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बाबरी पर चढ़ने वाले दो कारसेवकों की कहानी, जो बाद में 'पाप धोने' के लिए मुस्लिम बन गए

बलबीर और योगेंद्र ने न सिर्फ नाम बदला, बल्कि 100 मस्जिदों की मरम्मत का प्रण भी किया

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बलवीर का दावा था कि बाबरी पर सबसे पहले चढ़ने वालों में वह भी थे.

अयोध्या की बाबरी मस्जिद 6 दिसंबर 1992 के दिन गिराई गई थी. आज 6 दिसंबर की तारीख है. ऐसे में हम आपके लिए एक किस्सा लेकर आए हैं. किस्सा उन दो लोगों का है जो खुद को कारसेवक बताते थे और फिर बाद में उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया था. ये आलेख तब लिखा गया था, जब बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के मामले में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने अपना फैसला सुनाया था. पढ़िए पूरी कहानी-

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बाबरी मस्जिद गिराए जाने के केस में सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने फैसला सुना दिया है. लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती समेत सभी 32 आरोपियोंं को बरी कर दिया. कोर्ट ने कहा है कि पीछे से भीड़ आई, जिसने ढांचे को गिरा दिया. घटना पूर्व नियोजित नहीं थी. जो कुछ हुआ, अचानक हुआ था. इस मौके पर हम आपको ऐसे दो कारसेवकों की कहानी बताते हैं, जिन्होंने बढ़-चढ़कर मस्जिद ढहाने में हिस्सा लिया था, लेकिन बाद में मुस्लिम धर्म अपना लिया. दोनों ने 'पाप धोने' की बात कहकर 100 मस्जिदों का नवीनीकरण करने का फैसला किया. 

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 बलबीर पानीपत में रहते थे. शिवसेना के नेता हुआ करते थे. आरएसएस की विचारधारा से प्रेरित थे. शुरुआत में पानीपत की 'शाखा' में नियमित रूप जाते रहते थे. राम मंदिर आंदोलन के लिए पूरे जोश से अयोध्या गए थे. उनके साथ योगेंद्र पाल भी थे. बाद में उन्होंने पूरी घटना के बारे में बताया था. उनका कहना था कि हम दोनों ने बाबरी आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया था. बलबीर ने दावा किया था कि

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1 दिसंबर को अयोध्या पहुंचने वाले कुछ पहले कारसेवकों में से हम भी थे. 6 दिसंबर को बीच वाले गुंबद पर चढ़ने वाला सबसे पहला व्यक्ति मैं ही था.

6 दिसंबर, 1992 की घटना को याद करते हुए बलबीर ने आगे बताया,

'हमें डर था कि हमें रोकने के लिए सेना का प्रयोग किया जाएगा, लेकिन जमीन पर कोई प्रभावी सुरक्षा नहीं थी. इसी बात ने हमें प्रेरित किया. हम मानसिक रूप से तैयार थे कि आज इसे (बाबरी मस्ज़िद को) ध्वस्त कर देंगे.'

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 बलबीर ने बताया था कि सोनीपत और पानीपत के कई अन्य कारसेवकों के साथ उन्होंने भी गुंबद को ध्वस्त करने के लिए कुदाल और गैती का इस्तेमाल किया था. काम समाप्त होने के बाद जब वे हरियाणा के अपने गृह-नगर पानीपत पहुंचे, तो वहां एक 'वीर' की तरह सम्मान दिया गया. उन्होंने बताया कि जब मैं घर पहुंचा तो परिवार की प्रतिक्रिया मेरे लिए चौंकाने वाली थी. मेरा परिवार धर्मनिरपेक्ष है. उसने मेरी निंदा की. मैंने अपनी भावनाओं के चलते कारसेवा में भाग लिया था, लेकिन बाद में मुझे अहसास हुआ कि यह गलत था. बलवीर ने कहा,

मुझे यह मालूम था कि मैंने कानून हाथ में लिया था. भारत के संविधान का उल्लंघन किया था. अपराध बोध में मैंने जल्द ही इस्लाम को गले लगा लिया.

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बाद में बलबीर ने अपना नाम मुहम्मद आमिर रख लिया. उनके सहयोगी योगेंद्र का नाम मुहम्मद उमर हो गया. बलबीर ने देश-भर में मस्ज़िदें बनाने और उनकी सुरक्षा का काम शुरू किया. एक बार बातचीत में उन्होंने कहा था,

"मैंने और योगेन्द्र दोनों ने अयोध्या में श्री राम मंदिर का निर्माण करने की प्रतिज्ञा की थी, लेकिन अब 100 मस्जिदों का नवीनीकरण करके हमने अपने पाप धोने का वचन लिया है."

बलबीर से आमिर बनने के बाद उन्होंने एक मुसलमान महिला से शादी कर ली. इस्लाम की शिक्षाओं को फैलाने के लिए एक स्कूल चलाने लगे. अपने सहयोगी योगेन्द्र पाल के साथ अब तक 90 से ज्यादा मस्जिदें बना चुके हैं.
 

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बलबीर ने ये भी कहा था कि वह इस मामले में कहीं भी बयान दे सकते हैं. यहां तक ​​कि सीबीआई या संबधित प्राधिकरण की सजा का सामना करने के लिए भी तैयार है. 

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