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कहानी उस पेंटिंग की, जो दशकों बाद वर्ल्ड टूर पर जापान जा रही है

Girl with a Pearl Earring: ये पेंटिंग एक ट्रॉनी (tronie) है. माने ये किसी असली व्यक्ति का पोर्ट्रेट नहीं, बल्कि एक काल्पनिक लड़की का चेहरा है. जो उस समय डच आर्ट में आम हुआ करता था. डच पेंटर रेम्ब्रांट ने 1630 के आसपास डच कला में ट्रॉनी को बहुत लोकप्रिय बनाया था.

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पेंटिंग में लड़की के कान में जो मोती है, उसमें रिफ्लेक्शन इतना सटल है कि ये असली लगता है. (फोटो- Mauritshuis)

नीदरलैंड्स के हेग स्थित मॉरिट्शुइस म्यूजियम ने हाल ही में एक बड़ी घोषणा की है. जोहान्स वर्मीयर की वर्ल्ड फेमस पेंटिंग "गर्ल विद अ पर्ल ईयररिंग" (Girl with a Pearl Earring) 2026 में जापान जा रही है. ये पेंटिंग ओसाका के नकानोशिमा म्यूजियम ऑफ आर्ट में प्रदर्शित होगी. जहां ये 21 अगस्त से 27 सितंबर 2026 तक एग्जिबिशन में दिखाई देगी. पर ये खास इसलिए है, क्योंकि मॉरिट्शुइस इस पेंटिंग को बहुत कम ही बाहर भेजता है.

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पिछली बार ये पेंटिंग कब म्यूजियम के बाहर गई थी? ये जानने से पहले पेंटिंग की खासित और इसके बारे में डिटेल जाननी जरूरी है. तो चलिए चलते हैं इस कैनवास की रंग-बिरंगी राइड पर.

गर्ल विद अ पर्ल ईयरिंग

गर्ल विद अ पर्ल ईयरिंग (Dutch: Meisje met de parel) जोहान्स वर्मीयर की सबसे मशहूर और आइकॉनिक पेंटिंग है. जिसे अक्सर "नॉर्थ की मोना लिसा" कहा जाता है. ये लगभग 1665 में बनाई गई थी और ऑयल ऑन कैनवास है. साइज 44.5 × 39 सेंटीमीटर है. ये नीदरलैंड्स के हेग स्थित मॉरिट्शुइस म्यूजियम में स्थायी रूप से रखी गई है.

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ये पेंटिंग एक ट्रॉनी (tronie) है. माने ये किसी असली व्यक्ति का पोर्ट्रेट नहीं, बल्कि एक काल्पनिक लड़की का चेहरा है. जो उस समय डच आर्ट में आम हुआ करता था. डच पेंटर रेम्ब्रांट ने 1630 के आसपास डच कला में ट्रॉनी को बहुत लोकप्रिय बनाया था. उन्होंने दर्जनों ट्रॉनी बनाए. जिनमें अक्सर खुद को मॉडल के रूप में भी इस्तेमाल किया. और कभी-कभी एक आश्चर्यजनक टोपी या हेलमेट पहनाकर भी अपनी पेंटिंग को प्रोजेक्ट किया.

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होंठ हल्के खुले हैं और आंखों में एक रहस्यमयी और सीधी नजर है.

म्यूजियम की वेबसाइट के मुताबिक इसमें एक युवा लड़की को कंधे से देखते हुए दिखाया गया है. उसका सिर थोड़ा मुड़ा हुआ है. होंठ हल्के खुले हैं और आंखों में एक रहस्यमयी और सीधी नजर है. लड़की नीला-पीला टरबन (headscarf) पहने है. इसका नीला रंग महंगे अल्ट्रामरीन पिगमेंट (लैपिस लाजुली/Lapis lazuli से बना) से है. ये वही जेमस्टोन है, जिसका भारत के व्यापारियों ने अफगानिस्तान के बदख्शां से आयात 1000 ईसा पूर्व तक शुरू कर दिया था. मोहनजो-दारो और हड़प्पा जैसे सिंधु घाटी सभ्यता की साइट्स पर भी इसके सजावटी टुकड़े मिले हैं.

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लड़की नीला-पीला टरबन (headscarf) पहने है.

