इस मामले में एक बड़ा सवाल पुलिस पर भी है. सवाल, जैसे कि पुलिस भीड़ को रोकने में नाकाम क्यों रही? ब्लैक प्रोटेस्टर्स के साथ ग़ैरज़रूरी हिंसा करने वाली पुलिस ने दंगाई भीड़ के साथ नरमी क्यों दिखाई? मौके से जुड़े एक विडियो में एक पुलिस अफ़सर दंगाई के साथ सेल्फ़ी लेता भी दिखा. क्या ये बर्ताव दंगाइयों की गोरी चमड़ी और पुलिसिया सिस्टम पर हावी नस्लवाद का नतीज़ा थी?

अमेरिकी संसद पर हमला करते हुए ट्रंप समर्थक. (तस्वीर: एपी)
इन सवालों और अनुमानित कार्रवाइयों से इतर इस मामले में एक बड़ी अपडेट फ़ेसबुक से भी आई है. उसने ट्रंप को बैन कर दिया है. ट्रंप कम-से-कम 20 जनवरी तक फ़ेसबुक पर कुछ पोस्ट नहीं कर सकेंगे. मार्क ज़करबर्ग ने ख़ुद इस फ़ैसले का ऐलान किया. उन्होंने एक लंबी पोस्ट लिखकर बताया कि ट्रंप को बैन किया जाना ज़रूरी है. वो शांति से पावर ट्रांसफ़र नहीं होने देना चाहते हैं. ऐसे में उन्हें फ़ेसबुक इस्तेमाल करने देने का रिस्क नहीं लिया जा सकता है.
आमतौर पर बेहद कैलकुलेटिव और मिडियॉकर बर्ताव करने वाले ज़करबर्ग के स्टैंडर्ड से देखिए, तो ये फ़ैसला बड़ा साहसी लगेगा. मगर क्या ये सच में साहसी है? उन्हें सच में फ़ेसबुक के दुरुपयोग से माहौल के बिगड़ने का अंदेशा है या उनकी ये नैतिकता दिखावटी है? ट्रंप पर अब बैन लगाने से पहले ज़करबर्ग का क्या रवैया था?

मार्क ज़करबर्ग ने एक लंबी पोस्ट लिखकर बताया कि ट्रंप को बैन किया जा रहा है. (तस्वीर: फेसबुक)
ज़करबर्ग ने बहुत जोड़-घटाव करके अपने पत्ते खेले हैं?
ये बात 2016 के अमेरिकी चुनाव की है. 8 नवंबर को इलेक्शन हुआ. 9 नवंबर को स्पष्ट हो गया कि डॉनल्ड ट्रंप अगले राष्ट्रपति बन रहे हैं. लोग इस इलेक्शन रिज़ल्ट का पोस्टमॉर्टम करने लगे. सबसे बड़ा सवाल था कि ट्रंप जीते कैसे? जिस आदमी को सबने रिज़ेक्ट किया, सर्वे कहते रहे कि वो हारेगा, वो आदमी जीता कैसे? कई व्याख़्याएं थीं इस जीत की. मगर एक चीज थी, जिसकी भूमिका पर तकरीबन हर जानकार सहमत था. ये चीज थी, फ़ेसबुक. ट्रंप कैंपेन के सबसे अहम आदमी, इस अभियान के डिजिटल मीडिया डायरेक्टर ब्रैड पारस्केल के शब्दों में कहें, तो फ़ेसबुक ही वो मैथड था, जिसने ट्रंप को जीत दिलाई. यही वो हाईवे था, जिसपर कार चलाकर ट्रंप विनिंग पोस्ट तक पहुंचे.

