सुमन ने रोना बंद किया और कहीं अतीत में खो गई. वो शुरु से तो ऐसी नहीं थी, और ना उसके हालात ऐसे थे. पर समय कब किसका हुआ है? आज इसका तो कल उसका. सुमन कि शादी आज से ठीक 8 बरस पहले हुई थी, उसके पति मोहन के तब अपने 3 रिक्शे थे. एक तो मोहन खुद चलाता था, बाकी के 2 भाड़े पे दे रखे थे, जीवन सुखमय था, तब सुमन केवल घर गृहस्थी ही देखती थी, तीनों पहर का भोजन आराम से हो जाता था, कभी-कभी तो दोपहर के भोजन में अरहर की दाल भी बन जाया करती थी. पर्व त्यौहारों में दूध-दही का भी जुगाड़ हो जाया करता था. राजन और राजू के जन्म के बाद खर्च थोड़ा बढ़ गया था, पर भूखे रहने कि नौबत कभी नहीं आई थी. आज से ठीक 3 साल पहले एक कार की टक्कर में मोहन को काफी चोट आई थी, माथा फट गया था, खून से मोहन के कपड़े सन चुके थे, किसी राह चलते राहगीर को तरस आ गई और उसने पास के ही एक सरकारी अस्पताल में भरती करवा दिया. खबर किसी तरह सुमन तक पहुंची, खबर सुन वो अस्पताल की तरफ दौड़ चली. छोटे वाले बच्चे को गोद में लिए, और बड़े वाले का हाथ पकड़े, काफी हाथ जोड़ने के बाद तो डॉक्टर ने मोहन को देखना शुरु किया, माथे पर काफी चोट आई थी, जिस कारण ऑपरेशन करना जरुरी था, डॉक्टर ने सुमन से 80,000 की डिमांड कर दी, था तो सरकारी अस्पताल जहां गरीबों का मुफ़्त इलाज होता है, पर उनसे ज्यादा गरीब तो ये सरकारी डॉक्टर होते हैं, जो बिना पैसे लिये पादते भी नहीं है. सुमन के आगे-पीछे कोई नहीं था, मां-बाप तो उसके कानपुर में रहते थे. अब तार लिखवा कर भिजवाने में टाइम लग जाता. अब जो करना था उसे ही करना था, पर वो करती भी क्या? बेचारी रोते-रोते अपने बच्चे को गोद में उठा चल पड़ी घर की तरफ, घर पहुंच कर अपने बचाए पैसों को निकाला और गिनना शुरु किया. कुल 14,600 हुए थे जो उसके और मोहन के 5 साल के बचाए हुए पैसे थे. आखिर इंसान बचाता भी तो इसी दिन के लिए है. पैसे तो कम थे. उसने अपने पडो़स के जीतन से पैसे मांगने उसके घर पहुंच गई. जीतन पेशे से मालाकार था, फूल की उसकी एक छोटी सी दुकान थी, मोहन और जीतन में काफी अच्छे सबंध थे, इसलिये उसने बिना टालमटोल किये 10,000 सुमन के हाथों में लाकर रख दिए, पर इतने में क्या होना था, तभी उसकी नजर अपने जेवरों पर पडी़. एक सोने की अंगूठी छोड़ बाकी सब चांदी के ही थे, आनन-फानन में उसने उसे ले सुनार के पास पहुंची, कुल जेवर को देखने के बाद सुनार ने उसकी कीमत 21,000 लगाई. सुमन की सहमति के बाद उसने उसने रकम देकर जेवर रख लिए. अब भी रुपए काफी कम पड़ रहे थे, उसने निश्चय कर लिया कि वो रिक्शों को बेच देगी. पर अब इतनी जल्दी उसे खरीदेगा कौन? कम से कम 1-2 दिन तो लग ही जाएंगे, यही सोच कर वो अस्पताल की तरफ निकल पडी़, वहां जाकर उसने डॉक्टरों को समझाया कि ऑपरेशन शुरु कर दें बाकी पैसे उन्हे कल मिल जाएंगे, और जो पैसे उसके पास थे उसे उसने डॉक्टरों के हाथ में सौंप दिया, डॉक्टर मान गए थे, और उन सब ने ऑपरेशन की तैयारी शुरू कर दी. सुमन ने किसी तरह से अगले दिन रिक्शों को बेच दिया, जिससे कुल 25000 आ गए, पैसे लेकर वो अस्पताल पहुंची और डॉक्टरों को दे दिया. 