
ये अभिषेक त्रिपाठी हैं. जड़ भारत की है इनकी. मगर परमानेंट पता नॉदर्न आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट का हो गया है. पहले भी हमारे लिए बेलफास्ट का मौसम और हाल-चाल बांच चुके हैं. अभी फुटबॉल वर्ल्ड कप चल रहा है. तो अपनी इस किश्त में अभिषेक संवदिया बने हैं. समझिए कि ये उनका आर्टिकल एक 'लव लेटर' है. जिसमें नॉदर्न आयरलैंड की फुटबॉल से साझा मुहब्बत का कच्चा-चिट्ठा दर्ज है. बस नॉदर्न आयरलैंड नहीं, पूरे यूनाइटेड किंगडम की भी झलक मिलेगी आपको इसमें.
मुल्क को मुल्क बनाने, उसे एक करने में कोई गारा-पानी नहीं लगता. कुछ चीजें खपती हैं. जैसे- भाषा. त्योहार. झंडा. और? और खेल. अपने हिंदुस्तान की मिसाल उठा लीजिए. हमको क्या जोड़ता है? वो कौन सी चीजें हैं, जो पूरे देश की म्युचअल हैं. माने, साझा. मैं दो नाम लूंगा. एक पाकिस्तान. दूसरा, क्रिकेट. इस मामले में देश उस गरीब मजदूर की तरह है, जो अपने एक अदद कपड़े को कभी लुंगी की तरह लपेट लेता है. कभी अंगोछा बनाकर उससे पसीना पोंछ लेता है. कभी रात को उसको सोने की चादर बना लेता है. क्रिकेट हमारा ओढ़ना, बिछौना सब है. इस मामले में मैं बड़ा खुशनसीब हूं. मैंने भारत को क्रिकेट के पीछे बौराते हुए भी देखा है. और अब यहां आयरलैंड में रहते हुए दुनिया को फुटबॉल पर जान बिछाते हुए भी देखता हूं.
ये आर्टिकल नहीं, फुटबॉल का लव लेटर है मेरे आस-पास का माहौल बताऊं आपको? यहां फुटबॉल के जिक्र से ही जैसे शरीर में ऐड्रेलिन का समंदर बहने लगता है. कभी अपनी टीम के लिए. और जब अपनी टीम न खेल रही हो, तब अपनी किसी और पसंदीदा टीम के लिए. वो भी न हो, तो अपनी 'दुश्मन' टीम के खिलाफ खेल रही टीम के लिए. यहां लोग फुटबॉल पर शायरी करते हैं. फुटबॉल माशूका है उनकी. और अभी तो फुटबॉल का महाकुंभ हो रहा है. फीफा वर्ल्ड कप. इस आर्टिकल में मैं आपको अपनी नजरों से बेलफास्ट दिखाऊंगा. कि कैसे पूरा शहर फुटबॉल की आशिकी में डूबा हुआ है. मैं बताऊंगा आपको. कि लोग यहां मैच नहीं देखते. वो प्रेम कर रहे होते हैं. जैसे सालों पहले जंगल में दुष्यंत ने शकुंतला से प्रेम किया होगा.

हर गली, हर सड़क, हर चौराहे पर फुटबॉल है यहां.
चार मौसम कुदरत के, पांचवां फुटबॉल का बेलफास्ट की हर गली आजकल फुटबॉल वर्ल्डकप में शामिल देशों के झंडे वाली लड़ियों से पटी पड़ी है. जिधर देखो, उधर वर्ल्डकप का बुखार दिख रहा है. हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला' यहां पब के नाम से जानी जाती है. पब्स के बाहर फुटबॉल मैचों के लाइव टेलिकास्ट के बैनर टंगे हैं. साथ में सस्ती बीयर का प्रमोशन भी लिखा है. मैच का मैच और साथ में ऐंटरटेनमेंट बोनस. अगर टीम जीती, तो खुशी में. अगर टीम हारी, तो गम बुझाने के लिए. यहां थोड़ा गला तर करके, गले में टीम का स्कार्फ, टीम की टीशर्ट पहने मस्ती में नाचते-गाते, अपनी टीम के नारे लगाते, लोगों के झुंड आपको रोज ही दिख जाएंगे. कई बार प्रतिस्पर्धी टीम के प्रशंसक सड़क के दोनों ओर खड़े होकर एक-दूसरे पर नारेबाज़ी करते हैं. लेकिन उसमें नफरत नहीं होती. मरने-मारने की बात नहीं होती. वो जोश होता है. और उसमें रंग होता है भाईचारे का. लोग बहाने बनाकर ऑफिस से, स्कूलों से छुट्टी करते हैं. ताकि मैच देख सकें. वैसे ऑफिस भी ये बात समझते हैं. इसीलिए लोगों को इस दौरान काम में थोड़ी ढील भी दी जाती है.