ब्रैड पारस्केल ट्रंप के चुनावी अभियानों के डिजिटल मीडिया डायरेक्टर रहे हैं. (तस्वीर: एपी)
फ़ेसबुक और ट्रंप का कनेक्शन समझने से पहले ब्रैड पारस्केल को जानिए
पारस्केल एक छोटे-मोटे डिजिटल मार्केटर हुआ करते थे. उनकी एक छोटी सी कंपनी थी, जो छोटे-मोटे क्लाइंट्स के लिए वेबसाइट्स बनाती थी. इसी सिलसिले में वो ट्रंप के संपर्क में आए. हुआ ये कि 2012 में ट्रंप आर्गनाइज़ेशन को एक वेबसाइट बनवानी थी. सर्विस के लिए सबसे कम कीमत बताई पारस्केल की कंपनी ने. सो उन्हें ये कॉन्ट्रैक्ट मिल गया. इसके बाद उन्हें ट्रंप के बिज़नस ग्रुप में और भी काम मिले. ट्रंप के दामाद समेत परिवार के कई सदस्यों से उनकी हेल-मेल हो गई. 2015 में जब ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव में खड़े होने की सोची, तब उन्हें अपनी एक वेबसाइट बनाने की सलाह दी गई. करीब 1,500 डॉलर लेकर उनकी ये वेबसाइट पारस्केल ने ही बनाई थी.
वो पारस्केल ही थे, जिन्होंने ट्रंप के दामाद और उनके कैंपेन मैनेज़र जेरेड कुशनर को चुनाव प्रचार के लिए फ़ेसबुक पर ध्यान देने के लिए मनाया था.

ट्रंप के दामाद और उनके कैंपेन मैनेज़र जेरेड कुशनर. (तस्वीर: एपी)
क्या आइडिया था पारस्केल का?
देखिए, हम में से कइयों को ग़लतफ़हमी है कि फ़ेसबुक बस फ़ोटो डालने और दोस्तों के साथ कनेक्ट करने का प्लेटफ़ॉर्म है. असलियत में ये प्लेटफ़ॉर्म डिजिटल मार्केटिंग का एक शानदार ज़रिया है.
फ़ेसबुक के सर्च-इंजन ऑप्टिमाइज़ेशन टूल्स आपकी ही दी गई जानकारियों के हिसाब से आपकी कैटगरी बनाते हैं. वो जानते हैं कि उनका यूज़र किस उम्र और आय वर्ग का है. उसकी पसंद-नापसंद, लाइफ़स्टाइल, दिलचस्पी, सब मालूम है फ़ेसबुक को. इसीलिए वो अपने क्लाइंट्स को सीधे उनके टारगेट उपभोक्ता से जोड़ता है. ताकि कंपनी सीधे अपने संभावित ग्राहक को विज्ञापन दिखा सके. ये ऐसा ही है, मानो किसी सेल्समैन को एक लिस्ट थमा दी जाए. बताया जाए कि इस मुहल्ले में ये 20 घर हैं, जो तुम्हारा सामान खरीद सकते हैं.
मार्केटिंग के शब्दों में देखिए, तो चुनाव भी प्रॉडक्ट बेचने की एक प्रक्रिया है. इसमें आपको कपड़े और फूल की जगह एक कैंडिडेट को बेचना है. आपको पहचान करनी है कि कौन से लोग आपके कैंडिडेट की विचारधारा के सपोर्टर हैं या हो सकते हैं. फिर आप टारगेटेड विज्ञापनों के ज़रिये उनका सपोर्ट पक्का कर सकते हैं. ज़रूरी नहीं कि सपोर्ट हासिल करने की ये प्रक्रिया नैतिक ही हो. मिसगाइड और मैनिप्युलेट करके भी लोगों को किसी एक ख़ास कैंडिडेट के लिए वोट करने को तैयार किया जाता है. इतना ही नहीं, दुष्प्रचार करके, फ़र्जी और भ्रामक जानकारियां फैलाकर, नेगेटिव इमेज बनाकर भी विरोधी कैंडिडेट के सपोर्ट बेस में सेंध मारी जा सकती है.
2016 चुनावों में फ़ेसबुक ट्रंप के लिए सबसे बड़ा वरदान बना
आरोप है कि पारस्केल ने फ़ेसबुक के सहारे ट्रंप के लिए ये सब किया. उन्होंने केवल ट्रंप की पॉज़िटिव और लार्जर दैन लाइफ़ छवि ही नहीं बनाई. बल्कि नेगेटिव कैंपेन के ज़रिये हिलरी क्लिंटन की छवि भी ख़राब की. कभी किसी फ़ेक विडियो में हिलरी को ड्रग्स लेते हुए दिखाया गया. कभी उनके यहूदी-विरोधी होने के कार्टून्स वायरल कराए गए. कभी पुतिन के साथ उनके गुप्त संबंधों की कन्सपिरेसी थिअरी फैलाई गई.

