1
एक लड़का होता है, एक लड़की होती है. दोनों में प्रेम होता है पर मजबूरियां होती हैं, साथ रहना मुमकिन नहीं होता. लड़की जब भी उसके शहर जाती है, उससे बचना चाहती है. मिलना भी चाहती है, देखना भी चाहती है, पर बचना भी चाहती है. लड़के की भी यही कोशिशें होती हैं. जाने का दिन आता है, बेचैनी बढ़ जाती है, फिर भी दिमाग काबू में है, मिलने पर पाबंदी का व्रत बरकरार है.पर साला दिल कमीना होता है, फोन कॉल करवा ही देता है, मिलने बुला भी लेता है. बहाना भी रहता है एक, लड़की की किताब रह गई है, लड़का स्टेशन पहुंचा सकता है.वेन्यू- राजीव चौक मेट्रो स्टेशन. लड़का आता है, लड़की भी अपना सारा लगेज लेकर पहुंचती है. लड़का चुप सा है, पास आकर खड़ा हो जाता है, लड़की नज़रें बचाती है, और भी दोस्त हैं, उनसे बतियाती है. बातें खतम होतीं हैं, दोस्त अपने घरों को निकल जाते हैं. रह जाते हैं लड़का और लड़की. लड़की अब भी नज़रें चुरा रही है.
लड़का : "चलें? ट्रेन का टाइम हो रहा है" लड़की : (धीमी आवाज़ में) "हां" (नज़रें अब तक नीचे हैं). लड़का सूटकेस उठाने लगता है... लड़की : "अरे रहने दो, मैं उठा लूंगी, भारी है" लड़का : " हां, भारी होगा पर किसी की उम्मीदों से भारी तो न होगा, ये उठा लेने दो"लड़की नज़रें उठाती है, लड़के की आंखों में झांकती है. दर्द है. लाज़िम है. लड़की की आंखों में भी वैसा ही कुछ देखा जाता है. पर फिर कुछ यूं होता है कि पल भर को मिली नज़रों में दर्द बांट लिया जाता है, शिकायतें कर ली जातीं हैं, मजबूरियां फिर से दोहराई जाती हैं, एक-दूसरे को दिलासे दिए जाते हैं और फिर. सब ठीक हो जाता है. हवा में जो भारीपन था, घुलता सा जाता है. आराम आ जाता है.
सारी प्रेम कहानियां ही कितनी क्लीशे सी होतीं हैं न?
















.webp?width=275)





