37 हजार 209 करोड़. पिछले साल की तुलना में इस बार सब्सिडी बढ़ गई. तब सिलेंडर के दाम भी 700 रुपये के आस-पास ही रहे.मगर चुनावी साल के अगले वित्त वर्ष से ही सब्सिडी घटना शुरू हो गई. 2019-20 में डायरेक्ट सब्सिडी 22 हजार 726 करोड़ और उज्जवला की सब्सिडी 14सौ 46 करोड़ रुपये दी गई. कुल सब्सिडी रही 24 हजार 172 करोड़. ना सिर्फ डायरेक्ट सब्सिडी कम हुई, बल्कि गरीबों को मिलने वाली उज्जवला सब्सिडी भी 56 सौ करोड़ से घटकर 14 सौ करोड़ पर आ गई.

इधर सिलेंडर के बढ़ना शुरू हुए, उधर 2020-21 के साल में सब्सिडी और कम हो गई. डायरेक्ट सब्सिडी पिछले साल के 22 हजार करोड़ की जगह अब सिर्फ 3 हजार 658 करोड़ रह गई. और उज्जवला की सब्सिडी मात्र 76 करोड़ रुपये ही दी गई. इसकी जगह प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत 8 हजार 162 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई. फिर भी कुल सब्सिडी 11 हजार 896 करोड़ ही रही. आंकड़े उलाझा देते हैं. मगर आप उलझिएगा मत. कुल जमा बात ये है कि 2018-19 के चुनावी साल में जो सब्सिडी 31 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा थी, वो अब घटकर 11 हजार करोड़ के पास पहुंच गई. और फिर आता है वित्त वर्ष 2021-22 का. इस साल कुल सब्सिडी दी गई मात्र 242 करोड़. उज्जवला योजना वाले लोगों को सब्सिडी नहीं मिली. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत भी शून्य सब्सिडी दी गई. और इस वक्त तक गैस सिलेंडर के दाम 900 रुपये को क्रॉस कर गए.

मोटा-माटी इन आंकड़ों को समझे तो मिलता ये है कि चुनावी साल 2018-19 में जिस गैस सिलेंडर पर 31 हजार करोड़ से ज्यादा की सब्सिडी दी जा रही थी, वो 2022 आते आते  घटकर मात्र 242 करोड़ रुपये रह गई. सरकार के आकड़ों के मुताबिक देशभर में LPG उपभोक्ताओं की कुल संख्या करीब 30 करोड़ है. मतलब 30 करोड़ लोग गैस सिलेंडर का इस्तेमाल करते हैं. अगर इनमें 2020-21 में मिली 242 करोड़ की सब्सिडी को बराबर-बराबर बांट दिया जाए. माने 242 करोड़ भागा 30 करोड़. तो हर व्यक्ति को पिछले साल 8 रुपये की सब्सिडी मिली. जी हां, 8 रुपये की. महीने की नहीं, साल की. महीने का जोड़ेंगे तो यही को प्रति महीना 66 पैसे बैठेगा.

इसी 66 पैसे की सब्सिडी के दम पर देश का सामान्य आदमी अपनी जरूरत में इधर-उधर से कटौती कर हजार रुपये के करीब का सिलेंडर भराता रहा. और सरकार के नेता, मंत्री, सांसद कह रहे हैं मंहगाई तो है ही नहीं. हम यहां ये बिलकुल क्लियर कर देते हैं, कि हमने ये औसत निकला है. बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो स्वेच्छा से प्रधानमंत्री मोदी की अपील पर सब्सिडी छोड़ चुके हैं. लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है, जो सब्सिडी चाहते हैं, लेकिन उन्हें एक भी पैसे की सब्सिडी नहीं मिली.

खैर! मीडिल क्लास तो फिर फिर जैसे-जैसे सिलेंडर भरा ले रहा है. मगर गरीब आदमी क्या करे ? उसके पास कटौती करने के लिए कुछ हाथ में होना भी चाहिए. इससे भी जुड़ा एक सवाल राज्यसभा में 1 अगस्त यानी कल ही कांग्रेस सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे और प्रमोद तिवारी ने पूछा. कि क्या ये यह सच है कि पिछले वित्त वर्ष में 3 करोड़ 59 लाख घरेलू LPG ग्राहकों ने एक बार भी सिलेंडर रिफील नहीं करवाया? जवाब क्या मिला, बताते हैं. थोड़ा ये समझ लीजिए कि ये सबुकछ लिखित में हुआ सवाल जवाब है. सांसद कई सवाल लिखित में पूछते हैं, जो संसद की कार्यवाही में टीवी पर नजर नहीं आता. लेकिन ये संसद के रिकॉर्ड में शामिल होता है. और लोकसभा और राज्यसभा की वेबसाइट पर देखा जा सकता है. हमने वहीं से सवाल और उनके जवाबों को प्राप्त किया है. लौटते हैं सिलेंडर या टंकी भरवाने की बात पर.

