कहां से बात शुरू की जाए? किसी बयान से, किसी विवाद से, किसी टीवी डिबेट से, या उस अदृश्य तराज़ू से जिसके दोनों पलड़े बराबर दिखते तो हैं, लेकिन दोनों पर रखे जाने वाले वज़न अलग-अलग होते हैं. नहीं, शुरुआत बयान से ही करते हैं. कंगना रनौत ने फिर कुछ कह दिया. उन्होंने क्या कहा, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण वह दृश्य है जो उसके बाद हर बार लगभग एक-सा दोहराया जाता है. जिसके बाद सोशल मीडिया-कचहरी, स्टूडियो और प्रबुद्ध समाज अपना सबसे चमकदार नैतिक चश्मा पहनकर बैठ जाता है. बात इस सवाल से शुरू होनी चाहिए थी कि क्या पॉलिटिकली करेक्ट होना बहुत मुश्किल काम है? या उस नैतिक धारा के साथ खड़े हो जाना, जिसके किनारे सबसे अधिक ताली बज रही हो? यदि आसान काम है तो भारतीय जनता पार्टी की सांसद कंगना रनौत उस तरफ क्यों नहीं हैं? इसका जवाब विषयांतर होकर तलाशने की कोशिश करते हैं.
ओपिनियन: कंगना रनौत और आहत होने की लोकतांत्रिक प्रतियोगिता
मनुष्य ने जितनी सदियां मुखौटे बनाने में लगाई है, उतनी शायद आईने बनाने में भी नहीं लगाई. यह बात सभी जानते हैं कि हम अपने समय में विचारों से कम, विचारों की पैकेजिंग से ज़्यादा प्रभावित होते हैं. कंगना के हर बयान से सहमत नहीं हुआ जा सकता.

मनुष्य ने जितनी सदियां मुखौटे बनाने में लगाई है, उतनी शायद आईने बनाने में भी नहीं लगाई. यह बात सभी जानते हैं कि हम अपने समय में विचारों से कम, विचारों की पैकेजिंग से ज़्यादा प्रभावित होते हैं. कंगना के हर बयान से सहमत नहीं हुआ जा सकता. लेकिन क्या इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि वह अपने समय की सबसे कम एडिटिड सार्वजनिक शख्सियतों में से एक हैं? उनके भीतर जो आता है, वही लगभग बिना फ़िल्टर बाहर आ जाता है. कई बार वह हास्यास्पद होता है. कई बार अपरिपक्व. कई बार तथ्यात्मक रूप से कमज़ोर. कई बार अनावश्यक. कई बार वो चूक जाती हैं. लेकिन उनके आलोचक एक बार भी नहीं चूकते. दरअसल अब, सार्वजनिक जीवन में स्वाभाविकता अब गुण नहीं, जोखिम है. इस जोखिम को उठाने वाले लोग कम हैं. कंगना उनमें से एक हैं.

एक धारणा है कि वह राजनीति नहीं समझतीं. संभव है. लेकिन क्या भारतीय राजनीति केवल राजनीति समझने वालों से भरी हुई है? इस देश की संसद में ऐसे लोगों की कमी कभी नहीं रही, जिन्हें संविधान का सतही ज्ञान भी नहीं. संसदीय परंपराओं की जानकारी भी सीमित है और जिनकी सार्वजनिक भाषा का स्तर दंगे भड़काने जैसा है. उनकी विचारधारा की बातों के बाद विचार बहुत कम दिखाई देते हैं. ऐसे में केवल कंगना से परिपक्वता की अपेक्षा करना थोड़ा चयनात्मक नैतिक आग्रह लगता है. कंगना की सबसे बड़ी समस्या शायद यह है कि वह बिना अभ्यास के बोलती हैं. यह गुण नहीं है, लेकिन यह बनावटीपन भी नहीं है. उनकी भाषा कई बार बीजेपी या संघ की वैचारिक शब्दावली से प्रभावित दिखती है. लगता है जैसे कोई नया विद्यार्थी किसी विचारधारा की भाषा सीखने की कोशिश कर रहा हो. लेकिन कम से कम यह कोशिश अभिनय नहीं लगती. वह जो बनना चाहती हैं, उसी की ओर खुलकर जाती हैं. छिपाती नहीं हैं.
विडंबना यह भी है कि कुछ वर्ष पहले एक वर्ग उन्हें स्त्रीवाद, विद्रोह और 'वोक' राजनीति का चेहरा बनाकर घूम रहा था. तब उनका दुस्साहस प्रगतिशीलता कहलाता था. आज वही दुस्साहस प्रतिक्रिया कहलाता है. तब उनकी निर्भीकता पर कविताएं लिखी जाती थीं, आज उसी निर्भीकता पर व्यंग्य लिखे जाते हैं. इससे एक प्रश्न तो बनता है! क्या कंगना बदल गईं, या उन्हें देखने वालों का चश्मा बदल गया? कंगना की आलोचना होनी चाहिए. उनके तथ्यों की जांच होनी चाहिए. उनके बयानों का प्रतिवाद होना चाहिए. लोकतंत्र में इससे सुंदर कोई व्यवस्था नहीं. लेकिन उनकी हर सांस की फ़ॉरेंसिक जांच क्यों? उनके हर वाक्य पर ऐसा व्यवहार क्यों, मानो लोकतंत्र का भाग्य उसी पर निर्भर हो? सच यह है कि उनके अधिकांश बयान समाज में वैसी हलचल पैदा नहीं करते जैसी उनके विरोधी कल्पना करते हैं. न उनसे दंगे हो जाते हैं, न समाज टूट जाता है. ज़्यादातर मामलों में सोशल मीडिया कुछ दिन शोर करता है और फिर अगला विषय ढूंढ लेता है. लेकिन कंगना बनी रहती हैं. यही बात उनके आलोचकों को सबसे अधिक असहज करती है.

