करीब 20 हजार किमी. ये दूरी है साउथ अमेरिका और एशिया के बीच की. इस दूरी के बीच में सैकड़ों शहर और देश आते हैं. कुछ रोज पहले जब अमेरिका ने लैटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई करते हुए वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उठा लिया, तो सबसे ज्यादा हलचल एशिया के एक देश में देखने को मिली. ये देश है चीन. ऐसा चीखना-चिल्लाना शुरू किया जैसे अमेरिका ने इनका बिछौना खींच लिया हो.
अमेरिका ने वेनेजुएला में जो किया, उससे चीन इतना क्यों बौखला उठा? बहुत बड़ी चोट लगी है
जब अमेरिका ने लैटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई करते हुए वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उठा लिया, तो चीन सबसे ज्यादा बौखला गया. वहां के आम लोगों से लेकर नेता और देश के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी डॉनल्ड ट्रंप पर भड़ास निकाली. चीन का इतना ज्यादा चीखना चिल्लाना आम बात नहीं है, वो अमेरिका के चलते फिलहाल तो बड़ी मुश्किल में फंस गया है.


चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीबो पर एक दिन में 65 करोड़ प्रतिक्रियाएं आईं. इनमें अमेरिका को जमकर लताड़ा गया. मंत्री स्तर के नेताओं से लेकर चीनी राष्ट्रपति ने भी अमेरिका को सुना डाला. चीनी मीडिया ने भी कोई कसर बाकी नहीं रखी. निकोलस मादुरो के अरेस्ट के बाद बीजिंग ने कहा कि वाशिंगटन को उस पुलिस वाले की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए, जो दुनियाभर में अपना रौब दिखाता घूमता है. चीन की तरफ से तुरंत निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को छोड़ने की मांग की गई.
सोमवार, 5 जनवरी को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी इशारों-इशारों में अमेरिका पर हमला बोलते हुए कहा कि एकतरफा दादागिरी पूरी दुनिया की व्यवस्था को गंभीर रूप से कमजोर करती है. आगे कहा कि सभी देशों को अन्य देशों द्वारा चुने गए विकास के रास्तों का सम्मान करना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय कानून तथा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के हिसाब से चलना चाहिए. आगे जोड़ा कि नियमों के तहत काम करके उन मुल्कों को उदाहरण पेश करना चाहिए जो दुनिया की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक हैं.
चीन के सरकारी मीडिया ने वेनेजुएला की घटना को अमेरिकी पाखंड को उजागर करने वाली घटना बताया. शिन्हुआ ने एक टिप्पणी में लिखा, “अमेरिकी हमले ने सभी के लिए यह स्पष्ट कर दिया है कि जिसे अमेरिका 'नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था' कहता है, वह वास्तव में अमेरिकी हितों से प्रेरित लूट-आधारित व्यवस्था से ज्यादा कुछ नहीं है.”
अब इतना सब जानने के बाद एक सवाल ये उठता है कि जो कुछ निकोलस मादुरो के साथ हुआ, उससे चीन क्यों इतना चिढ़ गया? आगे हम इसी का जवाब जानेंगे.
एक कहावत है- दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है. और जब ये दोस्त आपके दुश्मन के घर के पीछे वाले बगीचे में रहता हो, तो फिर ऐसे दोस्त पर जमकर प्यार लुटाएंगे ही. कहानी यहीं से शुरू होती है. अमेरिका और वेनेजुएला के रिश्ते कई दशकों से सही नहीं हैं, लेकिन करीब एक दशक पहले अमेरिका की वेनेजुएला से जबरदस्त खटपट हो गई, तब चीन को अमेरिका के पड़ोस में एक बढ़िया दोस्त दिखा. इसके बाद निकोलस मादुरो को इनवेस्टमेंट और तेल खरीद के तमाम बड़े ऑफर देकर चीन ने यहां अपनी जबरदस्त पैठ बनानी शुरू कर दी. साल 2023 में इस रिश्तेदारी में एक और मजबूत मुहर लगी. दोनों के बीच 'ऑल वेदर स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप' बन गई. हालत ये हो गई कि वेनेजुएला आर्थिक और कूटनीतिक रूप से बीजिंग पर निर्भर हो गया.
साल 2019 में जब डॉनल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए तो निकोलस मादुरो को कच्चा तेल बेचने में परेशानी होने लगी. तब चीन उनके बड़े काम आया. चीन ने वेनेजुएला से तेल खरीदना नहीं बंद किया. आलम ये था चीन इस साउथ अमेरिकी देश के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीददार बन गया. पिछले महीने ही डेटा का एनलिसिस करने वाली वेबसाइट केपलर के आंकड़ों के मुताबिक साल 2025 में वेनेजुएला का 80 फीसदी क्रूड ऑइल चीन ने खरीदा है. इसकी सबसे बड़ी वजह चीन को ये तेल औने-पौने दाम पर मिलना है. मतलब चीन की दसों उंगलियां घी में थीं.
चीन की उंगलियां कांटों में फंस गईंलेकिन अब रातों-रात चीजें बदल गईं. अमेरिका ने सीधे वेनेजुएला के राष्ट्रपति को ही उठा लिया, यानी अब वहां डॉनल्ड ट्रंप की इजाजत के बिना पत्ता भी नहीं हिलेगा. ट्रंप ने साफ-साफ बोल भी दिया है कि चीन वेनेजुएला से कुछ कच्चा तेल खरीदना जारी रख सकता है, लेकिन उतना और उस रेट में अब नहीं मिलेगा. मतलब घी में डूबीं उंगलियां कांटों में फंस गईं.
चीन को एक बात का दर्द और हो रहा कि कहीं उसका पैसा न फंस जाए. चीन ने बीते दशकों के दौरान वेनेजुएला में अरबों-खरबों डॉलर का निवेश किया है. खूब लोन इस देश को दिया है. वाशिंगटन स्थित स्टिमसन सेंटर के रिसर्च के अनुसार, 2007 के बाद से चीन ने वेनेजुएला को 62.5 बिलियन डॉलर (करीब 5.62 लाख करोड़ रुपये) का लोन दिया है. ये रकम तब से अब तक पूरे साउथ अमेरिका को दिए गए चीनी लोन की आधी है. ये इतना बड़ा लोन है कि इससे वेनेजुएला सबसे ज्यादा चीनी मदद पाने वाला देश भी बन गया है.
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अब कुल मिलाकर बात ये है कि चीन ने जिस शख्स के चेहरे पर वेनेजुएला में इतना पैसा लगा दिया, अमेरिका उसे ही उठा ले गया. तो छटपटाहट और बेचैनी होना लाजमी और ऐसे में धैर्य रखा जाए भी तो कैसे? तो इसके परिणाम स्वरूप चीन के लोग और वहां के नेता अमेरिका के खिलाफ गुस्से में हैं.
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