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किस्सा बुलाकी साव-2, भूंजा और ताड़ी के बीच गिलहरी सी दौड़ती दुनिया

एक आदमी था फकीर टाइप का. रोज नई-नई कविताएं सुनाता था. कभी कविता में इतना मगन हो जाता, कि नाचने लगता.

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Avinash Dasअविनाश दास पत्रकार रहे. फिर अपना पोर्टल बनाया, मोहल्ला लाइव  नाम से. मन फिल्मों में अटका था, इसलिए सारी हिम्मत जुटाकर मुंबई चले गए. अब फिल्म बना रहे हैं, ‘आरा वाली अनारकली’ नाम से. पोस्ट प्रोडक्शन चल रहा है. कविताएं लिखते हैं तो तखल्लुस ‘दास दरभंगवी’ का होता है. इन दिनों वह किस्से सुना रहे हैं एक फकीरनुमा कवि बुलाकी साव के, जो दी लल्लनटॉप आपके लिए लेकर आ रहा है. किस्सों की अगली किस्त हाजिर है, पढ़िए.
  गणेशी का भूंजा और न भूल पाने वाली कविता आज प्रियंका सिंह ने टैग किया कि अपनी प्रिय कविता बताऊं. कल से बता रहा हूं कि जब भी मैं अपनी आंखें मूंदता हूं, मुझे बुलाकी साव याद आता है. दरभंगा में एमएल एकेडमी था, जहां थोड़ी स्‍कूली पढ़ाई मैंने की थी. उसके गेट पर गणेशी अपना ठेला लगाता था और भूंजा बेचता था. सारे बच्‍चों को उसने भूंजा खाने का चस्‍का लगा दिया था. वैसा भूंजा इस ब्रह्मांड में शायद ही कोई बनाता होगा. चार आने में एक ठोंगा. बाद में बड़े होकर भी हम गणेशी का भूंजा खाने जाते थे. तब भी एक रुपये में एक ठोंगा. ऐसे ही, एक दोपहर हम थलवारा-हायाघाट के बीच हुई भीषण रेल दुर्घटना के मरीज़ों का हालचाल लेकर डीएमसीएच से लौट रहे थे, तो गणेशी के पास रुक कर भूंजा बनवाने लगे. तभी पीछे से किसी ने कंधे पर हाथ रखा. वह बुलाकी साव था. मैंने दो ठोंगा भूंजा बनवाया और खाते हुए बंगाली टोला की तरफ निकल आये. वीणापाणि क्‍लब के बाहर नन्‍हें से मैदान में बैठ गये. अचानक बुलाकी साव ने भूंजा का बड़ा सा फक्‍का मुंह में ठूंसा और उठ कर नाचने लगा. ज़ोर ज़ोर से भूंजा चबाते हुए गाने लगा. वह गीत अब भी याद है. जो याद रह जाए और जिसे कभी न भूल पाओ, वही श्रेष्‍ठ और प्रिय कविता हो सकती है. इस तरह बुलाकी साव की यह कविता भी मेरी बहुत प्रिय कविता है.
जाओ फिर आओ फिर जाओ फिर आओ किराने के खाते में चीनी लिखवाओ नमक मोटा मोटा उधारी मंगवाओ पुराना है गीत मगर दाल रोटी गाओ किसी को भी देखो, किसी को भी चाहो किसी एक लड़की से फिर धोखा खाओ किसी को भी पकड़ो दुलत्ती लगाओ था हिंदी में गाना, तो इंग्लिश में वाओ कहां से चला था कहां तक गया वो ये लेनिन वो माओ ये तोजो वो ताओ ज़रा से पसीने में मुक्ति कमाओ जाओ फिर आओ फिर जाओ फिर आओ
हजमा चौराहे से पकड़ बुलाकी ताड़ीघर ले गया
दरभंगा में मैं नाटक किया करता था. साल में हम तीन-चार नाटक कर लेते थे और कुल मिला कर छह महीने तो रिहर्सल चलते ही थे. बुलाकी साव कहता था कि यह सब फरेब है. ज़ि‍ंदगी ही जब नाटक है, फिर अलग से नाटक करने की क्‍या ज़रूरत? वह कभी मेरा नाटक नहीं देखता था. अक्‍सर आधी रात से बहुत पहले जब मैं शहर में नाटक या रिहर्सल से गांव की ओर लौटता था, तो वह हजमा चौराहे के पास दिख जाता था. ज़्यादातर मैं उसे अनदेखा करते हुए आगे बढ़ जाता था. पर एक दिन उसने मुझे पकड़ लिया. वहीं पास में एक ताड़ी घर था. तब तक मैं सिर्फ चखना खाता था. ताड़ीघर में सिर्फ एक ढिबरी जल रही थी. कोई नहीं था. वह जमीन पर बैठ गया और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे भी बैठा लिया. एक औरत आयी. एक बोतल ताड़ी, दो छोटे गिलास और एक प्‍लेट में भुने हुए पीले मटर रख गयी. बुलाकी साव ने प्‍लेट मेरी तरफ बढ़ा दिया. खुद ताड़ी पीने लगा. थोड़ा मटर खाकर जब मैं उठने को हुआ, उसने कस कर मेरा हाथ पकड़ लिया. तब तक उसकी आधी बोतल खाली हो चुकी थी. उसने मेरी आंखों में आंखें डाली और रोने लगा. रोते हुए उसने अपनी ताज़ा कविता सुनाई. कविता में एक लय थी, जो मेरे ज़ेहन में आज तक बसी हुई है. आज भी, आधी रात से बहुत पहले, जब मैं घर लौट रहा होता हूं - मुझे बुलाकी साव की वह कविता बहुत याद आती है.
बिजलियां हैं रोशनी है ढेर सारी लाल पीली हरी नीली और इन रंगीनियों में साफ दिखता है अंधेरा आंख की परतों के भीतर गिलहरी सी दौड़ती है भागती और हांफती दिखती है दुनिया ठहर कर जो देखना चाहें किसी को अजनबी आहट में खो जाता है वह भी और फिर से वही अंधेरा हमारे पास सिरहाने से लग कर बैठ जाता है कौन हैं हम आदमी जैसा ही और एक आदमी हैं चीखना होगा हमें हर आदमी का चीखना होगा ज़रूरी ढेर सारी चीख़ से एक पौ फटेगी मां हंसेगी और एक बच्‍चा हंसेगा पेड़ की सब टहनियों पर ढेर सारे शोख़ पंछी हंस पड़ेंगे और फिर होगा सबेरा एक दिन तो हारना होगा अंधेरा!
 
कल आपने बुलाकी साव के ये दो किस्से यहां पढ़े थे-

'ज़हरीली फसल देख लहलहा, कहकहा, अहा'

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