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मुसलमानों, एक 'नॉट इन माई नेम' कैम्पेन बंगाल के लिए भी चलाइए न!

बंगाल के दंगों में मरे कार्तिक घोष की जान भी उतनी ही कीमती थी, जितनी जुनैद की.

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फोटो - thelallantop
बंगाल में एक फेसबुक पोस्ट से जो आग लगी है, वो फ़ैल कर दावानल हो गई है. रुक-रुक के हिंसा भड़क रही है. एक नाबालिग लड़के की नादानी की सज़ा वहां का मुस्लिम समुदाय उन लोगों को दे रहा है, जिनका इस मामले से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं. तोड़-फोड़, आगज़नी और पता नहीं क्या-क्या! देश की संपत्ति का नुकसान हो रहा है. आपसी विश्वास की क़ब्र खुद रही है. कार्तिक घोष नाम के एक शख्स की तो जान भी चली गई है. 20 से ज़्यादा लोग घायल हैं. कुछ तो बेहद गंभीर हालत में हैं.
यहां सवाल ये है कि क्या कार्तिक घोष की जान की कीमत, किसी भी लिहाज़ से जुनैद की जान से कम होगी? कम्पेयर नहीं कर रहा हूं घटनाओं को. बस ये पॉइंट एस्टैब्लिश करने की कोशिश कर रहा हूं कि ज़िंदगी किसी की भी हो, उतनी ही अनमोल होती है.
जुनैद की मौत के बाद दिल्ली में जंतर-मंतर पर और भारत के कुछ और शहरों में 'नॉट इन माई नेम' कैम्पेन हुआ. लोग इकट्ठे हुए. ये कहते हुए कि भीड़ बनकर की जाने वाली हत्याओं का हम हिस्सा नहीं बनना चाहते. दिल्ली वाले प्रोटेस्ट में मैं खुद शामिल हुआ था. वहां मौजूद हुजूम में ज़्यादातर लोग गैर-मुस्लिम थे. मैंने अपनी आंखों से देखा है.
क़त्ल कर रही भीड़ के खिलाफ दिल्ली में जंतर मंतर पर एकजुट हुए थे लोग.
क़त्ल कर रही भीड़ के खिलाफ दिल्ली में जंतर मंतर पर एकजुट हुए थे लोग.

वो सब लोग वहां पहुंचे थे, क्योंकि वो लोग इस मुल्क में बढ़ती धार्मिक कट्टरता की मुख़ालफ़त करना चाहते थे. उन्हें फ़िक्र थी इस देश के सेक्युलर फैब्रिक की. होनी भी चाहिए.
लेकिन ‘सभी’ को होनी चाहिए.
बंगाल में जिस लड़के ने धार्मिक भावना को भड़काती पोस्ट लिखी, उसे पुलिस ने अरेस्ट भी कर लिया था. उसके बावजूद मज़हबी लड़ाके सड़क पर उतर आए. दंगे जैसे हालात पैदा हो गए हैं. मुस्लिम समाज के साथ ये दिक्कत कोई नई नहीं है.
मुसलमानों की आर्थिक बदहाली पर चर्चा के लिए एक सभा बुलाइए. या फिर तालीम की कमी से जूझते मुसलमान बच्चों के भविष्य पर बात करने के लिए किसी सेमीनार का आयोजन कीजिए. कोई नहीं आएगा.
लेकिन...
कहीं किसी फिल्म में मज़हब का मज़ाक उड़ता है, कहीं कुरआन के पन्ने फटे पाए जाते हैं, कहीं कोई सरफिरा आदमी हुज़ूर की शान में कुछ कह देता है और अचानक से मुस्लिम समाज की धार्मिक चेतना जाग जाती है. सड़कों पर एक हुजूम उमड़ आता है. हर तरफ मारो, पीटो, काटो का शोरगुल सुनाई देने लगता है. कभी मालदा में हुआ, कभी मुंबई में. अब बसीरहाट में.
मजम्मत तो इस पागलपन की भी होनी चाहिए. मुखरता से होनी चाहिए. मुस्लिम भाइयों/बहनों को चाहिए कि वो इस टॉप लेवल की मूर्खता का पूरी ताकत से विरोध करें. पुरज़ोर लहज़े में कहें कि इस बकवास का हम हिस्सा नहीं. नो, नॉट इन माई नेम.
पैगंबर साहब की शान में गुस्ताखी करने वाले कमलेश तिवारी का सर कलम करने की मांग लिए सड़कों पर उतरा मुस्लिम समाज.
पैगंबर साहब की शान में गुस्ताखी करने वाले कमलेश तिवारी का सर मांगने सड़कों पर उतरा मुस्लिम समाज.