फुटबॉल वर्ल्ड कप के दिनों में मैच के हिसाब से लोगों का रूटीन तय होता है. सारी चीजें इसी के इर्द-गिर्द होती हैं.
हमारे यहां सट्टा खेलना गुनाह है, यहां कानूनी मैं वो शब्द कहां से लाऊं. जो उस जुनून को बयां कर पाए, जो यहां फुटबॉल के लिए है. आपको लोगों के खाने, पहनने सब में फुटबॉल दिखेगा. किसी ने अपनी पसंदीदा टीम के झंडे जैसा हेयर स्टाइल कराया हुआ है. किसी ने शरीर पर गोदना गुदवा लिया है. टीम जर्सी तो इतनी आम है कि उसका जिक्र भी क्या करूं. मैच देखना भी कोई आम बात नहीं. कि चुपके से देख लिया. या ड्रॉइंग रूम के सोफे पर अकेले धंस गए. लोग दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ झुंड बनाकर मैच देखने जाते हैं. एक टीम के सपोर्टर खुद की टीम बनाकर मैच देखते मिलते हैं. वो 90 मिनट कैसे गुजरते हैं, क्या बताऊं. हर मिनट पर नारेबाजी. हूटिंग. हर किक पर सांस बंध जाती है जैसे. वो मैच के साथ रोते हैं. मैच के साथ हंसते हैं. उनकी भावना है फुटबॉल. ये उन्हें खुश करता है. उन्हें उदास करता है. कई लोग सट्टा भी लगाते हैं. यहां सट्टेबाजी का सिस्टम हमारे यहां जैसा नहीं है. पूरा कानूनी प्रोसेस है. इसके पीछे कोई माफिया, कोई डी-कंपनी नहीं मिलेगी आपको. रजिस्टर्ड कंपनियां हैं. और जो होता है, पारदर्शी होता है. बल्कि देश को भी फायदा है. क्योंकि मुनाफा होने पर सरकार को टैक्स भी मिलता है.

ऐसा नहीं कि यहां बेलफास्ट में किसी एक टीम का जोर हो. सारी ही टीमों के प्रशंसक मिलेंगे आपको यहां. वर्ल्ड कप मार्केटिंग के लिहाज से भी बड़ा मुनाफे का टाइम होता है. खूब कैश किया जाता है फुटबॉल को.
बस मर्द नहीं खेलते. लड़कियां भी खेलती हैं अक्सर चीजों का एक मुहब्बत वाला नाम होता है. छोटा सा. निक नेम टाइप. जैसे ऋषि कपूर का चिंटू. रितिक रोशन का डुग्गू. करीना का बेबो. वैसे ही यहां फुटबॉल को शॉर्ट में कहते हैं- फूटी. हमारे यहां जैसे जेठ की दुपहरिया में भी बच्चे गली-मैदानों में क्रिकेट खेलते दिखते हैं. वैसे ही यहां आपको बच्चे फुटबॉल खेलते मिलेंगे. कोई किसी को बड़ा प्यार करता होगा, तो तोहफे में उसकी पसंदीदा टीम से जुड़ी कोई चीज देगा. या फुटबॉल. या उसके पसंदीदा खिलाड़ी की जर्सी. बड़े लोग फाइव-ए-साइड यानि एक ओर पांच खिलाड़ियों की टीम बनाकर खेलते हैं. ऐसा नहीं कि बस मर्द खेलते हों. औरतें, लड़कियां और बच्चियां भी खेलती हैं. खूब खेलती हैं. फुटबॉल में कल्पना भी मिक्स हो जाती है. जैसे कुछ नहीं हुआ, तो फैंटसी फुटबॉल के नाम से अपनी वर्चुअल टीम बनाकर खेल लिए. FIFA के नाम से एक बहुत पॉपुलर कंप्यूटर गेम भी है.
