1. 'मरने से पहले लिखूंगा.'
मरने से पहले. आरकेडी बोले. राजेंद्र कुमार धवन. इंदिरा की परछाईं. उनके असिस्टेंट. राजीव के दौर में शंट कर दिए गए. मगर कार्यकाल के आखिरी में वापसी भी की. उनसे अकसर कहा जाता. इंदिरा के सब दिन आपने देखे. तब भी जब वह पीएम थीं. और तब भी जब विपक्ष में रहने के दौरान उनके छोटे से बंगले के बरामदे में आप टेंट लगाकर काम करते थे. तो उन पर लिखें. और धवन का यही जवाब होता था. मरने से पहले लिखूंगा.
राजेंद्र कुमार धवन इंदिरा गांधी के करीबी रहे.फोटो के इंदिरा गांधी के दाईं ओर टाई पहले चल रहे हैं.
फिर वह कहते, कैसे लिख सकता हूं कि संजय गांधी की मौत ( 23 जून 1980) के बाद इंदिरा गांधी रोबॉट की तरह हो गई थीं. काम ही नहीं कर पा रही थीं. बस किसी तरह देश का राजकाज चल रहा था. धवन चले गए. कैंसर के चलते. अगस्त 2018 में. धवन उस परंपरा से थे, जिसकी शुरुआत मथाई से होती है. फिर यशपाल कपूर, धवन, विंसेट जॉर्ज होते हुए ये सूची उन नामों तक पहुंचती है, जिन्होंने खुद को मीडिया से दूर रखा, ताकि उनकी हैसियत बनी रहे. सत्ता केंद्रों के पहरेदार.
2. 'मेरे सहयोगी मुझे सर कहते हैं.'
इंदिरा, इकलौती मर्द. या भाषायी कृपणता. जो मर्द कहकर ही किसी की बहादुरी को रूपायित कर सके. मगर महिला होने के चलते कई बार राजनयिक मोर्चों पर दुविधा पैदा हो जाती थी. नेहरू परिवार से ताल्लुक रखने वाले बीके नेहरू ने एक वाकया सुनाया. बीके पंडित नेहरू के परिवार से थे और इंदिरा के जमाने में अमरीका में भारत के राजदूत थे.बीके के पास अमरीकी राष्ट्रपति के दफ्तर से एक सवाल आया. कि राष्ट्रपति महोदय को भारत की प्रधानमंत्री को क्या कहकर संबोधित करना चाहिए. मैडम का संबोधन इंदिरा को पसंद नहीं. तो क्या राष्ट्रपति मैडम प्राइम मिनिस्टर या सिर्फ प्राइम मिनिस्टर कह सकते हैं. बीके की मेज से होते हुए ये सवाल इंदिरा के सामने पहुंचा. उनका जवाब था. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह क्या बुलाते हैं. पर उन्हें बता दीजिए. मेरे सहयोगी मुझे सर कहते हैं.

बीके पंडित इंदिरा के ज़माने में अमरिका में भारत के राजदूत थे.
3. 'संजय को रोकिए.'
अजब इत्तफाक है. 22 जून 1980 को 1 सफदरजंग रोड (पीएम का आवास) पर तीन पुरुषों और दो महिलाओं के बीच हुई बातचीत के आखिरी सिरे. पुरुष थे, संजय, धवन और स्वामी धीरेंद्र ब्रह्मचारी (बिहार के रहने वाले इंदिरा के ताकतवर और विवादित योग गुरु). महिलाएं थीं खुद इंदिरा और संजय की पत्नी मनेका. उस रोज स्वामी संजय के साथ राइड पर गए थे. संजय ने आदत के मुताबिक प्लेन को खूब गोते लगवाए और धीरेंद्र कातर से रह गए. संजय गंभीर शक्ल बनाकर राइड के आखिरी में बस इतना बोले, तुम्हें डर लगा क्या.
धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने संजय गांधी को हवाई जहाज चलाने को लेकर आगाह किया था. फिर खुद भी एक प्लेन क्रेश में मारे गए.
फिर बात हुई आवास में. जहां धीरेंद्र ने इंदिरा से कहा, संजय को रोकिए. यह बहुत जोखिम लेता है. हवा में इस तरह के करतब जमींदोज कर सकते हैं. संजय हंस दिए. मनेका ने भी ब्रह्मचारी की बात का समर्थन करते हुए मम्मी से दखल देने को कहा. बतौर मनेका, तब धवन बोले, अरे वो शेरदिल मर्दों की सवारी है. धीरेंद्र चुप रह गए. अगले दिन संजय प्लेन क्रैश में मारे गए. और इस वाकये के 14 साल बाद फिर एक प्लेन क्रैश हुआ. इस बार मौत हुई. धीरेंद्र ब्रह्मचारी की.
4. इंदिरा के खास कमलापति की राजीव के दौर में हुई हील हुज्जत
एक जमाने में कमलापति त्रिपाठी इंदिरा के बेहद खास हो गए. इंदिरा उन्हें पंडित जी कहतीं और बाकी पार्टी बाबू. उन पर विस्तार से फिर कभी. अभी तो एक प्रसंग, जो हिंदू धर्म के पंडों की जड़ मान्यताएं दिखाता है. इंदिरा सत्ता से बाहर थीं. यानी 77-79 का वक्त. और तभी वह अतिरिक्त धार्मिक हो गई थीं. इस दौरान वह पहुंची एमपी के शहर दतिया. दतिया मशहूर है बगलामुखी देवी के शक्तिपीठ के लिए. यहीं पर धूमावती देवी का मंदिर भी है. यहां पुरुष और विधवा महिलाएं ही पूजा कर सकती हैं. इंदिरा देवी के दर्शन वास्ते गईं, मगर उन्हें पुजारी ने रोक दिया. पंडा बोला कि सिर्फ हिंदू ही दाखिल हो सकते हैं. इंदिरा के माता-पिता कश्मीरी ब्राह्रमण थे, मगर उनकी शादी एक पारसी, फिरोज से हुई थी.इंदिरा लौट आईं और गेस्ट हाउस आते ही फोन किया. पंडित जी को. बस इतना कहा, आप आइए. कमलापति त्रिपाठी पीठ के पुजारी पर सब तर्कों समेत चढ़ बैठे. आखिर में साम दाम दंड भेद सब आजमा कमलापति बोले, मैं इनको लाया हूं, आप इनका ब्राह्मण पुत्री समझ लें. पुजारी मान गया, इंदिरा ने पूजा की.
कमलापति का जिक्र आया तो बता दूं. राजीव के जमाने में वह पार्टी के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए थे. फिर एक रोज उन्होंने राजीव को चिट्ठी लिखी. मीडिया में भी लीक हुई. इसमें राजीव के नेतृत्व पर परोक्ष रूप से सवाल उठाए गए थे. उसके बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग में कमलापति की बड़ी हील हुज्जत हुई. मगर राजीव ने उन्हें पद से हटाकर राजनीतिक रूप से शहीद का सुख नहीं लेने दिया. कमलापति की ही मौजूदगी में कमेटी ने प्रस्ताव पास किया, जिसमें चिट्ठी के मजमून की खिल्ली उड़ाई गई.