हिलरी क्लिंटन. (तस्वीर: एपी)
ट्रंप कैंपेन ने इस चुनाव में फ़ेसबुक पर तकरीबन 60 लाख विज्ञापन चलाए. जबकि हिलरी कैंपेन ने केवल 66 हज़ार विज्ञापन दिए फ़ेसबुक पर. जानकार मानते हैं कि फ़ेसबुक के प्रभाव को समझना 2016 में ट्रंप कैंपेन के लिए सबसे बड़ा वरदान बना.
इसीलिए जब चुनाव के नतीज़े आए, तो फ़ेसबुक पर उंगलियां उठीं. इसलिए नहीं कि उसने मार्केटिंग के ज़रिये मुनाफ़ा कमाया. बल्कि इसलिए कि उसने अपने प्लेटफ़ॉर्म का बेजा इस्तेमाल होने दिया. उसने राजनैतिक मंशा से प्रेरित फ़र्ज़ी ख़बरों को प्रमोट किया. सनसनीखेज़ और भ्रामक जानकारियां फैलने दीं. झूठे दावों का प्रचार कर ग़लत नरैटिव गढ़ने दिया. इल्ज़ाम लगा कि ऐसा करके फ़ेसबुक ने चुनावी प्रक्रिया और उसके नतीजों को प्रभावित किया है.
इन आरोपों पर मार्क ज़करबर्ग की क्या प्रतिक्रिया थी?
उन्होंने कहा कि ये आरोप भ्रामक हैं. चुनाव के दो रोज़ बाद, यानी 10 नवंबर, 2016 को ज़करबर्ग हाफ़ मून बे शहर में आयोजित एक टेक कॉन्फ़्रेंस में पहुंचे. यहां अपने ऊपर उठ रहे सवालों के जवाब में ज़करबर्ग ने कहा-
ये कहना कि फ़ेसबुक पर मौजूद फ़ेक न्यूज़ ने चुनाव को प्रभावित किया, पागलपन है. ये सोचना कि लोगों ने फ़ेक न्यूज़ देखकर, उससे प्रभावित होकर वोट दिया होगा, ग़लत है. मतदाता अपने असल जीवन में अर्जित अनुभवों के आधार पर वोट डालते हैं.

2016 चुनावों के बाद ज़करबर्ग ने सवालों के जवाब में कहा था कि फेसबुक पर लगाए गए आरोप भ्रामक हैं. (तस्वीर: एपी)
क्या ज़करबर्ग का ये दावा सही था?
जवाब है, नहीं. उनका ये बयान उनकी ही बिज़नस स्ट्रैटजी का विरोधाभासी है. फ़ेसबुक का बिज़नस मॉडल हमारे ऑनलाइन और ऑफ़लाइन जीवन में बंटवारा नहीं करता. वो मानता है कि हमारा ऑफ़लाइन स्वभाव हमारी ऑनलाइन ऐक्टिविटी तय करता है. हम कौन सा विडियो देखते हैं, किस कॉन्टेंट को लाइक करते हैं, किन आर्टिकल्स को पढ़ते हैं, किन दावों पर यकीन करते हैं, ये सारी चीजें फ़ेसबुक के लिए हमारी पर्सनैलिटी को जानने का माध्यम हैं. उसका अल्गॉरिदम इसी आधार पर तय करता है कि हमें अपनी न्यूज़ फीड में क्या दिखाया जाए. हमें कौन से प्रॉडक्ट बेचे जाएं.
फ़ेसबुक के एक अधिकारी ने ज़करबर्ग के 10 नवंबर, 2016 वाले बयान को खारिज़ करते हुए एक इंटरव्यू में 'न्यू यॉर्कर' मैगज़ीन से कहा था-
पिछले एक दशक से हम अपने विज्ञापनदाताओं को बताते आए थे कि हम उन्हें सीधे उनके टारगेटेड ग्राहक से कनेक्ट कर सकते हैं. हम तय कर सकते हैं कि वो सामान खरीदे कि नहीं. हम तय कर सकते हैं कि यूज़र हमारे क्लाइंट की ज़रूरतों के हिसाब से बर्ताव करे. मगर फिर ट्रंप जीत गए. और ज़करबर्ग ने कहना शुरू किया कि हमने तो कुछ नहीं किया. हमारे पास ऐसी पावर ही कहां. हम तो जी बस एक प्लेटफ़ॉर्म हैं, जहां आप अपने कुत्ते की फ़ोटो शेयर कर सकते हैं. ये दावे बकवास हैं.क्या 2016 चुनाव के बाद फ़ेसबुक की भूमिका बदल गई?