फुटबॉल क्लब का क्या सिस्टम है? यहां हर शहर में फुटबॉल क्लब होते है. अपनी रैंकिंग के हिसाब से वो फुटबॉल लीग में शामिल होते हैं. ये लीग समझिए एक किस्म का पिरामिड है. फर्स्ट डिविज़न, सेकंड डिविज़न से बढ़ते हुए प्रीमियर लीग. सबसे ऊपर प्रीमियर लीग होती है. आपने पक्का इसकी टीमों का नाम सुना होगा. आर्सेनल, चेलसी, लिवरपूल, मेनचेस्टर यूनाइटेड. ये प्रीमियर लीग खेलने वाले क्लब हैं. मेनचेस्टर की एक और क्लब टीम है. मेनचेस्टर सिटी. ये भी प्रीमियर लीग में है. आपको एक मजे की बात बताऊं. मेनचेस्टर यूनाइटेड बड़ी टीम है. बावजूद इसके मेनचेस्टर के लोकल लोग मेनचेस्टर सिटी क्लब को ज्यादा सपोर्ट करते हैं. प्रीमियर लीग के ऊपर UEFA यूरोपियन क्लब चैंपियनशिप होती है. इसमें समूचे यूरोप के फुटबॉल क्लॅब हिस्सा लेते हैं. इनमें बार्सिलोना FC, रियल मेड्रिड जैसे स्पेनिश क्लबों का दबदबा है. अच्छा, आपको FC का मतलब तो बताया नहीं. इसका पूरा नाम है- फुटबॉल क्लब. आपको ये अक्षर यहां जगह-जगह लिखा दिखेगा.

लोग दफ्तरों से छुट्टियां ले लेते हैं. आपको 2007 का टी-20 वर्ल्ड कप याद है. जिसे भारत ने जीता था. तब भारत में सड़कें वीरान हो गई थीं. दफ्तर खाली हो गए थे. यहां फुटबॉल के लिए ऐसा ही जुनून होता है. ये एक पब के बाहर लगा ऑफर कार्ड है. मैच तो रहेगा ही रहेगा, साथ में ऑफर बोनस.
फुटबॉल नहीं, ये इमोशन है यहां सबकी अपनी-अपनी क्लब टीमें हैं. उनको लेकर लोग इतने इमोशनल होते हैं कि अपनी टीम के खिलाफ कुछ नहीं सुन सकते. लोगों के चहेते प्लेयर हैं. और उन खिलाड़ियों को पूजने वाले लोग हैं. आप लोगों की टी शर्ट के रंग और नंबर से बता सकते हैं कि वो किस टीम को और किस प्लेयर को सपोर्ट करते हैं. ये वफादारी बड़ी अनोखी है. एक ही घर में एक भाई मेनचेस्टर यूनाइटेड को सपोर्ट करता है और दूसरा लिवरपूल को. अगर मेनचेस्टर यूनाइटेड और लिवरपूल में मैच हो, तो समझो महाभारत. नहीं लड़ाई नहीं होती. बस दोनों के अपने-अपने पक्ष होते हैं. अपनी-अपनी टीम को सपोर्ट करते हैं. एक-दूसरे की खिंचाई करते हैं और अपनी टीम हार जाए, तो रेफरी को दोष देते हैं. जैसे हमारे यहां की निराश जमात टीम के हारने पर अंपायर को गरियाती है, वैसे ही.
