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सिनेमा हॉल में लैपटॉप, वायरल वीडियो ने खोली भारत के 'टॉक्सिक वर्क कल्चर' की पोल

India’s Toxic Work Culture: सिनेमा हॉल में 'धुरंधर-2' फिल्म के दौरान लैपटॉप पर काम करती महिला का वीडियो वायरल हुआ है. क्या ये भारतीय ऑफिसों के टॉक्सिक वर्क कल्चर की सच्चाई है?

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वर्क फ्रॉम ‘धुरंधर’! सिनेमा हॉल में लैपटॉप, डेडिकेशन है या मजबूरी? (फोटो- इंस्टाग्राम)

पिक्चर हॉल में अंधेरा है. स्क्रीन पर 'धुरंधर-2' के एक्शन सीन चल रहे हैं. लोग सीटी बजा रहे हैं, पॉपकॉर्न खा रहे हैं. लेकिन इसी बीच एक कोने से नीली रोशनी चमक रही है. ये रोशनी फिल्म की नहीं, बल्कि एक लैपटॉप की है. एक महिला रात के 11 बजे के शो में, थिएटर की सीट पर बैठकर ऑफिस का काम निपटा रही है. 

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सोशल मीडिया पर ये वीडियो आग की तरह फैल गया है. लोग पूछ रहे हैं कि भाई, ये कौन सा डेडिकेशन है? या फिर ये वो मजबूरी है जिसे हम 'टॉक्सिक वर्क कल्चर' कहते हैं?

आज के इस मेगा एक्सप्लेनर में हम इसी वायरल वीडियो के बहाने उस वर्क कल्चर का पोस्टमार्टम करेंगे, जो धीरे-धीरे हमारी निजी जिंदगी को निगल रहा है.

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क्या है पूरा मामला? वायरल वीडियो की हकीकत

घटना दिल्ली-NCR के एक नामी मॉल के सिनेमा हॉल की बताई जा रही है. फिल्म लगी थी 'धुरंधर-2', जो इन दिनों बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा रही है. शो का वक्त था रात के 11 बजे. आमतौर पर लोग इस वक्त रिलैक्स करने आते हैं, लेकिन वहां मौजूद एक दर्शक ने देखा कि उसके आगे वाली लाइन में बैठी एक महिला फिल्म देखने के बजाय कीबोर्ड पर उंगलियां चला रही है. 

उसने वीडियो बनाया और इंटरनेट पर डाल दिया. आगे बढ़ने से पहले वो वीडियो आप भी देख लीजिए.

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अब बात निकली तो दूर तलक जानी ही थी. देखते ही देखते 'Woman working on laptop in movie theatre' गूगल पर टॉप ट्रेंड बन गया. मेन स्ट्रीम मीडिया पर भी ये खबर बन गई.

वीडियो में साफ दिख रहा है कि महिला का पूरा ध्यान एक्सेल शीट या ईमेल पर है. बैकग्राउंड में फिल्म का शोर है, लेकिन उसके लिए शायद ऑफिस की डेडलाइन उस शोर से ज्यादा बड़ी थी. 

वीडियो वायरल होने के बाद बहस छिड़ गई है. कुछ लोग इसे 'हसल कल्चर' (Hustle Culture) का नाम देकर तारीफ कर रहे हैं, तो बड़ी आबादी इसे मानसिक गुलामी और निजी जीवन के खत्म होने का संकेत मान रही है.

ये 'हसल' है या 'टॉक्सिक' कल्चर की इंतहा?

भारत में पिछले कुछ सालों में 'हसल कल्चर' यानी हर वक्त काम में जुटे रहने को एक मेडल की तरह पेश किया गया है. बड़े-बड़े स्टार्टअप फाउंडर्स कहते हैं कि अगर आप हफ्ते में 70-80 घंटे काम नहीं कर रहे, तो आप पीछे छूट जाएंगे. लेकिन क्या ये वाकई तरक्की है? सिनेमा हॉल में लैपटॉप खोलना इस बात का सबूत है कि अब काम की कोई सीमा (Boundaries) नहीं बची है.

विशेषज्ञों का मानना है कि जब ऑफिस आपके बेडरूम से लेकर आपके सिनेमा हॉल की सीट तक पहुंच जाए, तो समझ लीजिए कि वर्क-लाइफ बैलेंस का जनाजा निकल चुका है. ये उस 'टॉक्सिक वर्क कल्चर' का हिस्सा है जहां कर्मचारी को ये महसूस कराया जाता है कि अगर उसने तुरंत रिप्लाई नहीं किया, तो उसकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है.

क्या कंपनियां आपकी निजी जिंदगी निगल रही हैं?

इस वायरल वीडियो पर जेन-जी (Gen Z) और मिलेनियल्स (Millennials) के बीच जबरदस्त बहस है. युवाओं का कहना है कि कंपनियां अब 'फ्लेक्सिबल वर्किंग ऑवर्स' के नाम पर आपको 24 घंटे ऑन-ड्यूटी रखती हैं. वर्क फ्रॉम होम या हाइब्रिड मॉडल ने घर और दफ्तर के बीच की दीवार गिरा दी है. मैनेजर को लगता है कि अगर आपके पास लैपटॉप है, तो आप रात के 12 बजे भी रिपोर्ट भेज सकते हैं.

गूगल के एक सर्वे के मुताबिक, भारत उन देशों में शामिल है जहां लोग सबसे ज्यादा 'बर्नआउट' (Burnout) का शिकार होते हैं. बर्नआउट का मतलब है काम के बोझ से होने वाली शारीरिक और मानसिक थकान. जब आप फिल्म देखते वक्त भी रिलैक्स नहीं कर पाते, तो आपका दिमाग कभी शांत नहीं होता. इसका सीधा असर आपकी मेंटल हेल्थ पर पड़ता है.