जवाब है, नहीं. ट्रंप सोशल मीडिया अडिक्ट हैं. सबसे ज़्यादा, ट्विटर और फ़ेसबुक. कोई बयान देना हो. किसी योजना का ऐलान करना हो. वो ये सब ट्विटर और फ़ेसबुक पर करते हैं.
ऐसा करने में कोई आपत्ति भी नहीं. आपत्ति तब है, जब ट्रंप इन प्लेटफ़ॉर्म्स के सहारे फ़ेक न्यूज़ फैलाएं. सांप्रदायिक और नस्लीय नफ़रत भड़काएं. विरोधियों पर बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाएं. सरकारी और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति लोगों के मन में शंका पैदा करें. बतौर राष्ट्रपति भी ट्रंप की सोशल मीडिया फीड का एक बड़ा हिस्सा ऐसी ही आपत्तिजनक चीजों पर केंद्रित था. उन्होंने ट्विटर और फ़ेसबुक को प्रॉपेगैंडा फैलाने का औज़ार बना लिया. मगर ये टेक कंपनियां चुप रहीं. लगातार मांग उठती रही कि वो ट्रंप के मामले में भी गाइडलाइन्स और कम्युनिटी स्टैंडर्ड का नियम फॉलो करें. मगर ये टेक कंपनियां ट्रंप के सारे गुनाह अनदेखा करती रहीं.

ट्रंप 2016 में अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे. (तस्वीर: एपी)
जब ज़करबर्ग ने मानी ग़लती
ट्विटर भी आरोपों से अछूता नहीं था. मगर सबसे ज़्यादा विवादित थी फ़ेसबुक की भूमिका. फिर जब कैम्ब्रिज़ ऐनालिटिका द्वारा इसके डेटा के राजनैतिक इस्तेमाल का खुलासा हुआ, तो फ़ेसबुक की स्थिति और ख़राब हो गई. उन्हें अमेरिकी संसद में पेशी के लिए बुलाया गया. अब ज़करबर्ग के लिए आरोपों को खारिज़ करना मुमकिन नहीं था. सो उन्होंने इल्ज़ाम स्वीकारने की रणनीति बनाई. 2018 में उन्होंने मीडिया के आगे फ़ेसबुक के ग़लत इस्तेमाल पर माफ़ी मांगी. उन्होंने कहा कि फ़ेसबुक ने अपने टूल्स के ग़लत इस्तेमाल को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए. फ़ेक न्यूज़, चुनाव में विदेशी दखलंदाज़ी और हेट स्पीच जैसी चीजों को रोकने में भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई. ज़करबर्ग बोले कि ऐसा करके उन्होंने बहुत बड़ी ग़लती की है.

कैम्ब्रिज़ ऐनालिटिका मामले में फेसबुक ने अपनी गलती मानी थी. (तस्वीर: एपी)
मगर इस स्वीकारोक्ति के बाद भी ज़करबर्ग ने अपने प्लेटफ़ॉर्म के ग़लत इस्तेमाल को रोकने के लिए कुछ ठोस नहीं किया. ट्रंप के संदर्भ में बात करें, तो ज़करबर्ग ने कुछ भी नहीं किया. क्या इसकी एक बड़ी वजह ये थी कि वो अमेरिकी राष्ट्रपति की बैड बुक्स में नहीं आना चाहते थे? शायद हां. मसलन, सितंबर 2019 की एक घटना सुनिए.
