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गाय का आखिरी पूर्वज 400 साल पहले मर गया था

पॉलिटिकल बातें तो होती रहती हैं, आज बात गाय की हिस्ट्री की. जिसका दूध पीते हैं, जिसे श्रद्धा से देखते हैं, वह आई कहां से?

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फोटो - thelallantop
कितने पशु हैं कि जिन्हें खिलाने के बाद उनका माथा सहलाने की इच्छा होती है? वह है गाय. मासूम आंखों और भोली सीरत वाली. अंग्रेजी में 'काऊ'. जिसकी सबसे दोस्ती, न काहू से बैर.
हमारे कक्का कहते हैं कि गाय को थोड़ा प्यार दो तो वह ज्यादा चाहती है. ज्यादा प्यार दो तो और ज्यादा. वह लाड़ की भूखी है. उसकी गर्दन सहलाओ तो आगे बढ़कर आपके कंधे पर मुंह झुका लेती है. यह गाय से हमारा प्रेम ही था कि कुछ लोग चालाकी से उसे 'पॉलिटिकल पशु' बना ले गए.
Cow4 खैर, पॉलिटिकल बातें तो होती रहती हैं, आज बात हिस्ट्री की. जिसका दूध पीते हैं, जिसे श्रद्धा से देखते हैं, वह आई कहां से?
हिंदू मान्यताओं के हिसाब से समुद्र मंथन से निकली तमाम बेशकीमती चीजों में थी 'कामधेनु' गाय. इसमें थीं चमत्कारिक शक्तियां और उसके दर्शन मात्र से सब दुख हो जाते थे दूर. इसी गाय के लिए एक बार वसिष्ठ और विश्वामित्र में भसड़ भी हुई थी. खैर.
तो गुरु आज के जमाने में जो गाय है, उसके पूर्वज थे ओरॉक. यों समझ लो कि सांड का भी महाजंगली रूप. बड़े बड़े सींग, दिखने में खतरनाक और पावरफुल. ताकत, मूर्खता और उजड्डपने से भरे हुए. 5000 ईसा पूर्व का टाइम था. बाद में एशिया, अफ्रीका और यूरोप के मैदानी इलाकों के लोग मांस और चमड़े के लिए ओरॉक पालने लगे. फिर उनको लगा दूध का चस्का. दूध से जमाने लगे दही और फिर बनाने लगे पनीर. बस यहीं से रायता फैल गया. होड़ मच गई ओरॉक पालने की. aurochs 4000 ईसा पूर्व तक आते-आते इंसानों को बैलों की ताकत का सदुपयोग करना भी आ गया. उन्हें हलों और पहिए वाली गाड़ियों में लगा दिया गया. बाद के दिनों में जरूरत के मुताबिक ओरॉक के शरीर बदले और वे इस दौर के गाय-सांड में तब्दील होने लगे. पुराने ओरॉक विलुप्त हो गए. रिकॉर्ड के मुताबिक, दुनिया का आखिरी ओरॉक यूरोप के पोलैंड में साल 1627 में मर गया. तो ओरॉक की कहानी जो है, वो हुई खतम. अब जो नर 'कैटल' था उसे कहा गया सांड और मादा को कहा गया 'काऊ' यानी गाय. सांड होता है उत्पाती. इंसान को उसकी ज्यादा संख्या में जरूरत नहीं थी. बस गाड़ी और हल खींचने के लिए कुछ शांत, लेकिन ताकतवर सांड चाहिए थे. तो सांड का करा दिया गया बधियाकरण. तब उन्हें काम पर लगाया गया और उन्हें 'बैल' कहा गया. सेंट्रल एशिया के लोगों ने गाय-बैल ज्यादा पाले क्योंकि वहां उनके खाने के लिए घास के बड़े बड़े मैदान थे. सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में भी गाय पाली गई. प्राचीन मिस्र के मेराय शहर से लेकर सूडान तक के लोगों के लिए गाय बहुत अहमियत रखती थी.
प्राचीन साउथ-वेस्ट अफ्रीका (मौजूदा नामीबिया) के 'खोईखोई' समाज के लोग भी गाय पर काफी आश्रित थे. इनमें से किसी ने गाय-बैल का इस्तेमाल खेती में नहीं किया. बल्कि सेंट्रल एशियाई लोगों की तरह अफ्रीकियों ने भी गाय का दूध पिया और उसका मांस खाया.
शिकागो के ओरिएंटेल इंस्टीट्यूट में एक पुराना आर्ट-पीस रखा है जिसमें मिस्र का एक आदमी एक बछड़े की गर्दन काटता दिख रहा है. art piece1
आपको जानकर शायद हैरत हो कि भूमध्य देश (स्पेन, फ्रांस, इटली, तुर्की, मिस्र, ग्रीस आदि), वेस्ट एशिया और भारत का क्लाइमेट गाय के लिए बहुत अच्छा नहीं था. ये जगहें काफी सूखी थीं और घास भी पर्याप्त नहीं थी. यहां का मौसम भेड़ों के लिए ज्यादा मुफीद था. फिर भी यहां बहुतायत में और सफलतापूर्वक गायें पाली गईं.
इस वक्त दुनिया में सबसे ज्यादा गायें भारत में हैं. एक अंदाज़े के मुताबिक, दुनिया में 1.4 अरब गायें हैं जिनमें से 28 करोड़ सिर्फ भारत में हैं. इस आंकड़े को एक स्माइली के साथ इस तरह भी लिखा जा सकता है कि भारत में जितनी गायें हैं, उतनी अमेरिका में कारें भी नहीं हैं.
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