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किस्सा बुलाकी साव-10, उसने अभी कंधे पर सर रखा ही था, तभी किसी ने ढेला मार दिया

हताशा में एक दिन, जब मैं बेंता के पास गामी पोखर में ढेर सारे कंकड़ फेंक लहर पैदा कर रहा था, मेरा हाथ किसी ने रोक दिया. वह बुलाकी था.

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फोटो क्रेडिट- सुमेर सिंह राठौड़
Avinash Das
अविनाश दास

अविनाश दास पत्रकार रहे. फिर अपना पोर्टल बनाया, मोहल्ला लाइव  नाम से. मन फिल्मों में अटका था, इसलिए सारी हिम्मत जुटाकर मुंबई चले गए. अब फिल्म बना रहे हैं, ‘आरा वाली अनारकली’ नाम से. पोस्ट प्रोडक्शन चल रहा है. कविताएं लिखते हैं तो तखल्लुस ‘दास दरभंगवी’ का होता है. इन दिनों वह किस्से सुना रहे हैं एक फकीरनुमा कवि बुलाकी साव के, जो दी लल्लनटॉप आपके लिए लेकर आ रहा है. किस्सों की नौ किस्तें आप पढ़ चुके हैं. जिन्हें आप यहां क्लिक कर पा सकते हैं.
 हाजिर है दसवीं किस्त, पढ़िए.


पीपल के पेड़ के नीचे मैंने उसे बांहों में लिया ही था कि फादर आ गया लहेरियासराय से मब्‍बी तक मील का पत्‍थर आठ बार आता है. यानी आठ किलोमीटर के भीतर-भीतर जो शहर बसा था, वह छोटा ही कहा जाएगा. छोटे शहर में प्‍यार को पनाह नहीं मिलती. एक शाम, जब उस लड़की ने मुझसे कहा था कि हां हम भी तुमसे प्‍यार करते हैं. उस रात मैंने खुशी के मारे अपने बाल नोंचने चाहे थे. उस रात मुझे नींद नहीं आयी थी. दूसरे दिन मैंने उसकी छत पर उसे चूमना चाहा था, पर उसकी भाभी आ गयी थी. दिग्‍घी तालाब के किनारे हजरत मख़दूम भीका शाह सैलानी रहमतुल्‍लाह अलैह की मज़ार के ठीक सामने उसने जैसे ही मेरे कंधे पर सर रखा, पीछे से किसी ने ढेला मार दिया. दोनार चौक और दरभंगा स्‍टेशन के बीच होली रोजरी चर्च में हम उस वक्‍त गये, जब दसबजिया फूल पूरी तरह खिले हुए थे. चर्च के आंगन में पीपल के पेड़ के नीचे मैंने उसे बांहों में लिया ही था कि नौजवान फादर आ गया, 'नो नो, दिस इज़ नॉट द राइट प्‍लेस'. एक बार वह अपनी एक सहेली के घर ले गयी, लेकिन वहां भी हम एक-दूसरे को चूम नहीं पाये. अगले कई दिनों तक शहर के चप्‍पे-चप्‍पे में हमने अपने प्‍यार के लिए एकांत खोजना चाहा, लेकिन सब तरफ लोग ही लोग थे. इससे पहले हमें हमारा शहर शांत और खाली-खाली लगता था. पहली बार लगा कि शहर की आबादी बहुत बढ़ गयी है.
यह लगभग तय हो गया था कि इस शहर में प्‍यार मुमकिन नहीं है. मेरे अंदर उदासी की नदी बहने लगी. हताशा में एक दिन जब मैं बेंता के पास गामी पोखर में ढेर सारे कंकड़ फेंक कर ढेर सारी लहर पैदा कर रहा था, मेरा हाथ किसी ने रोक दिया. वह बुलाकी साव था. मैं फूट-फूट कर रोने लगा. उसने सख्‍त लहजे में पूछा- सच-सच बताओ मुन्‍ना, बात क्‍या है? मैं उससे झूठ नहीं बोल पाया. वह हंसने लगा और जोर-जोर से हंसने लगा. मेरी खीझ बढ़ गयी और एक बार तो लगा कि उसके हाथ से अपना हाथ छुड़ा कर गामी में कूद जाऊं. तभी उसने कहा, 'चलो मेरे साथ'. मैं उसके पीछे पीछे चल पड़ा, जैसे जर्मनी के हैमलिन शहर में एक सम्‍मोहक बांसुरी बजाने वाले के पीछे-पीछे शहर के सारे बच्‍चे चले गये थे.
बुलाकी साव दरभंगा टावर के पास एक मेडिकल शॉप पर मुझे ले गया. वहां सत्तर साल के एक वृद्ध युगल किशोर जी से मिलवाया, जो उस शॉप के मालिक थे. शहर में पुराने बसे हुए मारवाड़ी ख़ानदान से उनका ताल्‍लुक था. टावर के पास ही उनका मकान था. पुरानी शैली के उस मकान का दरवाज़ा उन्‍होंने खोला. अंदर घुसते ही आंगन था. और आंगन से लगा हुआ एक बड़ा-सा कमरा. युगल किशोर जी ने कहा कि यहां आप लोग मिल सकते हैं. बुलाकी साव ने मुझे देखा. मेरी नज़रों में गहरी कृतज्ञता थी.
अगले दिन दोपहर के वक्‍त हम उस लड़की के साथ वहां पहुंच गये. युगल किशोर जी हम दोनों को उस कमरे में ले गये, जो एक दिन पहले दिखाया था. फिर वापस चले गये. हम दोनों अब अकेले थे. पलंग पर बैठ गये. वह पालथी मार कर बैठी. मैं पलंग से नीचे पैैर लटकाये हुए. कुछ देर तक दोनों ख़ामोश बैठे रहे. फिर मैंने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा कर उसकी बांह पर रखा. उसी वक्‍त युगल किशोर जी चाय लेकर आये. हमने चाय पी. फिर युगल किशोर जी कप लेकर उठे और हमसे कहा कि आपलोग बातें कीजिए. उनके जाने के बाद उसके गाल अपने हाथों में लेकर जैसे ही मैं चूमने के लिए बढ़ा, उसने रोक दिया.
हिंदी में एक शब्‍द है, किंकर्त्तव्‍यविमूढ़. इसी शब्‍द की तरह मेरे भाव चित्र-विचित्र जैसे हो गये. वह सहज थी. उसने अपना छोटा-सा फैंसी बैग खोला और उसमें से एक पाउच जैसा कुछ निकाला. वह मधु (गुटखा) की पुड़ि‍या थी. उसका एक कोना फाड़ कर उसने सारा का सारा मसाला अपने मुंह में डाल लिया. मेरा मुंह खुला का खुला था.
उसने कहा, 'अब आओ.' मैंने कहा, 'मुझे भी खाना है.' उसने कहा, 'कभी खाये हो?' मैंने कहा, 'कभी नहीं खाये हैं.' उसने कहा, 'फिर मत खाओ.' मैंने कहा, 'तुम खा सकती हो, तो मैं भी खा सकता हूं.'
उसने अपने बैग से मधु गुटखा की दूसरी पुड़ि‍या निकाल कर मेरी तरफ बढ़ाई. मैंने भी उसका एक कोना फाड़ कर सारा का सारा मसाला मुंह में डाल लिया. फिर तो उस कमरे में रोमियो-जूलियट नहीं, सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा रह गया. मेरा सर घूमने लगा और मैं उसकी गोद में लेट गया. कितनी देर लेटा रहा, याद नहीं - लेकिन तब भी सर की झनझनाहट कम नहीं हुई थी, जब उसने कहा कि चार बज गये. उठो, देर हो रही है. मैं लड़खड़ाते हुए उठा. हम युगल किशोर जी के मकान से बाहर आये. वह मेरी बांह पकड़े हुए थी. बाहर आकर उसने रिक्‍शा लिया और मुझे वहीं सड़क पर अकेला छोड़ कर चली गयी. यह हमारी आख़ि‍री मुलाक़ात थी, पर मुझे इसका इलहाम नहीं था. उसी वक्‍त एक दूसरा रिक्‍शा आकर रुका. रिक्‍शे से बुलाकी साव उतरा. उसने मेरा हाथ पकड़ा और फिर उसी कमरे में ले गया. वह ऐसा समझ रहा था कि मैं खुश हूं. मैंने उसे अपने दुख का एहसास नहीं होने दिया. मेरे सर पर हाथ फेरते हुए उसने एक गीत गाकर सुनाया जो किसी फिल्‍मी गीत जैसा लग रहा था, मगर फिल्‍मी नहीं था. मेरा सर तब भी चकरा रहा था, लेकिन मेरी आत्‍मा में उसकी लय पत्‍थर की तरह चोट कर रही थी और मैं धीरे-धीरे घायल होता जा रहा था.