3 दिन इलाज चलने के बाद मोहन की तबियत और बिगड़ गई और वो इस मतलबी दुनिया को छोड़ कर चला गया. मोहन के जाने के बाद सुमन किसी के यहां झाडू- पोंछा करने लगी, समय बीतता चला गया. और एक दिन वो भी आया जब सुमन को उस घर में चोरी करनी पड़ी. जिसका अंजाम ये हुआ की उसे वहां से निकाल दिया गया. चोरी करना उसकी मजबूरी थी, छोटे वाले बच्चे कि तबियत ज्यादा खराब हो जाने के कारण उसे ऐसा करना पडा़, अब तो ना पैसे थे और ना ही नौकरी थी. गरीब के बच्चे ना कभी-कभी बिना दवा के ही ठीक हो जाते हैं. एक वो दिन था और एक आज का दिन है, तबसे अब तक सुमन भीख मांग कर ही गुजारा करती है, समय के साथ उसकी झोपड़ी भी अब उसकी न थी, फुटपाथ ही सहारा था. अब तो उसे बस पेट की ही चिंता रहती थी. सुमन वर्तमान में लौट आई. और साथ में अपने दर्द को भी ले आई, अब पूरी तरह से सुबह हो चुकी थी. लेकिन उसके जीवन में तो कितने सालों से अंधेरा ही था. लोग घरों से निकलने लगे, पास के ही कूड़ादान में कूड़ा फेंक चले जाते, सुमन ये देख रही थी, उससे रहा न गया और वो कूड़ादान के पास पहुंच उसे देखने लगी, बारी-बारी से कूड़ा खंगालती कि शायद कुछ खाने को मिल जाए. तभी वहां एक लड़का कूड़ा फेकने वहां पहुंचा, उसे देखकर सुमन ने कूड़ेदान से हाथ बाहर कर लिए, लड़के ने उसे ऐसा करते देख लिया था, उसने सुमन से पूछ दिया कि आप इस कूड़ेदान में क्या ढूंढ रही हैं वो भी इतनी सुबह-सुबह? सुमन क्या जवाब देती? रोने लगी. ये देख लड़के को समझने में देर न लगी कि ये भूखी है, उसने उसे वहां रुकने के लिए कहा, और अपने होस्टल कि तरफ दौड़ लगा दी, कुछ ही मिनट बाद वो वापस आया, साथ में उसके एक पैकेट थी, जिसमें उसने अपने रुम से खाने के लिए कुछ लेते आया था, उसने पैकेट सुमन कि तरफ बढ़ा दी, साथ में उसने एक सौ का नोट भी दिया. सुमन क्या करती? उसने हाथ बढ़ा कर पैकेट ले लिया और उस लड़के के पैर छूकर रोने लगी. लड़के ने उसे उठाया और कहा अरे कोई बात नहीं है, आप इसे खा लीजिए आपको भूख लगी है. सुमन उठ खडी़ हुई और हाथ जोड़ कर कहने लगी -बाबू कोई काम है तो बता दो मैं कर दूंगी बदले में मुझे खाने को कुछ दे देना, दो छोटे बच्चे हैं मेरे, कल से कुछ खाया नहीं है. कहते-कहते सुमन की आंखों से आंसू बहने लगे, लड़के को उस पर दया आ गई, उसने कहा ठीक है, मैं देखता हूं, कुछ होगा तो मैं बताउंगा, यह कह कर लड़का वहां से चला गया.
