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गोवा में बीफ बैन न होने से गुस्सा संजू ने बुआ की बिटिया को हुसड़ के तमाचा क्यों मारा

और गोहत्या विरोध वाले सेठ ने बछड़े की खाल का जूता क्यों बेचा...

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गोवा में गाएं

सड़क पर तेजी से जा रहा संजू पिछले पांच मिनट से भुनभुना रहा था. 'आज देखता हूं कि कैसे नहीं चॉकलेट देते हैं. पैसे ही चाहिए होते हैं न इनको. आज देता हूं मैं. जब अपनी दुकान है, तब तो इतना परेशान करते हैं. किसी और की दुकान से चॉकलेट खरीदने के पैसे मांग लेता, तो पता नहीं क्या करते. आज दिखाऊंगा इन्हें.'

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संजू वैसे ही चला जा रहा था, जैसे बेन चलती है. बेन तो देखी होगी न. 8-10 पैरों वाला छोटा सा कीड़ा. सारे पैर तेजी से एक साथ चलते हैं, पर कुछ घंटों बाद भी वो आपको वहीं मिलेगा, जहां आपने उसे छोड़ा होगा. खैर, संजू धीरे-धीरे पापा की दुकान की तरफ बढ़ रहा था.

उसके पापा की कन्फेक्शनरी की दुकान है. शहर में सबसे बड़ी. मिल्की बार से लेकर शक्कर लिपटे वाले कंपट तक. उनकी दुकान पर सब मिलता है. शहर से बाहरी तरफ जो दुकानें हैं, वो भी उनकी दुकान से ही चॉकलेट वगैरह खरीदकर ले जाते हैं. संजू के पापा को बड़ा गर्व है इस बात का. धंधा चमक रहा है.

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हीरोगिरी सोचते-सोचते संजू दुकान पहुंच गया. वो दुकान में ऐसे घुसा, जैसे कोई कस्टमर घुसता है. अपनी मर्जी से. हाथ उठाकर काउंटर पर रखा और मुट्ठी खोल दी. मुड़कर रोल बन चुकी 20 की एक नोट थोड़ी खर-खर की आवाज के साथ खुल गई. 'चॉकलेट... वो वाली'. संजू अपने पापा की तरफ देखकर बोला और फिर तुरंत निगाह अरुण की तरफ कर दी. जैसे कह रहा हो कि उठो और निकालकर दो. पापा की निगाह कुछ तीखी हो गई.

अरुण को समझ नहीं आया कि वो बड़े मालिक की सुने या छोटे मालिक की. इस पचड़े में वो अक्सर पिसता था. जो रोटी दे रहा है, उसकी तो सुननी ही है. लेकिन संजू बच्चा था. अरुण अक्सर प्यार से उसके लिए टॉफी ले आता था दुकान से. पापा की निगाह बचाकर. पर डरता बहुत था. पापा सख्त-मिजाज थे. कभी-कभी हाथ भी उठा देते थे.

उस दिन तो संजू बागी-मूड में था. उसके पापा उसे कभी चॉकलेट नहीं खाने देते थे. न अपनी दुकान से देते थे और न कहीं और से लेने देते थे. पापा जो भी सोचकर ऐसा करते हों, संजू को यही लगता था कि वो पैसे बचाने के लिए ऐसा करते हैं. इसी जिद में आज उसने मम्मी से पैसे मांगे थे.

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'चलो, घर जाओ.' पापा ने वो 20 की नोट जेब में डालते हुए संजू से कहा. संजू अवाक्. रुआंसा होकर बोला, 'अरे पैसे तो दे दो.' पापा मुस्कुराए और बोले, 'चलो घर जाओ.' वो टिप-टिप आंसू बहाता हुआ घर चला आया. मम्मी से नज़र बचाकर अपने कमरे में घुस गया और शाम तक वहीं पड़ा रहा.

अगली सुबह दिल्ली वाली बुआजी आईं. अपनी बेटी के साथ. घर में जश्न सा माहौल था. फूफा नहीं आए थे लेकिन. वो पापा से सामने तो बड़ा हंसते-खेलते मिलते थे, लेकिन पीठ-पीछे दोनों एक-दूसरे को नीचा दिखाया करते थे. अपनी-अपनी चठियाबाजी में. पापा कहते कि बुआ की शादी में उन्होंने जैसा इंतजाम किया था, वैसा तो फूफा के घरवालों ने कभी देखा ही नहीं था. फूफा कहते थे कि उन्होंने पापा से ज्यादा मेहनत की. इतनी ज्यादा कि दिल्ली में मुकाम बना लिया.

छोटे शहरों में रिश्तेदारियां होती ही ऐसी हैं. दोनों अच्छा कमाने-खाने वाले थे, तो अपने-अपने हिस्से का इगो दोनों के पास था.

शाम को पापा बुआ को लेकर दुकान गए. बेटी भी साथ में थी. पापा ने उसे गोद में बिठाया और अपने हाथ से चॉकलेट खिलाने लगे. बिटिया खिलखिला रही थी. उसे देख-देखकर दुकान में खड़े संजू का कलेजा रोया जा रहा था. 'इन्हें देखो. अपने बच्चे को कुछ नहीं देते हैं और कोई बाहर से आ जाए, तो उस पर इतना प्यार लुटाते हैं.' बच्चा था. बिफर पड़ा. तेजी से पापा के पास गया और खींचकर बिटिया को तमाचा जड़ दिया. बुआ उसी रात वापस चली गईं और फिर कभी नहीं आईं. संजू के माथे पर पर एक निशान सालों तक बना रहा. थोड़ा-थोड़ा अब भी दिखता है.


अरे हां, खबर ये है कि गोवा के पर्यटन-मंत्री मनोहर अजगांवकर ने गोवा में बीफ पर प्रतिबंध से इनकार किया है. उन्होंने कहा, 'गोवा में बीफ-बैन नहीं है. पर्यटक जो चाहेंगे, उन्हें मिलेगा. वो जो चाहे खा सकते हैं. यही वजह है कि गोवा में टूरिज्म रेवेन्यू पर कोई असर नहीं पड़ा है.'


चलते-चलते

लड़ाई शास्त्रों की भी आपस में होती है. अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ़ बैठता है, तब गोरक्षा आंदोलन के नेता पंडित द्वारका नाथ जूतों की दुकान खोल लेते हैं और 'कॉफ लेदर' (बछड़े का चमड़ा) के जूते बेचते हैं. गाय के बछड़े के चमड़े के जूते को हाथ में भागवत की तरह लेकर ग्राहक से कहते हैं, 'ये जूता बड़ा मुलायम होता है. पहले 'कॉफ लेदर' विलायत से आता था, पर अब अपने देश में भी उतरने लगा है. अपना देश भी काफी आगे बढ़ गया है.'

सड़क पर जुलूस में होते, तब कहते हैं, 'गोहत्या के कारण देश गिर गया है.' दुकान पर होते, तब कहते हैं, 'बछड़े का चमड़ा उतरने के कारण देश आगे बढ़ गया है.' दोनों ही बातें सही हैं. देश गिरा जरूर, पर फिर घिसटता हुआ आगे भी बढ़ा और उनके कारखाने तक आ गया. वहां उन्होंने देश का चमड़ा उतारकर उसके जूते बना लिए और बेचने लगे. - संस्कारों और शास्त्रों की पढ़ाई, हरिशंकर परसाई

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