तो सिलेंडर रिफिल ना कराने वाले सवाल के जवाब में पेट्रोलियम राज्य मंत्री रामेश्वर तेली ने बताया कि वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान 30 करोड़ 53 लाख सक्रिय घरेलू ग्राहकों में से 2 करोड़ 11 लाख ग्राहकों ने कोई रिफिल नहीं कराया. मतलब ये, कि 2 करोड़ से ज्यादा लोग ऐसे रहे जो एक बार भी हजार रुपये के करीब का सिलेंडर भरा पाने में असमर्थ रहे. और तो और 2 करोड़ 92 लाख ग्राहक ऐसे रहे, जो साल में सिर्फ 1 बार सिलेंडर भरा पाए.

आप इसी से आम लोगों की आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं. करीब 5 करोड़ लोग या तो सिलेंडर भरा नहीं पा रहे और भरा पा रहे तो सिर्फ एक बार. और ये सिर्फ उज्जवला योजना के आंकड़े नहीं है, इसमें सभी तरह के लोग शामिल हैं. 1 करोड़ से ज्यादा ऐसे लोग हैं, जो सामान्य कनेक्शन का इस्तेमाल करते हैं.

अब उज्जवला योजना की बात करते हैं. 2017-18 में उज्जवला योजना शुरू हुई. योजना वाकई परिवर्तनकारी थी. गरीब को धुएं से निजात दिलाने वाली. मगर उन्हें गरीबी  से निजात दिलाने वाली कोई योजना उन तक नहीं पहुंच पाई. हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि रामेश्वर तेली के ही जवाब में ये भी पता चला कि उज्जवला योजना शुरू होने के 5 साल में 4 करोड़ से ज्यादा लाभार्थी ऐसे रहे जिनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं बन पाई कि वो एक बार भी गैस सिलेंडर भरा सकें. उनके पास उज्जवला का सिलेंडर तो है, मगर उसमें गैस नहीं. चूल्हे का धुआं है. अब सरकार ने कहा है कि इस वित्त वर्ष में उज्जवला योजना के तहत 200 रुपये की सब्सिडी 12 सिलेंडर की भरवाई पर दी जाएगी. मगर इस दयनीय स्थिति में भी तुर्रा ये कि बीजेपी सरकार के सांसद, संसद भवन के भीतर तर्क देते हैं कि महंगाई है ही नहीं.

गैस सिलेंडर हो गया, अब पेट्रोल-डीजल पर आ जाते हैं. पेट्रोलियम राज्य मंत्री रामेश्वर तेली ने एक लिखित जवाब में बताया कि वित्त वर्ष 2021-22 में पेट्रोल के दाम 78 बार और डीजल के दाम 76 बार बढ़ाए गए. दिल्ली में जो पेट्रोल 2019-20 में 72 रुपये लीटर था, वो 20 जुलाई 2022 को बढ़कर 100 रुपये हो चुका है. यही हाल डीजल का है. 2019 में जो डीजल 65 रुपये का था, वो जुलाई 2022 में 92 रुपये का हो गया है.  

खाद्य पदार्थों की बात करें  तो 23 मार्च 2022 को लक्ष्यद्वीप से NCP सांसद मोहम्मद फैजल ने खुदरा मूल्य वृद्धि पर सवाल पूछा था. 2021 में महंगी हुई वस्तुओं का ब्योरा मांगा. इसके जवाब में उपभोक्ता मामलों के राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने लिखित में स्वीकार किया कि चीजों के दाम बढ़े हैं. किस वस्तु का कितना दाम बढ़ा ये तो नहीं बताया मगर जो चीजें महंगी हुई उसकी लिस्ट जरूर जारी की. वो आपके सामने हैं. चना दाल, मसूर दाल, मूंगफली का तेल, सरसों का तेल, वनस्पति ऑयल, सोया ऑयल, सूरजमुखी का तेल, पॉम ऑयल, टमाटर, चीनी, गुड़, दूध, चाय, नकम सबकुछ महंगा हुआ. ये खुद सरकार ने लिखित में माना, मगर सत्ता पक्ष के सांसद अब पूछते हैं महंगाई कहां है? जबकि आम आदमी पूछ रहा है सब्जी कैसे खरीदें, बहुत महंगी है.