इस देश के बहुसंख्यक समाज में बढ़ती कट्टरता के बावजूद एक बड़ा – बहुत बड़ा - तबका ऐसा है, जो धार्मिक उन्माद के साइड इफेक्ट्स जानता है. जो जुनैद, अखलाक़, पहलू ख़ान की हत्याओं को मनुष्यता के खिलाफ़ किया गया काम मानता है. इन घटनाओं की ना सिर्फ निंदा करता है, बल्कि इन पर रोक लगे इसलिए सोचता है. ‘नॉट इन माई नेम’ का काला बैंड लगा कर अपना विरोध दर्ज करवाता है. और इसमें बहुसंख्य लोग नॉन-मुस्लिम हैं.
आपको भी ये कहना ही होगा. कहिए कि मेरे नाम पर नहीं. मेरी कौम के नाम पर नहीं. कभी नहीं. ये हिसाब बराबर करने वाली बात नहीं है. ये उस बुनियादी फ़र्ज़ का तकाज़ा है, जो एक सेक्युलर मुल्क के हर नागरिक की पहली प्रायोरिटी होनी चाहिए.
मुसलमानों को ये समझना ही होगा कि इंसाफ मांगते वक़्त पहली कतार में और फ़र्ज़ निभाते वक़्त आख़िरी सफ में रहने से काम नहीं चलेगा. जितनी फ़िक्र अधिकारों की होती है, उतनी ही कर्तव्यों की भी होनी चाहिए. ये देश हम सबका है. इसमें खुशहाली बनी रहे, इसके लिए तमाम ज़रूरी कदम उठाने की ज़िम्मेदारी सबकी है. हक़ बात के लिए खड़े रहेंगे, तभी इंसाफ का तकाज़ा करते भले लगेंगे.
सुरेंद्र मोहन पाठक का एक जासूसी उपन्यास है. ‘गड़े मुर्दे’. इसमें एक लड़के पर क़त्ल का इल्ज़ाम है. वो अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए अपनी गर्लफ्रेंड के साथ दौड़ा-दौड़ा फिर रहा है. इसी भागदौड़ में वो दोनों एक दूसरे सस्पेक्ट को थाम लेते हैं. लड़का उसके सर पर पिस्तौल तान कर जानकारी चाहता है. ये भी दुहाई देता है कि वो बेक़सूर है. फिर अचानक से पिस्तौल नीचे कर के उसे रिहा करने लगता है. लड़की पूछती है कि वो ऐसा क्यों कर रहा है? लड़का जवाब देता है,
“हाथ में पिस्तौल थाम कर कोई बेगुनाही की दुहाई नहीं दे सकता. ख़ून करने की धमकी देकर ये नहीं कहा जा सकता कि आपने कभी कोई ख़ून नहीं किया.”
मुझे ये प्रसंग मुस्लिम समाज के परिप्रेक्ष्य में बार-बार याद आता है. तोड़-फोड़ कर के, किसी की जान ले के आप ये कहते नहीं रह सकते कि आप शांतिप्रिय मज़हब के अनुयायी हैं. आपके मज़हब की सिखाई करुणा, क्षमाशीलता आपके आचरण में भी दिखनी चाहिए. वरना लोग आप पर यकीन करना छोड़ देंगे.
भारत के मुसलमानों को मज़हब को चारदीवारी में रखना सीखना ही होगा. जब तक मज़हब निजी चीज़ नहीं हो जाता, तब तक ये जीने के लिए ज़रुरी मुद्दों पर हावी होता रहेगा. अपनी आस्था बरकरार रखो, ज़रूर रखो, लेकिन उसे जानलेवा हथियार ना बनाओ. मज़हब के नाम पर बही लहू की एक बूंद भी, इंसानियत के दामन पर एक भद्दे दाग की शक्ल में जड़ी जाती है. अल्लाह/ईश्वर/गॉड भी इसे किसी हाल में ठीक नहीं मानने वाला.
मज़हब से पहले मनुष्यता का सबक सीखना सबकी ज़िम्मेदारी है. मेरी, आपकी, बहुसंख्य समाज की, सबकी. वरना कल पूरा मुल्क आप लोगों से वही सवाल कर रहा होगा, जिसे शायर ‘यास यगाना चंगेज़ी’ साहब बरसों पहले लिख गए है:

“सब तेरे सिवा काफ़िर, आख़िर इसका मतलब क्या सर फिरा दे इंसा का, ऐसा ख़ब्त-ए-मज़हब क्या!”




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