7 साल की उम्र में ही मां-बाप नहीं रहे, नाना ने पाला-पोसा
मथुरा के छोटे से गांव नगला चन्द्रभान में पैदा हुए थे दीनदयाल. तारीख थी 25 सितंबर और साल था 1916. भगवती प्रसाद उपाध्याय और रामप्यारी इनके पेरेंट्स थे. मम्मी धार्मिक थीं.तीन साल की छोटी उम्र में दीनदयाल के पिता चल बसे. चार साल बाद मम्मी भी उनको छोड़कर भगवान को प्यारी हो गईं. 7 साल की उम्र में ही दीनदयाल अनाथ हो गए. मां-बाप रहे नहीं तो वो अपने ननिहाल चले आए.
दीनदयाल ने पिलानी, आगरा और प्रयाग में आगे की पढ़ाई की. B,Sc, BT किया पर नौकरी नहीं की. छात्र जीवन से ही वे RSS के एक्टिव वर्कर हो गए. कॉलेज छोड़ने के तुरंत बाद वो संघ के प्रचारक बन गए. वहां इनके सरल स्वभाव की वजह से ये लोगों को पसंद आने लगे.
आखिर दीनदयाल उपाध्याय ने शादी क्यों नहीं की?
दीनदयाल उपाध्याय के बारे में अक्सर एक अफवाह का जिक्र किया जाता है. अंदर की कहानी यूं है कि जब दीनदयाल छोटे थे, तब उनके नाना चुन्नीलाल शुक्ल के मन में अपने नाती का भविष्य जानने की इच्छा हुई. इसके लिए उन्होंने एक जाने-माने ज्योतिषी को घर बुलाया.बालक दीनदयाल की कुंडली के ग्रह-नक्षत्र ज्योतिषी ने उलटाए-पुलटाए और नानाजी से कहा, 'लड़का बहुत तेज है और बहुत आगे जाने वाला है. सेवा, दया और मानवता के गुण इसमें कूट-कूटकर भरे होंगे. यह बालक युग पुरुष के रूप में उभरेगा और देश-विदेश में अतुलनीय सम्मान प्राप्त करेगा. इतिहास के पन्नों में इसका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा, बट, लेकिन, किंतु, परंतु...
इस बट को सुनते ही नाना सकते में आ गए. उन्होंने ज्योतिषी को आगे की बात बताने के लिए प्रेशराइज किया तो ज्योतिषी ने बताया लड़का शादी-बियाह नहीं करेगा. इतना सुनते ही नाना चुन्नीलाल दुखी हो गए. फिर भी उन्होंने खुद को दिलासा दिया और यह सोचा कि ‘बड़ा होने पर समझा-बुझाकर विवाह करा देंगे’.
पर इस कहानी के हिसाब से ही सब कुछ चला और दीनदयाल ने कभी शादी नहीं की, तो नहीं ही की.

गुरू गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी (स्क्रीन ग्रैब, जीवन दर्शन डॉक्यूमेंट्री से)
ईमानदारी का एक किस्सा...
ऐसा ही एक किस्सा दीनदयाल उपाध्याय की ईमानदारी के बारे में भी लोग सुनाते हैं. एक बार पंडित दीनदयाल उपाध्याय रेलगाड़ी से यात्रा कर रहे थे. इत्तेफाक से उसी रेलगाड़ी मे गुरू गोलवरकर भी यात्रा कर रहे थे. जब गोलवलकर को यह पता चला कि उपाध्याय भी इसी रेलगाड़ी में हैं तो उन्होंने खबर भेजकर उनको अपने पास बुलवा लिया. उपाध्याय आए और लगभग एक घंटे तक सेकेंड क्लास के डिब्बे में गुरू गोलवलकर के साथ बातचीत करते रहे. उसके बाद वह अगले स्टेशन पर थर्ड क्लास के अपने डिब्बे में वापस चले गए.अपने डिब्बे में वापस जाते समय टीटीई के पास गए और बोले- श्रीमान मैंने लगभग एक घंटे तक सेकेंड क्लास के डिब्बे में ट्रैवेल किया है, जबकि मेरे पास थर्ड क्लास का टिकट है. नियम के हिसाब से मेरा एक घंटे का जो भी किराया बनता है. वह आप मेरे से ले लीजिए. TTE ने कहा- कोई बात नहीं आप अपने डिब्बे में चले जाइए. आखिर जब दीनदयाल नहीं माने और पीछे ही पड़ गए तो TTE ने दो घंटे का किराया जोड़ा और उनसे ले लिया.
फिर दी फिलॉसफी एकात्म मानववाद, जिस पर BJP गर्व करती है
दीनदयाल उपाध्याय फिलॉसफर और राइटर भी थे. उनके हिंदी के भाषणों और लेखों के तीन क्लेक्शन पब्लिश हैं - 'राष्ट्रीय जीवन की समस्या' या 'द प्रोब्लेम्स ऑफ़ नेशनल लाइफ', 1960; एकात्म मानववाद', या 'इंटरनल हुमानिज्म', 1965; और राष्ट्र जीवन की दिशा, या ' द डायरेक्शन ऑफ़ नेशनल लाइफ' 1971.इनका एकात्म मानववाद वाली फिलॉसफी बड़ी फेमस है. जिसके हिसाब से भारत में अलग-अलग धर्मों को समान अधिकार दिया जाता है.
मुगलसराय स्टेशन के वॉर्ड में पड़ी मिली थी लाश
दीनदयाल उपाध्याय की मौत साधारण परिस्थितियों में नहीं हुई थी. 11 फरवरी, 1968 की रात में रेल यात्रा के दौरान मुगलसराय स्टेशन के वार्ड में उनकी डेडबॉडी पाई गई थी. बाद में हुई जांचों में भी इसके पीछे के राज से पर्दा नहीं उठ सका. लोग इसके पीछे मर्डर के शक से भी इंकार नहीं करते.दीनदयाल उपाध्याय के परिवारवालों ने उनकी हत्या की आशंका जताई थी. केंद्र सरकार से जांच की भी मांग की गई. साजिश का खुलासा नहीं होने पर अपनी नाराजगी भी जताई. पर मामले की जांच के लिए कोई खास कदम नहीं उठाए गए.
(ये स्टोरी 'दी लल्लनटॉप' के लिए आदित्य प्रकाश ने लिखी थी.)
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