आम आदमी की इसी व्यथा पर विपक्ष लगातार हमलावर है. आज सरकार राज्यसभा में भी निशाने पर रही. मनोज झा पालने से लेकर कब्र तक GST की होने की बात कहते हैं, हालांकि कल ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने साफ किया कि किसी भी तरह के क्रिमेशन पर कोई कर नहीं लगाया गया, जो कि राहत की बात है. वित्त मंत्री ने ये भी साफ किया देश पर मंदी का कोई खतरा नहीं है. आज मनोज झा के तर्कों का जवाब, बीजेपी के सुधांशु त्रिवेदी ने अपने तर्कों से दिए.

ये बात सही है कि महंगाई के कई कारण हैं. उन कारणों और उसके निवारण पर चर्चा हो सकती है. सरकार कदम भी उठा सकती है. क्योंकि इस साल की शुरुआत से देश में महंगाई आरबीआई द्वारा निर्धारित ऊपरी सीमा से 6% के ऊपर बनी हुई है. होनी तो वैसे 4 फीसदी के करीब चाहिए, लेकिन अब सारी बातचीत 6 फीसदी के आसपास ही होती है. जून में खुदरा महंगाई दर 7.01 फीसदी दर्ज की गई है. खुदरा महंगाई दर मई में 7.04% रही, जो अप्रैल में 7.79% पर पहुंच गई थी. मतलब महंगाई थोड़ी कम हुई है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जून महीने में थोक महंगाई की दर 15.18 फीसदी रही. यह मई के 15.88 फीसदी की तुलना में कम है. साल भर पहले की तुलना में देखें तो महंगाई अभी भी ठीक-ठाक ऊपर है. जून 2021 में थोक महंगाई की दर 12.07 फीसदी रही थी. महंगाई को कम करने के लिए आरबीआई दो किस्तों में रेपो रेट में 90 बेसिस अंक का इजाफा कर चुका है. साथ ही अप्रैल और जून की बैठकों में आरबीआई 2022-23 के लिए मंहगाई के अनुमान को संशोधित कर 6.7 प्रतिशत कर दिया है. 5 अगस्त को आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक होने वाली है. माना जा रहा है कि आरबीआई फिर से रेपो रेट में इजाफा करेगा. ताकि नगदी को समेटा जा सके और महंगाई को काबू में लाया जा सके. सरकार और RBI दोनों महंगाई कम करने में लगे हुए हैं.

सरकार, विपक्ष और एक्सपर्ट की बात के बाद अब आ जाते हैं देश के आम जनमानस की तरफ. जो जनता पिछली सरकारों में महंगाई पर उबाल मारने लगती थी, उसके बीच महंगाई को लेकर अब कैसा विमर्श होता है? महंगाई है, तो सबको महसूस होनी चाहिए. सिवाय तीन प्रकार के लोगों के
>पहले वो जिनकी कमाई महंगाई से ज्यादा तेज़ी से बढ़ी है
>दूसरे वो, जो दाम बढ़ने पर जरूरत घटा लें
>तीसरे वो, जो इतने गरीब हैं कि उनके लिए महंगा सस्ता सब बराबर है.

इन तीन के अवाला जो लोग बचते हैं, उनके दो खेमे हैं-
>एक वो जो सरकार के साथ
>दूसरे वो जो सरकार के खिलाफ

जो साथ हैं, वो अपनी सरकार के खिलाफ कैसे बोलें और जो विरोधी हैं उनकी बात दो आधार पर खारिज हो जाती है - कि तुम्हारे समय में भी महंगाई थी तब क्यों चुप थे, दूसरी ये कि तुम महंगाई नहीं सरकार का विरोध कर रहे हो. इतने सारे कैप लग जाने के बाद जो बच जाते हैं, वही आम नागरिक हैं. उनके सामने सवाल है कि ऐसी स्थिति में कहें तो किससे कहें? करें तो क्या करें? अब भी अगर किसी को महंगाई के मुद्दे के महत्वहीन हो जाने पर कोई जवाब चाहिए तो वो ये समझ ले कि, भारत में महंगाई, गरीबी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और सामाजिक सुरक्षा - विशुद्ध रूप से राजनीतिशास्त्र के विषय हो चले हैं. पॉलिटीशियन इस पॉलिटिकल इकॉनमी का इस्तेमाल वोटर के बाजार में वोट की लिक्विडिटी घटाने या बढ़ाने के लिए करते हैं. अर्थशास्त्री बेचारे, टिप्पणी से ज़्यादा कुछ नहीं कर पाते. 

वीडियो: बीजेपी बोली 'महंगाई नहीं', लेकिन सरकार के लिखित बयान ने सच सामने ला दिया!

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