राही मासूम रज़ा ने महाभारत सीरियल की स्क्रिप्ट लिखी है.
महाभारत सीरियल शुरू हुआ मेरी पैदाइश के साल. सन 1988 में. और मेरे समझदार होने से पहले चुक गया. हम समझदार हुए शक्तिमान के जमाने में. जिसमें मुकेश खन्ना थे. मुकेश महाभारत में बने थे भीष्म पितामह. तो शक्तिमान का वह रूप देखने के लिए हमने महाभारत देखा. उसके भी बहुत साल बाद पढ़ रहे थे टोपी शुक्ला. उसमें और महाभारत में एक कनेक्शन मिला. महाभारत की स्क्रिप्ट लिखी थी राही मासूम रज़ा ने. जिन्होंने टोपी शुक्ला को हमारे बुक शेल्फ में इंस्टाल किया. राही मासूम रज़ा को पढ़ते हुए सोचना. एक शिया मुसलमान. सोचो कि उसने कितनी बाउंड्री कलम से खोद कर गिरा दी होगी. मजहब, रीति रिवाज, भारत माता की जय टाइप पब्लिसिटी स्टंट सबकी हवा निकाल दी उसने. और फिर उनकी लिखी किताबों के नाम चुनो. उनकी लिस्ट प्रिंट कराओ. और लाकर पढ़ डालो. इंसान बन जाओगे भाईसाहब. बाउंड्री गिर जाएंगी ढेर सारी.
राही मासूम रज़ा 1 सितम्बर को आए थे दुनिया में हम उनके फैन हो गए थे टोपी शुक्ला पढ़ते हुए. टोपी से बड़ा अपनापा सा हो गया था. काहे? काहे कि वह भी बीच वाला था. मने एक भाई बड़ा एक छोटा. बीच में पिसता था हमेशा. शकल भी सबसे अलग टाइप की थी. जितनी दुश्वारियां उसकी थी करीब वैसी ही मेरी भी. अपनी कंडीशन भी बिल्कुल उसी तरह थी. बड़ा अच्छा लगा कि किसी ने हम जैसे बीच वालों की हालत समझी, लिखी थी. 1968 में मुंबई पहुंच गए थे. रोजी रोटी का मसला भी था और लिखने का भी. फिल्मों में लिख कर नाम और पैसा कमाया. लेकिन सुकून तो साहब इसी में मिलता है. जो मन में जमी सीमेंट तोड़ कर बाहर उफन पड़ता है. उसको लिखा जाए. ऐसा बहुत लिखा है.
आधा गांव, कटरा बी आरजू, सीन 75, ओस की बूंद, दिल एक सादा कागज. नीम का पेड़ तो याद ही होगा. सीरियल आता था इसका. जगजीत सिंह इसका टाइटल सांग गाते थे "मुंह की बात सुने हर कोई, दिल के दर्द को जाने कौन. आवाजों के बाजारों में खामोशी पहचाने कौन." और पंकज कपूर थे मेन रोल में. ये राही की लिखी आखिरी चीज थी. मैं एक फेरीवाला, शीशे के मकां वाले और ग़रीबे शहर. इनमें लिखी हैं उर्दू नज़्म और शायरी.
ये देखो नीम का पेड़ सीरियल का ट्रेलर https://www.youtube.com/watch?v=NuV_MUNFJy0 कविता पढ़ो उनकी लिखी. मैं एक फेरी वाला का हिस्सा है ये.
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो.
मेरे उस कमरे को लूटो
जिस में मेरी बयाज़ें जाग रही हैं
और मैं जिस में तुलसी की रामायण से सरगोशी कर के
कालिदास के मेघदूत से ये कहता हूँ
मेरा भी एक सन्देशा है

शुरुआत में जब इलाहाबाद रहे. तो 10-15 उपन्यास लिख डाले दूसरों के नाम से. घोस्ट राइटर. जब मुंबई पहुंचे तो नाम पैदा हो गया. उसके बाद सब कुछ लिखते रहे. करीब 300 फिल्में और 100 के आस पास सीरियल लिखे. सबसे लंबा काम है उनका महाकाव्य 'अट्ठारह सौ सत्तावन.' आधा गांव उपन्यास आया 1966 में. उसके बारे में लिख गए हैं-
"वह उपन्यास वास्तव में मेरा एक सफर था. मैं ग़ाज़ीपुर की तलाश में निकला हूं लेकिन पहले मैं अपनी गंगोली में ठहरूंगा. अगर गंगोली की हक़ीक़त पकड़ में आ गयी तो मैं ग़ाज़ीपुर का एपिक लिखने का साहस करूंगा" उनको याद करते हुए ये नज्म पढ़ लेना. सुन लेना. गुन लेना.
हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद
अपनी रात की छत पर, कितना तनहा होगा चांद
जिन आँखों में काजल बनकर, तैरी काली रात
उन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चांद
रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जाकर, अटका होगा चांद
चांद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चांद