अनगिनत फूल खिल रहे हैं तेरी बातों में चांद के साथ है बादल की घटा रातों में

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आज रुक जाओ आज मत जाओ कल चले जाना आज रुक जाओ ठहरो तालाब के पानी की तरह महको बस रात की रानी की तरह मेरा मनुहार मान भी जाओ आज रुक जाओ आज मत जाओ

बहुत सुकून है हसीन मुलाकातों में चांद के साथ है बादल की घटा रातों में

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तितलियों सी उड़ो और आ जाओ हवा सी फैल कर लिपट जाओ बंद पलकेंं हैं किताबों की तरह नींद में हो मेरे ख्‍़वाबों की तरह रंग बन कर बदन पे छा जाओ सांस बन कर ज़रा सा जी जाओ

मेरी किस्‍मत की लकीरें हैं तेरे हाथों में चांद के साथ है बादल की घटा रातों में




बुलाकी साव के किस्सों की पिछली नौ कड़ियां यहां हैं-

किस्सा बुलाकी साव-1, ‘ज़हरीली फसल देख लहलहा, कहकहा, अहा’

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किस्सा बुलाकी साव-2, भूंजा और ताड़ी के बीच गिलहरी सी दौड़ती दुनिया

किस्सा बुलाकी साव-3, जब बुलाकी को इश्क हुआ

किस्सा बुलाकी साव-4, भाजपा में अवैतनिक कार्यकर्ता हो गया बुलाकी

किस्सा बुलाकी साव-5, साइकिल स्टैंड पर पार्ट टाइम जॉब करने लगा बुलाकी

किस्सा बुलाकी साव-6, बुआ की बेहोशी का राज बुलाकी ने खोला

किस्सा बुलाकी साव-7, हंटरवाली ने शहर में दौड़ाकर डायरेक्‍टर पर हंटर चलाया

किस्सा बुलाकी साव-8, कुत्तों के साथ रहने वाले कवि से मिलने चतुर्भुजस्‍थान गया था बुलाकी

किस्सा बुलाकी साव-9, बेंता चौक पर अगरबत्ती देकर हंस खरीदते थे मनोज बाबू




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