वापस आते हैं गर्ल विद अ पर्ल ईयरिंग पर. पेंटिंग में लड़की के कान में बड़ा, चमकदार मोती का ईयररिंग लटक रहा है, जो पेंटिंग का मुख्य फोकस है. बैकग्राउंड गहरा काला-हरा है, जो लड़की के चेहरे को और हाइलाइट करता है. मोती इतना बड़ा है कि असली जैसा ही दिखता है. इसे मैट चमक देने के लिए वार्निश किए जाने के दावे भी किए जाते हैं. मोती वर्मीयर की अपनी कल्पना का नतीजा बताया जाता है. क्योंकि 1650 से 1680 के आसपास के दौर में मोती (असली हो या नकली) डच लड़कियों के बीच बहुत फैशन में थे. अक्सर फ्रांस में वैन मीरिस, गेब्रियल मेट्सू और गेरार्ड टेर बोरच की पेंटिंग्स में ऐसे मोती देखने को मिलते हैं.

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 मोती वर्मीयर की अपनी कल्पना का नतीजा बताया जाता है.

वर्मीयर (1632-1675) डच गोल्डन एज के मास्टर पेंटर थे. उनकी सिर्फ 37 पेंटिंग्स के बारे में ही जानकारी उपलब्ध है. वे लाइट, शैडो और रिफ्लेक्शन के जादुई इस्तेमाल के लिए मशहूर थे. इस पेंटिंग में लाइट लड़की के चेहरे पर बाईं तरफ से आती दिखती है, जिससे उसकी त्वचा नरम और जीवंत लगती है. मोती में रिफ्लेक्शन इतना सटल है कि ये असली लगता है. हालांकि, कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये मोती असल में नहीं, बल्कि चांदी या टिन का है. लेकिन वर्मीयर के ब्रशवर्क से ये चमकदार दिखता है. होंठों पर लाल पिगमेंट (दक्षिण अमेरिकी कीड़े से) और टरबन में अल्ट्रामरीन का इस्तेमाल महंगे मटेरियल दिखाता है.

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वर्मीयर (1632-1675) डच गोल्डन एज के मास्टर पेंटर थे.
पेंटिंग रहस्य से भरी है

18वीं और 19वीं सदी में ये पेंटिंग ज्यादा चर्चित नहीं थी. 1881 में इसे मॉरिट्शुइस ने खरीदा था. Girl with a Pearl Earring को आम जनता ने पहली बार 1881 में जाना, जब इसे हेग (The Hague) के वेंदुहुइस डेर नोटारिसेन में नीलामी के लिए रखा गया था. एग्जिबिशन में विक्टर डे स्टुअर्स का ध्यान इस पेंटिंग ने आकर्षित किया. विक्टर अपने दोस्त और पड़ोसी, आर्ट कलेक्टर एए देस टॉम्बे के साथ वहां मौजूद थे. और उन्होंने वर्मीर की कला को पहचान लिया.

दूसरी थ्योरी के कहती है कि ये पेंटिंग इतनी गंदी थी कि उसे ठीक से पहचानना भी मुश्किल था. पेंटर की पहचान बाद में तब हुई जब सफाई के दौरान वर्मीर के हस्ताक्षर सामने आए. जो भी हो, इसके बाद विक्टर और टॉम्बे ने आपस में बिडिंग से इनकार कर दिया. टॉम्बे ने इसे बेहद कम कीमत में खरीद लिया. जानकारी के अनुसार सिर्फ दो गिल्डर प्लस 30 सेंट अतिरिक्त शुल्क पर. आज की करेंसी में 20-30 डॉलर (2000 हजार रुपये के आसपास) के दाम  पर.

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पेंटिंग में होंठ हल्के खुले हैंं.

देस टॉम्बे का कलेक्शन उनके घर पार्कस्ट्राट 26, हेग में विजिटर्स के लिए खुला रहता था. मॉरिट्शुइस के आगे बनने वाले डायरेक्टर अब्राहम ब्रेडियस ने 1885 में पार्कस्ट्राट पर इसे देखकर सबसे पहले इसकी प्रशंसा की. वो बोले,

“वर्मीयर सबको पीछे छोड़ देते हैं. लड़की का सिर इतनी शानदार ढंग से उकेरा गया है कि आपको लगेगा ही नहीं कि ये एक पेंटिंग है. लाइट की चमक ही आपका पूरा ध्यान खींच लेगी.”