बहुत पैसा है क्लब फुटबॉल में प्रीमियर क्लब बहुत बड़ा व्यापार है. एक बड़े प्लेयर का दाम 27 करोड़ डॉलर और उससे भी ज्यादा हो सकता है. जाहिर है, क्लब के मालिक मोटे असामी ही होते हैं. चेलसी क्लब के मालिक एक रूसी अरबपति अब्रामवोविच है. इन्हे अभी ब्रिटेन छोड़कर वापस रूस जाना पड़ा. क्योंकि उनके वीसा की अवधि खत्म हो गई. वो रूसी जासूस सेरगल और उनकी बेटी यूलिया पर नर्व एजेंट से हमला हुआ था न. उसके बाद रूस और ब्रिटेन में तनाव बहुत बढ़ गया है. इसका खामियाजा अब्रामवोविच को उठाना पड़ा. उनका वीसा एक्सटेंड नहीं हुआ. अब वो टीवी पर ही चेलसी का मैच देखकर तसल्ली करते होंगे.

ये कलेक्टिव ऐक्सपिरयंस होता है. माने, ऐसा अनुभव जो पूरे समाज का साझा हो. ये एक मार्केट में लगा टीवी स्क्रीन है. देखिए, कितने लोग जमा हैं देखने के लिए. ऐसे नजारे यहां आम हैं (फोटो: रॉयटर्स)
वर्ल्ड कप में कौन से सितारे जड़े हैं वर्ल्ड कप क्लब मैचों से थोड़ा अलग है. एक तो ये चार साल में एक बार होता है. दूसरा कि इसमें अलग-अलग देशों की टीमें खेलती हैं. जो खिलाड़ी बाकी टाइम एक क्लब में साथ खेलते हैं, वो वर्ल्ड कप में एक-दूसरे के खिलाफ खेलने उतरते हैं. क्लब की जर्सी उतारकर देश की जर्सी पहनते हैं. वर्ल्ड कप पैसे से ज्यादा इज्जत का सवाल होता है इनके लिए. उनके लिए ये जीने-मरने का सवाल बन जाता है. इस वर्ल्ड कप की मेजबानी कर रहा है रूस. उम्मीद है कि दुनियाभर के करीब 30 लाख लोग यहां मैच देखने जाएंगे. लोग सालों पैसा बचाते हैं. ताकि वर्ल्डकप देखने के लिए दूसरे देश जा सकें.

मेसी पर बहुत दबाव है. अर्जेंटीना के लोगों की मेसी से शिकायत ही यही है कि वो क्लब फुटबॉल में जितना अच्छा खेलते हैं, वर्ल्ड कप में वैसा नहीं खेलते. एक पूरे देश का दबाव ही है कि मेसी विश्व कप मुकाबलों में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते (फोटो: रॉयटर्स)
हिंदुस्तान-पाकिस्तान जैसे कई हैं यहां वर्ल्ड कप का स्टाइल अलग ही है. यहां खेल का स्टैंडर्ड बहुत ऊंचा होता है. फुटबॉल में एक चलन था. मैच खत्म होने के बाद लोग टी शर्ट की अदला-बदली कर लेते थे. समझिए कि खेल में भाईचारे की एक परंपरा थी ये. मगर फिर फीफा ने 1986 में इसे बैन कर दिया. फीफा नहीं चाहता था कि मैदान पर खिलाड़ी नंगे बदन नजर आएं. प्यार-मुहब्बत तो भरपूर है. मगर तकरार भी कतई कम नहीं. कुछ खास टीमें हैं. ज्यादातर पड़ोसी देश की टीमें. इनके बीच मुकाबले का इतिहास है. जैसे इंडिया-पाकिस्तान का मैच. जैसे ऑस्ट्रेलिया-इंग्लैंड की एशेज सीरिज. वैसे ही अर्जेंटीना और ब्राजील का सीन है फुटबॉल में. इनके प्रशंसक एक-दूसरे को उतना ही चाहते हैं, जितना भारतीय और पाकिस्तानी क्रिकेट प्रशंसक. जर्मनी और हॉलैंड की टीमों के बीच भी ऐसा ही टेंशन है. डेनमार्क और नॉर्वे हों या फिर मिस्र और अल्जीरिया. सबसे ज्यादा मुकाबला पड़ोसियों में ही होती है.

