The Lallantop

क्या है कोयले का गैसिफ़िकेशन, जिसके इस्तेमाल से पेट्रोल सस्ता हो जाएगा?

देश में कोयले के बड़े स्तर पर गैसिफ़िकेशन की तैयारी चल रही है

Advertisement
post-main-image
कोयले के खदान की प्रतीकात्मक तस्वीर. (फ़ोटो- बिज़नेस टुडे)
पेट्रोल के बढ़ते दामों से हम सब जूझ रहे हैं. सरकार भी इसे लेकर परेशान है. इस समस्या से निजात पाने के लिए सरकार हर तरह के उपायों पर विचार कर रही है. पेट्रोल के दामों में कमी लाने के लिए इसमें एथनॉल और मेथनोल को 15-20 फीसदी तक मिलाने की बातें भी चर्चा में हैं. लेकिन सवाल यह है कि इतना ज्यादा एथनॉल और मेथनोल आखिर आएगा कहां से? इस सवाल के जवाब के तौर पर भारत सरकार ने हाल ही में कोल यानी कि कोयले के गैसिफ़िकेशन (Gasification of Coal) पर एक दस्तावेज जारी किया है. सरकार का मकसद है कि साल 2030 तक कोयले के गैसिफ़िकेशन के जरिए एथनॉल, मेथनोल और सिंथेटिक गैसों  का बड़े स्तर पर उत्पादन किया सके. यानी 'कोयले का गैसिफिकेशन' वह तकनीक है जिससे ज्यादा से ज्यादा एथनॉल और मेथनोल बनाया जा सकता है. अब यहां से कुछ और सवाल उठते हैं कि कोयले का गैसिफ़िकेशन आख़िर क्या है? क्या अब तक सरकार जिस तरह से कोयले का इस्तेमाल कर रही थी, उसमें इस तकनीक का इस्तेमाल नहीं होता था? क्या इसके आने से कुछ आमूल-चूल बदलाव हो जाएगा? आइए इन सभी सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं. क्या है गैसिफ़िकेशन? कोयले का गैसिफ़िकेशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कोयले को ऑक्सीजन, भाप या कार्बन डाइऑक्साइड द्वारा ऑक्सीडाइज किया जाता है. लेकिन इसमें कोयले को जलाया नहीं जाता है. ऑक्सीडाइज को आसान शब्दों में ऐसे समझें कि इसे आंशिक रूप से जलाकर इससे निकलने वाली ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसा इस वजह से किया जाता है ताकि ईंधन-गैस बनाई जा सके. इस गरम ईंधन गैस को भाप बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इस ईंधन से कई तरह के ईंधन और केमिकल भी बनाए जाते  हैं. गैसिफ़िकेशन का इंतिहास काफ़ी पुराना है. 1800 के दशक में इसकी शुरुआत हुई थी. पहला पेटेंट जर्मनी की एक कंपनी LURGI GmbH को साल 1887 में मिला था. 1940 में, यूरोप और अमेरिका दोनों ने सड़कों पर स्ट्रीट लाइट जलाने के लिए कोयले की गैसिफ़िकेशन तकनीक का इस्तेमाल किया था. तब से लेकर अब तक, इस तकनीक का बहुत विकास हो चुका है. दुनियाभर में कोयले के गैसिफ़िकेशन को मेथनॉल, अमोनिया, एथनॉल और बिजली बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. भारत में 344 बिलियन टन कोयला है अब बात भारत की. भारत सरकार द्वारा जारी मिशन दस्तावेज के मुताबिक़ भारत में लगभग 344 बिलियन टन कोयले का एक विशाल भंडार है. इसमें से अब तक करीब 163 बिलियन टन कोयला ही हम ढूँढ पाए हैं. दस्तावेज आगे बताता है कि फ़िलहाल जिस दर से खपत चल रही है, उसके हिसाब से अगले 5 दशकों से भी ज़्यादा समय तक ये कोयला चलेगा. ऐसे में कोयले को दूसरी तरह से इस्तेमाल करने के रास्ते खुले हैं. इसमें से गैसिफ़िकेशन सबसे आसान, किफ़ायती और पर्यावरण के लिए बेहतर माना जाता है. अगर अभी की बात करें तो भारत में 80 प्रतिशत कोयले का इस्तेमाल थर्मल पावर प्लांट में बिजली बनाने के लिए होता है. थर्मल पावर प्लांट में कोयले को जलाया जाता है. लेकिन गैसिफ़िकेशन कोयले को जलाने की तुलना में न सिर्फ़ एक स्वच्छ विकल्प माना जाता है, बल्कि इससे ऊर्जा के अन्य श्रोत भी बनाए जा सकते हैं. क्रूड ऑयल का विकल्प भी है