राजीव के जमाने में कमलापति पार्टी के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए थे. अपने जीवन के अंतिम दिनों में उनकी राजनीतिक ताकत कम हो गई थी.
कमलापति जान गए, सिक्का बदल गया था. वर्ना यही कमलापति नजर उठाकर नहीं देखते थे. जब तक आगत नेता पांव न पखार ले. शरद पवार ने अपनी आत्मकथा में इसका जिक्र किया है. कि उन्होंने कमलापति के पैर नहीं हुए तो पंडित जी ने ठीक से बात भी नहीं की. जबकि शरद महाराष्ट्र के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री थे.
5. आडवाणी के घर में कमला का अनुशासन चलता था.
लाल कृष्ण आडवाणी. भारतीय नेताओं की उस दुर्लभ जमात का हिस्सा, जो अपनी जीवन संगिनी संग सार्वजनिक मौकों पर नजर आए. जो फिजूल की पर्देदारियों में नहीं पड़े. इस सूची में राजीव गांधी भी हैं, जो अकसर सोनिया के साथ नजर आते थे. इस जमात का एक नियम था. पत्नी और परिवार भी जरूरी है. एक बात ये भी कि दोनों की ही पत्नियां उनके कार्यकाल में राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं रहीं. सोनिया पर तो बहुत बात होती है. आज बात एलके और कमला की.कमला आडवाणी का विवाह के पहले नाम था कमला जगतियानी. पार्टीशन के चलते उनका परिवार भी पाकिस्तान के हिस्से आए सिंध से विस्थापित हो भारत आया था. समृद्धि बस स्मृति में बची थी और वर्तमान उतना ही कठोर था, जितना नए सिरे से शून्य होने पर हो सकता है. कमला ने पढ़ाई के बाद पोस्ट ऑफिस में नौकरी शुरू की. दिल्ली में ही. और तभी उनके विवाह का प्रस्ताव आया.
लड़के का नाम लालकृष्ण. काम, पत्रकार. पैंट कमीज पहने, चश्मा लगाए एक अच्छी लंबाई वाला आदमी, जो साइकिल से दफ्तर जाता. रिश्ते के लिए हां हो गई. शादी भी हो गई. फिर कमला को पता चला कि पत्रकार नेता भी है. बल्कि नेता ही ज्यादा है. और पैंट कमीज तो वह कम ही पहनता है. प्रायः धोती कुर्ता में रहता है.

लालकृष्ण आडवाणी सार्वजनिक मंचों पर अपने पत्नी कमला के साथ देखे जाते थे. अब कमला नहीं हैं तो उनकी बेटी प्रतिभा एलके का ध्यान रखती हैं.
दोनों साथ रहे. खूब रहे. 6 अप्रैल 2016 तक. इस दिन कमला का निधन हो गया. आडवाणी को जानने वाले बताते हैं कि घर में कमला का अनुशासन चलता था. एलके की सुरुचि और बेहतर स्वास्थ के पीछे यही फैक्टर था. था. अब है. एकाकीपन, जो आडवाणी की आंखों में जब तब उतरता है. जब तब ही, हमेशा नहीं. क्योंकि प्रतिभा हैं. कमला और एलके की बेटी. जो अब पिता का ख्याल रखती हैं. एमपी के मुख्यमंत्री कमल नाथ के शब्दों में. दुनिया की सबसे प्यारी बेटी.

द मैरीगोल्ड स्टोरी- इंदिरा एंड अदर्स.
कुल पेज- 306
प्रकाशक- ट्रांक्विबर
ऑनलाइन कीमत- करीब 500 रुपये
(ये किस्से कुमकुम चड्ढा की किताब- द मेरीगोल्ड स्टोरी से लिए गए हैं.)
Video: कभी पुताई का काम करने वाला यूपी का ये नेता कैसे बना हजारों करोड़ का मालिक?





