रूस में वर्ल्ड कप हो रहा है. ये वहीं की एक इमारत की तस्वीर है. और दीवार पर चेहरा बना है पुर्तगाल के खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो की (फोटो: रॉयटर्स)
वर्ल्ड कप 2018 में यूनाइटेड किंगडम की टीमें इस वर्ल्ड कप में यूनाइटेड किंगडम की बस एक टीम ने क्वॉलिफाई किया. इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, नॉदर्न आयरलैंड और वेल्स, चारों में से केवल इंग्लैंड ने ही क्वालीफाई किया. कहने को तो UK एक देश है, लेकिन सभी की अपनी नेशनल टीम है. ये वर्ल्डकप में अलग-अलग हिस्सा लेते हैं. दिलचस्प बात ये है की ओलिंपिक खेलते समय ये फिर एक साथ हो जाते हैं. लेकिन कॉमनवेल्थ गेम्स में अलग खेलते हैं. कहीं साथ, कहीं अलग.
एक ही देश की ये टीमें, कौन कहां है? स्कॉटलैंड टीम फीफा रैंकिंग में अभी 48वें पायदान पर है. नॉदर्न आयरलैंड 29वें नंबर पर है. वेल्स 18वें पर और इंग्लैंड 12वें नंबर पर. इंग्लैंड की टीम बाकी तीनों से कहीं बड़ी है. वर्ल्ड कप जीतने वाली इकलौती टीम है. 1966 में बॉबी मूर, जॉफ हर्स्ट और बॉबी चार्लटन वाली इंग्लैंड टीम ने पश्चिमी जर्मनी की टीम को 4-2 से हराकर वर्ल्ड कप जीता था. ये यूनाइटेड किंगडम का अब तक का इकलौता वर्ल्ड कप है. इसको यहां लोग उतनी ही शिद्दत से याद करते हैं, जैसे हमारे यहां 1983 के कपिल देव वाले वर्ल्ड कप को. आपने कभी सोचा है कि कपिल की जिम्बॉबे के खिलाफ 175 नॉट आउट वाली टुनब्रिज वेल्स में खेली गई पारी का कोई विडियो क्यों नहीं है? वो इसलिए कि उस दिन बीबीसी के कर्मचारी हड़ताल पर थे और मैच का कवरेज ही नहीं हुआ. नॉदर्न आयरलैंड में इंग्लैंड को लेकर मिली-जुली भवनाएं हैं. यहां आधे लोग उन्हें सपोर्ट करते हैं और आधे उस टीम को जो उन्हें हराये. स्कॉटलैंड भी कमोबेश ऐसा ही है. बैकग्राउंड समझना है तो 'ब्रेव हार्ट' पिक्चर रिकमेंड करूंगा मैं.

ऐसा नहीं कि बस आयरलैंड या ब्रिटेन में ऐसा माहौल रहता हो. सारे फुटबॉल प्रेमी देशों में कॉमन है ये फीलिंग. जैसे ये कोलंबिया की फुटबॉल टीम का एक सपोर्टर. चेहरे से लेकर पोशाक तक, सबपर टीम का रंग चढ़ा है (फोटो: रॉयटर्स)
सबसे ज्यादा टीमें यूरोप की हैं इस बार भी वर्ल्ड कप में सबसे ज्यादा टीमें यूरोप की हैं. उसके बाद अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका का नंबर है. एक मजेदार बात ये है कि जिम्बॉबे की टीम को इतिहास में पहली बार इसमें हिस्सा लेना था, लेकिन वो अपने ब्राजीलियाई कोच को निकालते वक्त करारनामे के हिसाब से उसे पेमेंट नहीं दे पाया. सो फीफा ने उनको वर्ल्डकप से बाहर का रास्ता दिखा दिया. ZIFA,यानी जिम्बॉबे फुटबॉल असोसिएशन की माली हालत बहुत खराब है. यही हाल पूरे जिम्बॉबे का है.