इस महीने न्यू यॉर्क के अटॉर्नी जनरल ने ऐलान किया कि फ़ेसबुक पर ऐंटीट्रस्ट क़ानून के उल्लंघन की जांच होगी. इस ऐलान के करीब एक हफ़्ते बाद ज़करबर्ग वॉशिंगटन पहुंचे. मकसद था, अपने हितों के लिए वॉशिंगटन डीसी के राजनैतिक सर्कल में लॉबिंग करना. ट्रंप के दामाद की मदद से वो राष्ट्रपति से मिलने ओवल ऑफ़िस पहुंचे. इस मीटिंग के एक महीने बाद ट्रंप ने ज़करबर्ग को वाइट हाउस के एक प्राइवेट डिनर में भी आमंत्रित किया. इस डिनर की बात कई हफ़्तों तक राज़ रही थी. न्यू यॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस डिनर में ज़करबर्ग ने ट्रंप की ख़ूब चाटुकारिता की.
फ़ेसबुक कोई डेमोक्रेसी नहीं है
एक तरफ जहां ज़करबर्ग फ़्लैटरी के सहारे अपने व्यावसायिक हित सुरक्षित कर रहे थे, वहीं उनकी कंपनी के लोग उनसे नाराज़ थे. इसकी वजह थी, ज़करबर्ग की पॉलिसी. उन्होंने अभिव्यक्ति की आज़ादी का हवाला देकर कहा कि फ़ेसबुक पॉलिटिशन्स की बातों को रेगुलेट नहीं करेगा. अगर कोई पार्टी या नेता राजनैतिक विज्ञापन के नाम पर झूठ भी बोले, नफ़रत भी भड़काए, तब भी फ़ेसबुक कोई कार्रवाई नहीं करेगा. ज़करबर्ग के मुताबिक, वो पंचायत लगाकर नहीं बैठे. उनका काम सरपंच बनना, सही-ग़लत तय करना नहीं है.

ज़करबर्ग की पॉलिसी को लेकर सवाल उठते रहे हैं. (तस्वीर: एपी)
ज़करबर्ग की इस पॉलिसी से उनके अपने एम्पलॉयी खफ़ा थे. 250 से ज़्यादा फ़ेसबुक स्टाफ ने एक इन्टर्नल मेमो पर दस्तख़त करके अपील की. कहा कि फ्री स्पीच और पेड स्पीच, दो अलग चीजें हैं. पैसे लेकर क्लाइंट को झूठ बोलने, प्रॉपेगैंडा फैलाने के लिए मंच देना अभिव्यक्ति की आज़ादी कतई नहीं. एम्पलॉइज़ का कहना था कि फर्ज़ी और भ्रामक जानकारियां फैलाने में मदद करके फ़ेसबुक ग़लत कर रहा है. फ़ेसबुक के एक ओपन सेशन में कई कर्मचारियों ने सबके आगे ज़करबर्ग की पॉलिसी पर सवाल भी उठाए. इनके जवाब में ज़करबर्ग बोले-
मेरी कंपनी कोई डेमोक्रेसी नहीं है. यहां मैं फ़ैसले लेता हूं.अब आते हैं, 2020 पर
ये साल अहम था. एक तरफ कोरोना. दूसरी तरफ, नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव. ऊपर से, ब्लैक अधिकारों से जुड़ा आंदोलन. तीनों मामलों में सोशल मीडिया पर फेक़ न्यूज़ और हेट स्पीच की बाढ़ आ गई. ट्रंप ने भी इनमें बड़ा योगदान दिया. कभी वो चुनावी निष्पक्षता पर निराधार शंका जताते. कभी कोरोना से बचाव के लिए डिसइन्फेक्टेंट का इंजेक्शन लेने की सलाह देते. कभी ब्लैक प्रोटेस्टर्स के खिलाफ़ हिंसा की धमकी देते. ट्विटर और फ़ेसबुक पर फिर से ट्रंप के खिलाफ़ ऐक्शन लेने का प्रेशर बढ़ा.
