एक कविता रोज़: नदी का जन्म किसी दुख से नहीं हुआ
वे जन्म के बाद के दुख ढो रही हैं.
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एक कविता रोज़ में पढ़िए सत्यार्थ की कविता.
एक कविता रोज़ में आज पढ़िए सत्यार्थ की कविता. सत्यार्थ पेशे से भारतीय पुलिस सेवा में हैं लेकिन उनकी जड़ें आज भी हिंदी से फलती-फूलती हैं. कवितायें लिखने के साथ-साथ पढ़ते भी खूब हैं. आज एक कविता रोज़ में सुनते हैं उनकी कविता 'नदी का जन्म'. ये कविता नदी के कंधे पर बन्दूक रखकर वो गोली चलने का प्रयास करती है, जिससे शायद हम सब चोटिल हैं. आइये पढ़ते हैं उनकी कविता -
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