वीडियो के पीछे का सच

अगर हम थोड़ा गहराई से सोचें, तो इसके दो पहलू हो सकते हैं. पहला, क्या पता उस महिला पर वाकई बहुत ज्यादा प्रेशर हो? शायद कोई 'अर्जेंट' काम आ गया हो जिसे न करने पर उसकी जॉब पर आंच आ सकती थी. 

दूसरा पहलू ये भी हो सकता है कि हमने अनजाने में काम को अपनी पहचान बना लिया है. हम भूल गए हैं कि हम काम इसलिए करते हैं ताकि जी सकें, हम जीने के लिए काम नहीं कर रहे हैं.

सिनेमा हॉल में लैपटॉप चलाना न सिर्फ उस महिला के लिए तनावपूर्ण है, बल्कि आसपास बैठे लोगों के लिए भी डिस्टर्बिंग है. लैपटॉप की स्क्रीन की लाइट दूसरों के सिनेमा देखने के अनुभव को खराब करती है. ये दिखाता है कि काम का दबाव हमें सामाजिक शिष्टाचार (Basic Etiquettes) भी भुला देता है.

क्या कहता है डेटा: भारतीय वर्क कल्चर की स्थिति

2025-26 के कई ट्रेंड्स बताते हैं कि भारतीय कर्मचारी दुनिया में सबसे ज्यादा काम करने वालों में से हैं, लेकिन उनकी 'खुशी का इंडेक्स' (Happiness Index) काफी नीचे है. एक रिपोर्ट के अनुसार, 60% से ज्यादा भारतीय प्रोफेशनल्स महसूस करते हैं कि छुट्टी के दिन भी उनसे काम की उम्मीद की जाती है. 

'क्वाइट क्विटिंग' (Quiet Quitting) जैसे ट्रेंड्स इसी वजह से शुरू हुए थे, जहां लोग सिर्फ उतना ही काम करते हैं जितना जरूरी हो, ताकि अपनी मानसिक शांति बचा सकें. लेकिन इस वीडियो में दिख रहा नजारा 'क्वाइट क्विटिंग' के बिल्कुल उलट है. ये 'वर्काहोलिज्म' (Workaholism) की चरम सीमा है, जहां एंटरटेनमेंट के लिए तय किया गया समय भी ऑफिस की भेंट चढ़ गया.

सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग

ट्विटर (अब X) और इंस्टाग्राम पर इस वीडियो को लेकर दो फाड़ दिख रहे हैं. एक यूजर ने लिखा, 

"अगर मुझे मूवी के बीच में काम करना पड़े, तो मैं ऐसी नौकरी उसी वक्त छोड़ दूंगा." 

वहीं दूसरे ने लिखा, 

"हो सकता है वो बेचारी अपनी शिफ्ट खत्म करके मूवी देखने आई हो और ऐन वक्त पर बॉस का फोन आ गया हो. हमें उसे जज करने के बजाय सिस्टम को कोसना चाहिए."

युवाओं के बीच ये बहस अब सिर्फ एक वीडियो तक सीमित नहीं है. ये इस बारे में है कि भविष्य का वर्क कल्चर कैसा होगा. क्या हम मशीनों की तरह 24/7 काम करेंगे या फिर हमें 'राइट टू डिस्कनेक्ट' (Right to Disconnect) यानी काम के बाद ऑफिस से पूरी तरह कट जाने का अधिकार मिलेगा?

समाज पर क्या पड़ रहा है फर्क?

इस तरह के वर्क कल्चर का असर सिर्फ काम तक सीमित नहीं रहता. ये रिश्तों पर भी असर डालता है. अगर आप अपनी फैमिली के साथ मूवी देखने गए हैं और वहां भी लैपटॉप पर हैं, तो आप शारीरिक रूप से वहां हैं लेकिन मानसिक रूप से नहीं. ये 'एब्सेंट प्रेजेंस' (Absent Presence) रिश्तों में दूरियां पैदा करती है. इसके अलावा, लगातार स्क्रीन पर रहने से नींद की कमी, एंग्जायटी और आंखों की समस्याएं आम होती जा रही हैं.

कंपनियों को ये समझना होगा कि एक थका हुआ और तनावग्रस्त कर्मचारी कभी भी क्रिएटिव नहीं हो सकता. उत्पादकता (Productivity) सिर्फ घंटों से नहीं, बल्कि दिमागी सुकून से आती है.

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बदलाव की जरूरत

सिनेमा हॉल में लैपटॉप की वो नीली रोशनी दरअसल एक खतरे की घंटी है. ये हमें बता रही है कि हमने अपनी प्राथमिकताओं को गलत तरीके से सेट कर लिया है. 'धुरंधर-2' जैसी फिल्में तो आती-जाती रहेंगी, लेकिन जो वक्त आप खुद को या अपनों को देने वाले थे, वो कभी लौटकर नहीं आएगा.

जरूरत इस बात की है कि हम 'न' कहना सीखें. ऑफिस का काम ऑफिस के समय में ही खत्म हो, इसके लिए सख्त नियम और एक स्वस्थ वर्क कल्चर की दरकार है. वरना एक दिन ऐसा आएगा जब हम अपनी ही जिंदगी के दर्शक बन जाएंगे और रिमोट कंट्रोल किसी और के हाथ में होगा. 

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