मई 2020 में आकर ट्विटर ने पहली बार ट्रंप के एक भड़काऊ ट्वीट पर ऐक्शन लिया. लोगों ने कहा, चलो बहुत देर से ही सही, अपर्याप्त सही, मगर ट्विटर ने कुछ तो किया. मगर फ़ेसबुक ने यहां भी निराश किया. ज़करबर्ग ने ट्विटर की चुटकी ली. कहा-
फ़ेसबुक सरपंच नहीं है. लोग ऑनलाइन क्या डालते हैं, उसका सही-ग़लत क्या है, फ़ेसबुक ये तय नहीं कर सकता. सोशल मीडिया से जुड़ी किसी भी प्राइवेट कंपनी को ये पंचायत नहीं करनी चाहिए.ज़करबर्ग के इस बयान का अनुवाद कीजिए, तो मतलब निकलेगा कि उनकी कंपनी के बनाए प्रॉडक्ट से दंगे भड़कें, हिंसा हो, समाज बंटे, क़ानून-व्यवस्था बिगड़े, राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित हो, लेकिन वो कुछ नहीं करेंगे. क्यों? क्योंकि ये उनके बिज़नस इंट्रेस्ट को सूट नहीं करता. बाद के दिनों में जैसे-जैसे चुनाव पास आता गया, माहौल भड़कता गया. ट्रंप लगातार माहौल ख़राब करते रहे. संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर निराधार सवाल उठाते रहे. बहुत प्रेशर बढ़ने पर फ़ेसबुक ने ट्रंप के फ़र्जी दावों का फ़ैक्ट चेक करना शुरू किया. मगर जानकारों ने कहा, ये नाकाफ़ी है.
रिज़ल्ट आने के बाद भी ट्रंप ने हार नहीं मानी!
वो लगातार कन्सपिरेसी थिअरीज़ सुलगाते रहे. लोगों के मन में रिज़ल्ट की वैधता पर शंका भरते रहे. उन्होंने समाज को बांटा. नफ़रत भड़काई. सपोर्टर्स को लामबंद किया. और इसी का नतीजा दिखा, 6 जनवरी को. इस रोज़ ट्रंप द्वारा महीनों से बांटी जा रही ख़तरनाक ख़ुराक ने अपना सबसे भीषण रूप दिखाया. उनकी ही अपील पर उनके समर्थकों ने चुनावी नतीज़ा पलटने की मंशा से कैपिटल बिल्डिंग पर हमला किया. ये हथियारबंद भीड़ पूरी तैयारी से हमला करने आई थी.

फ़ेसबुक ने ट्रंप के फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम पेज को ब्लॉक तौर पर ब्लॉक कर दिया है. (तस्वीर: फ़ेसबुक)
इस हमले के बाद ज़करबर्ग ने मोरल हाई ग्राउंड लिया है. ट्रंप को बैन करने के फ़ैसले का समर्थन करते हुए ज़करबर्ग ने अपने बयान में लिखा-
पिछले कई सालों से हमने राष्ट्रपति ट्रंप को अपना प्लेटफ़ॉर्म इस्तेमाल करने दिया. हमारा मानना था कि जनता को नेताओं की बात सुनने का अधिकार है. राजनैतिक अभिव्यक्ति जितना अधिक-से-अधिक हो सके, पब्लिक की पहुंच में हो. फिर भले वो राजनैतिक अभिव्यक्ति विवादित क्यों न हो. मगर मौजूदा मुद्दा बिल्कुल अलग है. हमारे मंच का इस्तेमाल कर एक लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के खिलाफ़ हिंसा भड़काई गई. हमें लगता है कि राष्ट्रपति ट्रंप को उनके बचे हुए कार्यकाल में अपना मंच इस्तेमाल करने देना जोख़िम का काम है. इसीलिए हम अस्थायी तौर पर उन्हें फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम पर ब्लॉक कर रहे हैं.ज़करबर्ग का ये बयान अवसरवादी है. ट्रंप ने पहली बार हिंसा नहीं भड़काई. ट्रंप ने पहली बार बाइडन की जीत को अंडरमाइन नहीं किया. ट्रंप ने पहली बार लोकतांत्रिक परंपरा पर आघात नहीं किया. ट्रंप लगातार ऐसा करते आए थे. 6 जनवरी को हुई हिंसा एक लंबे प्रॉसेस, एक व्यापक मिसइनफ़ॉर्मेशन कैंपेन का नतीजा है. वही कैंपेन, जिसपर ऐक्शन लेने से ज़करबर्ग समेत बाकी सोशल मीडिया कंपनियां इनकार करती आई थीं. अब ट्रंप जा रहे हैं. उनका कार्यकाल ख़त्म हो रहा है. शायद इसीलिए ज़करबर्ग को अब अपने मंच के हिंसक इस्तेमाल की चिंता हुई है. शायद इसीलिए अब इतनी देर बाद उन्हें ऐक्शन लेना याद आया.





