गैसिफ़िकेशन कोयले के गैसिफ़िकेशन से ऐसे कई तरह के केमिकल बनाए जाते हैं, जो आम तौर पर भारत में क्रूड ऑयल से बनते हैं. ऐसे में गैसीफिकेशन क्रूड ऑयल का विकल्प बन सकता है. भारत में मेथनोल को बनाने के लिए नैच्युरल गैस का इस्तेमाल होता है. लेकिन चीन और दुनिया के कई और देश कोयले के गैसिफ़िकेशन से मेथनोल बना रहे हैं. भारत सरकार की एक एजेन्सी- ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड (BIS) ने बताया था कि 15 प्रतिशत मेथनोल का इस्तेमाल पेट्रोल में किया जा सकता है. ऐसे में मेथनोल की ज़्यादा तादाद में ज़रूरत पड़ेगी. और ये कोयले के गैसिफ़िकेशन से उपलब्ध हो पाएगा. इसके अलावा मेथनोल का इस्तेमाल दवाई बनाने के लिए भी किया जाता है. 2003 से भारत में एथनॉल पेट्रोल में 5 प्रतिशत मिलाया जाता है. 2030 तक सरकार ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल मिलाने का टार्गेट सेट किया है. एथनॉल को बड़ी आसानी से सिन्थेटिक गैस से बनाया जा सकता है. सिन्थेटिक गैस कोयले के गैसिफ़िकेशन से बनती है. फ़िलहाल भारत में एथनॉल गन्ने, तिलहन आदि फसलों से बनाया जाता है. कई शोध बताते हैं की ज़्यादा एथनॉल इसलिए भी नहीं मिल पाता है क्योंकि इसको बनाने में फसलों का इस्तेमाल होता है. बनाने की प्रोसेस के दौरान फसलों की बर्बादी ज़्यादा हो जाती है और फिर ये फसलें किसी इस्तेमाल में नहीं ली जा सकती हैं. इसके अलावा हाइड्रोजन, यूरिया, DAP जैसी चीजें, जो खेती में इस्तेमाल होती हैं, वो भी कोयले के गैसिफ़िकेशन से बनाई जाती हैं. स्टील यानी कि इस्पात इंडस्ट्री में भी इसका बड़ा योगदान है. चीन और जापान में होता है इस्तेमाल अगर बात दुनिया के अलग-अलग देशों की करें तो, काफ़ी देशों में इसका इस्तेमाल हो रहा है. गैसीफिकेशन का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल चीन कर रहा है. चीन इसे अपने कई उद्योगों में इस्तेमाल करता है. उदाहरण के लिए चीन दुनियाभर में बनाए जाने वाले मेथनोल का 54 प्रतिशत हिस्सा बनाता है. इसका सबसे प्रमुख कारण गैसिफ़िकेशन तकनीक का इस्तेमाल है. चीन के अलावा जापान ने भी इस पर काफ़ी शोध किया है. ख़ास कर की फ़ूकूशीमा में 2011 में हुए हादसे के बाद. जापान में वर्तमान में इस तकनीक का इस्तेमाल करके 800 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा रहा है. लेकिन अगर बात अमरीका की करें तो, भले ही वहां शुरुआत 1900 के दशक में हो गई थी. लेकिन उसके बाद इस तकनीक का ज़्यादा इस्तेमाल नहीं किया गया. साल 2000 में अमेरिका ने 25 गैसिफ़िकेशन प्लांट बनाने की बात कही थी, लेकिन अब तक सिर्फ़ 2 ही बन पाए हैं. भारत में कहां-कहां गैसिफ़िकेशन का इस्तेमाल हो रहा है? भारत ने 1960 की दशक में झारखंड के सिंदरी में कोयले की गैसिफ़िकेशन यूनिट खोली गई थी. जो बाद में बंद कर दी गई. जिंदल ने ओड़िशा के अंगुल में प्लांट बनाया था, लेकिन वो भी बंद हो गया. लेकिन वर्तमान में इस दिशा में काफ़ी प्रगति हुई है. भारत हेवी एलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड में तमिलनाडु के त्रिची में पाइलट प्रोजेक्ट चलाया है, जिसमें 6.2 मेगावाट बिजली बनाई जा रही है. इसके अलावा थरमैक्स नाम की एक कंपनी ने NITI आयोग के दिशा-निर्देशों के मुताबिक़ साल 2014 से मेथनोल बनाने के लिए गैसिफ़िकेशन तकनीक का इस्तेमाल कर रही है. इसके अलावा ओड़िशा के तालचर में और पश्चिम बंगाल के डांगकुनी में स्थित कुछ कंपनियां भी इस तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं.

Advertisement
Advertisement