किसी भी सफ़र को हम तक ही आकर ख़त्म होना चाहिए. पर सारी जगहें ऐसी नहीं होती हैं. कुछ जगहें आपको अपने पास बुला लेती हैं. हम राजस्थान में थे. जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर घूमने के बाद भी कुछ छूट रहा था. वो हमें मिला बाड़मेर में. जबकि बाड़मेर हमारे ट्रिप के प्लान में शामिल ही नहीं था. जैसलमेर से 170 किलोमीटर की दूरी पर है बाड़मेर. हम वहां सिर्फ अपने कहानीकार मित्र किशोर चौधरी से मिलने पहुंचे थे. हम पहली बार वहां पहुंचे थे इसलिए वो ही हमारे गाइड थे.

किशोर जी और उनकी पत्नी आभा जी ने राजस्थानी ठाठ-बाट और अपनेपन से हमारी ऐसी ख़ातिरदारी की. ऐसी खातिरदारी के बाद हमारी कहीं और जाने की इच्छा ही नहीं हुई. फिर भी वे दोनों हमें घुमाने लेकर गए बाड़मेर से 39 किलोमीटर दूर किराड़ू के मन्दिर समूह. यह पाँच मन्दिरों का एक समूह है. हाथमा गांव में है. इसे ग्यारहवीं शताब्दी में परमार राजाओं ने बनवाया था. मरु-गुर्जर शैली के इन शैव-वैष्णव मन्दिरों के खंडहर ही बचे हैं. अपने इरॉटिक आर्किटेक्चर की वजह से इसे राजस्थान का खजुराहो भी कहा जाता है.

इसके बारें में ढेरों कहानियाँ हैं. कहते हैं कि महमूद गजनी सोमनाथ जाते हुए इन मन्दिरों को ध्वस्त करते गया. ये भी कि ये कि इस शहर को एक साधु ने श्राप दिया था जिससे हर इंसान पत्थर का बन गया.

मन्दिरों को देखते ही यही लगा कि ऐसी ख़ूबसूरत जगह के बारे में हमें पहले से क्यूं नहीं मालूम था? मंदिरों का ये समूह छोटी पहाड़ियों से घिरा है. इन्हें देखकर आप वर्तमान में नहीं रह सकते. एक अजीब सी जादू भरी जगह है. एक तरफ़ तो वो अपने सुन्दर अतीत की कल्पना कराती है. दूसरी ओर वर्तमान में लाकर पटक देती है और आप सब से अलग हो जाते हैं. हमारे साथ बच्चे थे तो खूब चहल-पहल थी. बदमाशियाँ थी. नई जगह देखने का जोश तो था ही.

पर जब आप अपने चारों ओर बुरी तरह टूटी-बिखरी मूर्तियाँ, बेमिसाल मंदिरों के टूटे हुए गुम्बज, शिव और विष्णु के मंदिरों से चमगादड़ों को उड़ते देखते हैं तो आप उदास हो जाते हैं. यह उदासी आपको आपकी क्रिएटिविटी से पल में दूर कर देती है. आशीष को फ़ोटोग्राफ़ी के लिए तो खज़ाना मिल गया था. पर मुझे वहाँ पसरी क्रूरता, उदासी, अकेलापन और अभिशापित होने की ख़ामोश चीख़ें हीं सुनाई पड़ रही थीं. मुझे ये अजीब लग रहा था कि आशीष इन सब के बीच में आराम से फ़ोटो खींच रहा था. इससे मुझे खीज भी हो रही थी.

इन मंदिरों से अलग बाईं तरफ़ एक टीले पर बना एक छोटा सा मन्दिर दिखाई पड़ रहा था. शायद नया बना था. वहां से भी उसमें चहल-पहल दिख रही थी. बजते हुए घंटों की धीमी आवाज़ सुनाई पड़ रहीं थी. ख़ुद को थोड़ा समझाना पड़ा. फिर इन मंदिरों को देखने की बजाय महसूस करने की कोशिश की. मुझे लगा कि ये खंडहर, इसका वीरानापन, इसकी उदासी उतना ही सच है जितना कि टीले पर बने मन्दिर का ज़िन्दा होना. मुझे ये मंदिर किसी रहस्य की तरह अपनी और खींचने लगे. उनका आकर्षण अपनी तरफ़ ना खींचकर मुझे मेरे अन्दर ही फेंक रहा था.

आशीष सुपर-एक्साइटेड होकर बोले
"यहाँ तो दो-चार दिनों तक फ़ोटो-शूट किया जा सकता है. मॉडल-शूट के लिए तो ये जगह बेस्ट है"
मैं हँस कर बोली
"जहाँ एक छोटी सी मूर्ति भी साबुत नहीं, वो जगह किसी भी बात के लिए परफ़ेक्ट साबित करने के लिए बेस्ट ही है."
उधर किशोर जी आभा जी को कुछ दिखाते हुए बोले
"उस टूटे हुए मंदिर के बगल में इकलौता हरा पेड़ देख रही हो? ये सीन कितनी ख़ूबसूरती से ज़िन्दगी और मौत को डिफाइन कर रहा है." उन्हें देखते हुए सोचने लगी कि कितना अलग है ये रेगिस्तान हमारे मैदान से. यहाँ सन्नाटें हैं. उदासियाँ है. इनके साथ इनसे जूझने की चाह भी है. बेमिसाल संगीत है. कलाएँ हैं. साथ में तीखा. चटपटा खाना है. शायद इसीलिए उदासी बेहतरीन है. उसमें भटकता शोर नहीं बल्कि गतिमान शांति है. जो बाहर की बजाय आपको आपके भीतर धकेल देती है. कहता है कि सवाल ढूँढो और जवाब खुद से आने दो.