The Lallantop

जब एक खबर ने तबाह कर दी ओलंपिक चैंपियन की जिंदगी

जीत के भी हार गए. गोल्ड जीता और जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं बची.

Advertisement
post-main-image
जिम फ्रांसिस
1932 लॉस एंजिलस ओलंपिक स्टेडियम के दरवाजे पर एक आदमी खड़ा था. फटे-पुराने कपड़े, जेब में फूटी कौड़ी तक नहीं और इच्छा ओलंपिक देखने की. यह आदमी था 1912 ओलंपिक खेलों में भारी अंतर से 2 स्वर्ण जीतने वाला जिम फ्रांसिस थॉर्प. लेकिन अब वो इतने गरीब हो चुके थे कि ओलंपिक देखने तक के पैसे नहीं थे. जिम थॉर्प की कथा ओलंपिक इतिहास की सबसे दर्दनाक कहानी है. एक गरीब रेड इंडियन परिवार में पैदा हुए जिम ने सरकारी स्कूल में अपनी पढ़ाई पूरी की. वहीं से उसकी जबरदस्त खेल प्रतिभा उभरकर सामने आई और 1912 के ओलंपिक खेलों के लिए चयन हुआ. jim 1 ओलंपिक में जिम ने सबसे मुश्किल समझे जाने वाली पांच खेलों वाली पेंटाथलन और दस खेलों वाली डैकाथलन प्रतियोगिताओं में भारी अंतर से सोना जीता. वो अमेरिका के लिए गोल्ड जीतने वाले पहले मूलनिवासी थे. अमेरिका पहुंचने पर जिम का जोरदार स्वागत हुआ, लेकिन 1913 में खबर आई कि जिम थॉर्प ने 1909 और 1910 में बेसबॉल लीग में खेलने के लिए 25 डॉलर हफ्तावार मेहनताना लिया था. ओलंपिक में खाली गैर-पेशेवर खिलाड़ी भाग ले सकते हैं. लीग वगैरह में भाग लेने वाले पेशेवर खिलाड़ी ओलंपिक नहीं खेल सकते. जैसे भारत के विजेंद्र सिंह आजकल पेशेवर लीग खेल रहे हैं वो ओलंपिक के लिए नहीं जा सकते. कुछ मैचों के लिए मामूली सी रक़म लेने वाले ग़रीब जिम थॉर्प ने ईमानदारी से मान भी लिया कि मैंने बेसबॉल लीग खेली और मुझे ये पता भी नहीं था कि पेशेवर क्या होता है ?

और फिर पदक छीन लिए गए

कुछ स्वार्थी पत्रकारों ने इस बात को तूल दे दिया कि जिम थॉर्प पेशेवर खिलाड़ी थे जो अच्छा खासा पैसा कूट रहे थे. और जिम थॉर्प के पदक छीन लिए गए. फैसला हुआ नंबर 2 रहने वाले स्वीडिश खिलाड़ी ह्यूगो विस्डलेंडर को गोल्ड दिया जाए. लेकिन ह्यूगो ने गोल्ड लेने से साफ इंकार कर दिया.
कुछ समाचार-पत्र और पत्रकार लगातार जिम थॉर्प को पदक वापिस दिलाने की कोशिश करते रहे. उन्हें लोगों से उपहार और मीडिया का प्यार भी मिला. 1950 में उन्हें अर्ध शताब्दी का श्रेष्ठ एथलीट घोषित किया गया. पर बेहद गरीबी और गुमनामी में 1953 में जिम थॉर्प का देहांत हो गया.
1972 में एक पत्रकार रॉबर्ट व्हीलर ने जिम थॉर्प का मामला फिर खोला और नियमों का हवाला देकर बताया कि उस पत्रकार को थॉर्प के खिलाफ शिकायत 30 दिन के अंदर करनी चाहिए थी. अमेरिकी सीनेट ने भी पदक लौटाने की मांग की. जब समारांच ओलंपिक समिति के अध्यक्ष बने तो कार्यकारी बोर्ड ने जिम थॉर्प को पदक लौटाने का फैसला लिया. उस कार्यकारी बोर्ड में भारत के अश्विनी कुमार भी थे. भारतीय हॉकी संघ के अध्यक्ष रहे अश्विनी कुमार ने भारत की हॉकी टीम को ओलंपिक भेजने के लिए अपनी कुछ संपत्ति तक बेच डाली थी. उसकी बात फिर कभी.

वो जिंदा रहेंगे अपने गांव के नाम में

आखिरकार 11 साल की लंबी कोशिशों के बाद जनवरी 1983 में उसी लॉस एंजिलस में एक भव्य समारोह हुआ और जिम थॉर्प को पदक वापिस लौटाए गए. किस्मत का पहिया देखिए क्या-क्या कमाल करता है, जिम 1932 में फटेहाल जिस ओलंपिक स्टेडियम के बाहर खड़े थे, 52 साल बाद 1984 में उसी लॉस एंजिलस में ओलंपिक खेलों की ओर से ओलंपिक मशाल लेकर दौड़ने वाले प्रथम एथलीट होने का सम्मान मिला जिम थॉर्प के पोते बिल थॉर्प को. जिम थॉर्प यह सब न देख पाए लेकिन वो ज़िंदा रहेंगे अपने गांव के नाम में जिसे ‘जिम थॉर्प टाउन’ कहा जाता है.

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement