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'उड़ता पंजाब उड़ता ही रहेगा, कोई बादल उसे रोक नहीं पाएंगे'

संजय झा 'मस्तान' फिल्ममेकर हैं. फिल्म और सेंसरबोर्ड के झगड़े में अगर एक फिल्ममेकर कुछ बता रहा है तो उसे बहुत ध्यान से पढ़ो.

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फोटो - thelallantop
उड़ता पंजाब तगड़ी फिल्म होगी. तभी तो इस पर इत्ता विवाद है. अपने यहां कहावत है कि जब "चार लोग गरियाने लगें तो समझो कि तरक्की कर रहे हो." फिल्म के बारे में जो दावे और उनसे उपजे विवाद हैं, उनका छिलका तो रिलीज के बाद ही उतरेगा. लेकिन हाईकोर्ट के ऑर्डर ने उसके आगे का पहाड़ खिसकाकर किनारे कर दिया है. इसी पूरे वाकए पर मौज ले ली संजय झा 'मस्तान' ने. जो पढ़ने में हमको चौचक फीलिंग आती है उसे हम मौज कहते हैं. तो संजय मुंबई बेस्ड फिल्ममेकर हैं. थिएटर से जुड़े हैं. हमारी गरीब सी फ्रेंडलिस्ट का नगीना हैं. हम मोबाइल खोले सांय सांय ऊपर स्क्रीन सरका रहे थे तभी इनकी ये धांसू पोस्ट पढ़ी. उठा लाए हम. कहा कि बाकी लोगों तक भी पहुंचे. अगर फिल्म और सेंसरबोर्ड के लफड़े में फिल्ममेकर कुछ कहता है तो उसको हाथ बांधकर सुनना हमारी ड्यूटी है. इससे ज्ञान बढ़ता है. लो फिर हाजिर है. sanjay

जय हो. उड़ता पंजाब उड़ता ही रहेगा. अब कोई बादल उसे रोक नहीं पाएंगे. उड़ता पंजाब बादल से निकल कर चंडीगढ़, अमृतसर, तरनतारन, जशनपुरा, मोगा एवं लुधियाना होते हुए उड़ते उड़ते जब मुंबई में सेंसर बोर्ड पहुंचा तो बहुत शोर हुआ. गिरता, उठता, संभलता हुआ उड़ता पंजाब नशे में था फिर भी उड़ सका और सेंसर बोर्ड तक पहुँच गया इस बात पर सब हैरान थे. नशे में उड़ते उड़ते पंजाब के कपडे गंदे हो कर फट गए थे, बाल बिखरे थे. कोर्ट में उड़ता पंजाब कहीं से पंजाब नहीं लग रहा था. न बल्ले बल्ले न हड़िप्पा. चुनाव, एमपी, एमएलए, संसद जैसे शब्द भी उड़ते पंजाब की मदद नहीं कर पा रहे थे. उड़ने से पहले पंजाब क्या कर रहा था? लेटा था? सोया था? बैठा था? दौड़ रहा था? या झूम रहा था? सब अटकलें लगाने लगे. सैकड़ों मौतें, एड्स और हेपिटाइटिस सी के कई सौ मामलों को लेकर पंजाब कैसे उड़ पाया? उड़ता पंजाब अकेला था. नशा, गाली और हिंसा से लिपटे पंजाब को सेंसर उड़ाता रहा और सरसों के खेत मक्के दी रोटी देखते रह गए. सब उसे उड़ाने वाले की तरफ देखने लगे, पंजाब को उड़ाने वाले सेंसर के संता - बंता थे. पंजाब राज्य परिवहन विभाग ने पंजाब का साथ सड़कों पर क्यों नहीं दिया जिसकी वजह से पंजाब को सेंसर के साथ उड़ना पड़ा ? संता बंता हंस रहे थे. उड़ता पंजाब के साथ मीडिया चैनल जातिवाद ,धर्मवाद की राजनीति के साथ ड्रग्स सेक्स धुआँ और सेंसर का कैंसर भी उड़ने लगे थे. सेंसर कमेटी उड़ता पंजाब देखकर सर्टिफिकेट तय नहीं कर पाई थी. इस बीच उड़ता पंजाब सेंसर बोर्ड से ऊब कर मुंबई से हवा खाने निकल पड़ा और उड़ते उड़ते टोबा टेक सिंह तक जा पहुँचा. ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था. टोबा टेक सिंह पंजाब को उड़ता देख बोल पड़ा " औपड़ दि गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानां दि सेंसर दि दाल ऑफ दी निहलानी ... जैसा टोबाटेक सिंह ने देखा, सब उड़ता पंजाब को देखना चाहते हैं. औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानां दि मुंग दि दाल आफ दी सेंसर बोर्ड ऑफ़ हिंदुस्तान आफ दी दुर फिटे मुँह. हुँह. जमीन बंजर तो औलाद कंजर, क्या करेगा पहलाज का सेंसर? उड़ते पंजाब को जब बिहार में हिरामन ने देखा तो जीवन में कभी भी न उड़ने की चौथी कसम खा ली. सर्टिफिकेट देना सेंसर बोर्ड की ड्यूटी है, पर खाली दिमाग सेंसर का घर हो गया है. इतना सेंसर क्यों है भाई?

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