16 दिसंबर 1902 को टॉम्बे की मृत्यु हो गई. सबको लगा पेंटिंग का अब क्या होगा? तभी एक बात सामने आई कि टॉम्बे ने गुप्त वसीयत बनाई थी. जिसमें उन्होंने मॉरिट्शुइस को बारह पेंटिंग दान की थीं. इसी में से एक पेंटिंग थी Girl with a Pearl Earring.

1995 में मिली असली प्रसिद्धि

इस पेंटिंग को असली प्रसिद्धि 1995 में मिली. जब वाशिंगटन के नेशनल गैलरी में वर्मीयर एग्जिबिशन के पोस्टर पर ये लगाई गई. 1999 में ट्रेसी शेवलियर के उपन्यास "Girl with a Pearl Earring" और 2003 की इसी नाम की फिल्म (फीचरिंग स्कारलेट जोहानसन) ने इसे ग्लोबल आइकन बना दिया.

2018 के रिसर्च से पता चला कि वर्मीयर ने अल्ट्रामरीन का इस्तेमाल टरबन में किया और कुछ जगहों पर पेंट की लेयर्स में बदलाव किए. ये पेंटिंग रहस्य से भरी है. लड़की कौन है? उसकी अभिव्यक्ति क्या कह रही है? क्या ये प्यार, आश्चर्य या कुछ और है? यही वजह है कि ये आज भी लोगों को मोहित करती है. दुनिया भर में ये सबसे ज्यादा रीप्रोड्यूस और पैरोडी की जाने वाली आर्टवर्क्स में से एक है.

अब आते इस पेंटिंग के वर्ल्ड टूर पर

म्यूजियम का कहना है कि पेंटिंग को अन्य संस्थानों को बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में लोन पर दिया जाता है. 2014 में म्यूजियम ने इसके ट्रैवल पर रोक लगा दी थी. लेकिन 2023 में ये एम्स्टर्डम के रिज्क्सम्यूजियम में प्रदर्शनी के लिए थोड़े समय के लिए गई थी.

इस बार का कारण मॉरिट्शुइस का अपना रेनोवेशन है. म्यूजियम 24 अगस्त से 20 सितंबर 2026 तक बंद रहेगा, क्योंकि बिल्डिंग में बदलाव किए जा रहे हैं. इसी दौरान पेंटिंग जापान में रहेगी. प्रदर्शनी का आयोजन जापान के बड़े मीडिया संगठन असाही शिंबुन कर रहा है, जो पिछले कई सालों से दुनिया भर के म्यूजियम के साथ एग्जिबिशन करता आ रहा है. असाही शिंबुन ने 2012-14 में भी मॉरिट्शुइस की एक वर्ल्ड टूरिंग एग्जिबिशन को स्पॉन्सर किया था, जिसमें ये पेंटिंग टोक्यो और कोबे में दिखी थी और कुल 22 लाख लोग इसे देखने पहुंचे थे. जापान में ही 12 लाख लोगों ने इसे देखा था.

मॉरिट्शुइस की जनरल डायरेक्टर मार्टिने गोसेलिंक ने कहा,

"हम असाही शिंबुन के साथ काम करके बहुत सम्मानित महसूस कर रहे हैं. हर साल हजारों जापानी टूरिस्ट हमारे म्यूजियम आते हैं जो इस पेंटिंग को प्यार देते हैं. 'द गर्ल' का जापान जाना जापानी पब्लिक के साथ इसे शेयर करने का एक अनोखा मौका है, और ये शायद आखिरी बार होगा."

इस लोन से मिलने वाली कमाई मॉरिट्शुइस के रेनोवेशन, नए बिल्डिंग (कोर्टे वाइजेनबर्ग पर दिसंबर 2025 में खरीदी गई) के रिफर्बिशमेंट और 2028 तक एजुकेशन सेंटर बनाने के लिए इस्तेमाल की जाएगी. एग्जिबिशन में डच गोल्डन एज की अन्य पेंटिंग्स भी दिखाई जाएंगी. जिससे वर्मीयर के दौर का बेहतर कांटेक्स्ट मिलेगा. टिकट और डिटेल्स फरवरी 2026 के अंत तक आने वाली हैं. ये जापानी आर्ट लवर्स के लिए एक बार का मौका हो सकता है, क्योंकि मॉरिट्शुइस की सख्त पॉलिसी के चलते ऐसे एग्जिबिशन्स बहुत कम ही होते हैं.

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