सुमन खुश थी की अब वो अपने बच्चों को उठते ही खाना खिला सकती थी. अगले दिन सुबह फिर वो लड़का कूड़ा फेकने वहां पहुंचा, उसने आस-पास नजर दौडा़ई तो देखा बगल में ही सुमन और उसके बच्चे सो रहे थे, उसने उन्हे उस समय टोकना उचित न समझा और वहां से लौट गया.शाम को फिर वही लड़का अपने 3 और दोस्तों के साथ वहां पहुंचा. सुमन उस लड़के को पहचान गई थी, उसने हाथ जोड़कर उस लड़के का अभिवादन किया. लड़के ने भी मुस्कुराते हुए अभिवादन स्वीकार कर लिया, और साथ में लाए पैकेट को उसने सुमन के हाथों में दे दिया. जेब से टॉफी निकाल कर दोनों बच्चों को दी. सुमन ने फिर से विनती किया कि बाबूजी कोई काम हो तो.. लड़के ने मुस्कुराते हुए कहा. हम पास के ही होस्टल में रहते हैं, यहां पर पढाई करने आये हैं, हम चारों मजबूरी में होटल में खाते हैं, अगर खाना बना लेंगी तो इसमें आपका भी भला हो जायेगा और हमारा भी. सुमन के चेहरे पर खुशी साफ दिख रही थी, दर्द, दुख, खुशी सब आपस में मिल गए थे, सुमन चाह कर भी कुछ बोल न पाई, बस मुंह हिला दिया, और फिर रोने लगी. लड़के जो सिविल परीक्षा कि तैयारी करने के लिए वहां रहते थे, उन्होंने आपस में तय किया कि 2000 महीने के और साथ में जो भी खाना बनेगा उसमें से सुमन और उसके बच्चों के लिए भी बन जायेंगे. लड़के ने सुमन को 2000 उसी वक़्त दे दिए ताकि वो अपने रहने की और बाकी चीजों की व्यवस्था कर सके. वो कहते है ना समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता, सुमन का समय बदल चुका था, और शायद उसके बच्चों का भी. 6 महीने बीत गए थे सुमन को लड़कों के यहां काम करते-करते, सुमन ने पास में ही एक कमरा ले लिया था 500 महीना पर, रात में जब सुमन खाना बनाने जाती तो राजन और राजू भी साथ हो लेते. जब तक सुमन खाना बनाने और साफ-सफ़ाई में लगी रहती तब तक राजू और राजन को वो लड़के पढ़ाने लगते. समय बीतता चला गया और 6 महीने और बीत गये, उन लड़कों ने अब ये निर्णय लिया कि अब हम सिविल सेवा कि परीक्षा की तैयारियां नहीं करेंगे, अब हम तैयारी करवायेंगे. उन सब ने मिलकर अपना एक कोचिंग सेंटर खोल लिया, और इधर राजन और राजू अब स्कूल जाने लगे, सुमन रोज सुबह उठकर पहले भगवान को धन्यवाद देती फिर उन लड़कों को, जीवन यूंही चलता रहा 20 साल बीत गए. राजन दिल्ली से सीधे कोचिंग सेंटर पहुंचा, उसके आंखों में आंसू थे, आंसू जो खुशी के थे, जो अपनी मां से कह रहे थे, कि अब दर्द नहीं होगा मां, अब रात खाली नहीं जाएगी, अब हर दिन सुबह होगा. राजन मां के पैर छूने के लिए आगे बढ़ा, सुमन ने उसे वही रोक दिया, और लड़कों कि तरफ इशारा किया, राजन ने मुस्कुराते हुए पहले उन चारों लड़कों के पैर छुए, फिर अपनी मां का, ये देख राजू भी भीगी आंखों से मुस्कुरा रहा था. आज इंसानियत जीत गई थी, जिसके सामने भगवान को भी मजबूर होना पडा़ था, जब जुनून कि आंधी बहती है, तो हर दर्द उससे डरता है, फिर तो न दर्द होता है ना उसका एहसास होता है, बस जुनून होता है.
'उसके चेहरे पर पालक की कोमलता, हरी मिर्चों की खुशबू पुती थी'