जॉर्ज बेस्ट ने जाने कितने ही लोगों को फुटबॉल से मुहब्बत करना सिखाया. कइयों के लिए फुटबॉल देखने की वजह बने वो. वो मैनचेस्टर यूनाइटेड क्लब के लिए खेलते थे. 474 मैचों में करीब 181 गोल किए उन्होंने. फुटबॉल के मैदान से बाहर बड़ी रंगीन थी उनकी जिंदगी. खूब शराब पीते थे. तेज कारों का शौक था (फोटो: एपी)
उस खिलाड़ी का किस्सा, जो एक अलग ही क्लास था 1958 में नॉदर्न आयरलैंड वर्ल्ड कप के क्वॉर्टर फाइनल तक पंहुचा और वो वर्ल्ड कप के लिए क्वॉलिफाइ करने वाला सबसे कम आबादी वाला देश बना. ये रिकॉर्ड 2006 में तब टूटा, जब त्रिनिदाद टोबैगो ने वर्ल्ड कप के लिए क्वॉलिफाइ किया. 2006 में ही जब नॉदर्न आयरलैंड ने इंग्लैंड को वर्ल्ड कप क्वॉलिफायर मैच में 1-0 से हराया, तो पूरे बेलफास्ट में बड़ी धूम मची. नॉदर्न आयरलैंड की अपनी नेशनल टीम की उपलब्धियां कुछ खास नहीं हैं. लेकिन इसके बावजूद बेलफास्ट का फुटबॉल की दुनिया में बड़ा नाम है. आप पूछेंगे क्यों? तो इसका जवाब है- जॉर्ज बेस्ट. जॉर्ज का फुटबॉल में वही स्थान है, जो हमारे यहां हॉकी में ध्यानचंद का है. जॉर्ज सदी के महान फुटबॉलर थे. उनका नाम लोग आंखों में चमक भरकर लेते हैं. एक बार बॉल जॉर्ज को मिली, तो ऐसा लगता था कि किसी चुंबक की तरह पैर से चिपक गई हो. जॉर्ज के सामने जाने से डिफेंडर डरते थे. उनके पास विपक्षी टीम के डिफेंडर को पछाड़ने के इतने तरीके थे कि कोई रक्षात्मक रणनीति काम नहीं आती थी. जॉर्ज डिफेंडर से बचा के नहीं, उनके सामने से बॉल काटते हुए ले जाकर गोल दागने के लिए मशहूर थे.
फुटबॉल के मसीहा पेले ने जॉर्ज के लिए कहा था-
जॉर्ज विश्व में किसी भी समय के सबसे महान फुटबॉलर हैं. उनकी फुटबॉल खेलने की कला एक ब्राजीलियन की है, न कि एक यूरोपियन की. मेरे लिए वो कभी यूरोपियन खिलाड़ी थे ही नहीं. मेरी नजर में वो एक ब्राजीलियन प्लेयर थे.

जर्मनी की टीम ने पिछले काफी महीनों से कोई इनोवेशन नहीं दिखाया था अपने खेल में. लेकिन वो इतना खराब प्रदर्शन करेंगे कि पहले ही राउंड में बाहर हो जाएंगे, इसकी किसी ने कल्पना नहीं की होगी (फोटो: रॉयटर्स)
जाते-जाते... बाकी खत्म करते हुए ये लिखूंगा. कि इस बार अच्छी चीज ये हुई कि एशियन और अफ्रीकी देश आगे बढ़े. बड़े-बड़े दिग्गज ढह गए. जर्मनी विदा हो गया. पहले ही राउंड में जर्मनी का ये हाल होगा, ये किसने सोचा था? वैसे बेल्जियम काफी अच्छी स्थिति में दिख रही है. खेल भी अच्छा रही है. उससे उम्मीदें हैं. ब्राजील से तो हमेशा ही उम्मीद रहती है. बाकी कोई एशियाई या अफ्रीकी देश वर्ल्ड कप जीत ले जाए, तो क्या बात हो. मजा ही आ जाए.
अगर आप भारतीय हैं, विदेश में रहते हैं, तो आप भी हमारे लिए लिख सकते हैं. हम एक नई सीरीज शुरू करने जा रहे हैं. इसका नाम होगा NRI सीरीज. आप जहां भी, जिस भी देश में रहते हैं, वहां के अपने अनुभव हमें लिखकर भेज सकते हैं. या फिर उस जगह की किसी खासियत के बारे में हमारे पाठकों को बता सकते हैं. सिसायत, सिनेमा, खेल, संगीत, साहित्य, टॉपिक आपकी पसंद का. आर्टिकल भेजने का पता है lallantopmail@gmail.com
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