हमारी तरह कंगना भी अपनी मूर्खताओं की भी मालिक हैं. अपनी अतिशयोक्तियों की भी. अपने साहस और अपने जोखिमों की भी. कंगना कम से कम अपनी भूलें स्वयं करती हैं. एजेंसी से ड्राफ्ट नहीं करवातीं. यहां यह बात साफ रहनी चाहिए कि साहस का अर्थ हमेशा सही होना नहीं होता. कई बार केवल यह होता है कि आप अपने कहे की कीमत चुकाने को तैयार हैं. कंगना ने अपने करियर में इसकी कीमत चुकाई भी है. कभी फ़िल्म उद्योग से टकराकर. कभी मीडिया से. कभी अपने ही राजनीतिक पक्ष के भीतर आलोचना झेलकर. यह अलग बात है कि उनकी हर लड़ाई न्यायपूर्ण नहीं रही, लेकिन अधिकांश लड़ाइयां उन्होंने अकेले लड़ीं. अकेले लड़ना भी एक चरित्र-गुण है. नहीं है? यदि आप सुरक्षित वाक्य बोलते हैं. सुरक्षित मित्र चुनते हैं. सुरक्षित शत्रु चुनते हैं. सुरक्षित क्रोध व्यक्त करते हैं, यह गुण नहीं हैं.
क्योंकि विवेकशील दिखना सुविधाजनक है. क्योंकि नैतिक दिखना उससे अधिक सुविधाजनक. क्योंकि इस महादेश में हम सब किसी-न-किसी की नज़र में मूर्ख हैं और किसी की नज़र में पाखंडी. किसी की नज़र में भक्त और किसी की नज़र में अर्बन नक्सल. इसलिए नज़र का क्या है? दाग़ देहलवी से पूछिए…
सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं.
कंगना को उन्हें देखने वाली नज़रों से भी देख लेना चाहिए. सिर्फ़ इसलिए भी कि यह नज़रिया रोचक है. क्योंकि नीट पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन के दौरान जेन-ज़ी की गालियों को यह कहकर वैधता दी गई कि सत्ता बहरी हो गई है, उसके कानों के पर्दे फाड़ने के लिए भाषा भी असभ्य होगी. यदि प्रतिरोध का यह नया व्याकरण है तो कंगना रनौत के किसी असंगत, अतिरंजित या उत्तेजक बयान पर बहस अचानक लोकतांत्रिक मर्यादा की मांग की ओर क्यों मुड़ जाती है? सार्वजनिक जीवन में यदि संयम अनिवार्य है तो वह भी सबके लिए अनिवार्य होना चाहिए न?
ख़ैर, कंगना अगला बयान फिर देंगी. कुछ लोग फिर आहत होंगे, कुछ लोग फिर आहत होने वालों से आहत होंगे. तमाशा नया होगा, पटकथा वही. फिर एल्गोरिद्म कोई नया अपराधी ढूंढ़ लेगा.
ये ओपिनियन इंडिया टुडे से जुड़े अतुल तिवारी ने लिखा है.
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