
भाई राज कपूर के साथ शशि कपूर
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1969 के आसपास के वर्षों में जब मैं इंडस्ट्री में घुसने की कोशिश कर रहा था, तब ये वही समय था, जब
साल 1969 के आसपास के सालों में जब मैं इंडस्ट्री जॉइन करने की कोशिश कर रहा था, तभी मेरा पाला बार-बार उस माहौल से पड़ रहा था, जो पूरी तरह इस बेहद सुंदर दिखने वाले शख्स के इर्द-गिर्द ही घूम रहा था. इंडस्ट्री के कुछ कॉमन दोस्तों, जिनके साथ मैं बस परिचित हो ही रहा था, उन्होंने मुझे एक सामाजिक समारोह में उनसे मिलवाया.

ऋषि कपूर (बाएं), शशि कपूर (बीच में) और अमिताभ बच्चन (दाएं)
'शशि कपूर'! लोगों को यही शब्द सुनाई देता था, जब वो परिचय देने के लिए अपना गर्म, नाज़ुक हाथ आपकी तरफ बढ़ाते थे. उनकी दिल लूट लेने वाली मुस्कुराहट से उनकी आंखों की चमक बढ़ जाती थी. उन्हें ऐसा करने की ज़रूरत नहीं थी. सब लोग उन्हें जानते थे. लेकिन ये उनका लोगों को प्रभाव में ले लेने वाला विनम्र स्वभाव था.
जब वो बोलते थे, तो एक शैतानीभरी, सौम्य, करीब-करीब न सुनी जा पाने वाली, नाज़ुक और गुनगुनाने जैसी आवाज़ आती है. ये उसके लिए सबसे ज्यादा प्यारी और आरामदायक होती थी, जिसे उनसे मिलाया जा रहा होता था. खुद का परिचय देने वाली आदत तो कमाल थी. जिस किसी को भी उनसे मिलवाया जाता था, वो स्वाभाविक तौर पर शांत होता था, पर उनका नाम सुनते ही अपना नाम बताने के लिए उत्साहित हो जाता था. किसी और का नाम जानने के लिए ये बेहद उपयोगी तरकीब थी. और अगर या जब आप किसी से कई सालों के बाद मिल रहे हैं और उसका नाम भूल गए हैं, तो दूसरे शख्स का नाम याद करने के लिए ये सबसे अच्छी तरकीब है.

शम्मी कपूर (बाएं), अमिताभ बच्चन (बीच में) और शशि कपूर (दाएं)
मैं तहेदिल से स्वीकार करूंगा कि ये टेक्नॉल्जी एक सीख के तौर पर मेरे साथ रही. इसने मेरा उन असुविधानजक पलों में साथ दिया, जब अचानक से कोई आपके पास आकर खुद को आपका पुराना दोस्त बताकर कहता है, 'पहचाना मुझे! हम 6 साल पहले केम्प्स कॉर्नर की क्रॉसिंग पर मिले थे और आपने मुझे देखकर हाथ हिलाया था.' तब मेरा दिमाग मुझे चेतावनी दे रहा होता है, 'बेशक तुम्हें नहीं याद है. तुम कैसे याद रख सकते हो. तुम शशि कपूर की तरह हाथ मिलाओ और दोस्ताना बर्ताव करो.'
फिर मैं वैसा ही करता हूं. मेरे चेहरे के भाव बताते हैं कि मुझे याद नहीं है और मैं कहता हूं, 'हां बिल्कुल मुझे याद है... अमिताभ बच्चन..!!'
फिर वो मुझे अपना नाम बताता है... केम्प्स कॉर्नर और हाथ हिलाने का किस्सा बताता है, सड़क पर गुज़रते वाहनों के बारे में बताता है और अचानक मुझे सब याद आ जाता है. मैं बच जाता हूं और वो मेरे बारे में कुछ अच्छी राय लेकर चला जाता है.

करिश्मा कपूर (बाएं), रणबीर कपूर (बाएं ऊपर), रेखा (दाएं ऊपर) और ऋषि कपूर की पत्नी नीतू (दाएं नीचे). शशि कपूर (कुर्सी पर) के साथ.
अगली चीज़ उनके आधे कर्ली बाल थे. वो पूरी तरह ढकते नहीं थे, पर उनके माथे और कानों पर बेतरतीबी से झूलते रहते थे. उन्हें देखकर ऊपर लिखी कहानी मेरे साथ दोहरा गई. मैंने खुद से कहा, 'सुनो, शायद तुम्हें भी अपने कानों को बालों से ढकना चाहिए.' मैं उसी दिन ताज होटल के हकीम हेयर ड्रेसर के पास गया और अपने प्लान को अंजाम दिया, जो आज तक जारी है.
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इसके बाद जो सिलसिलेवार तरीके से हुआ, वो ये कि हमारा रिश्ता बहुत करीबी हो गया, हम पेशेवर मायनों में बहुत करीब आए और फिर पारिवारिक बंधन में बंध गए.
वो बीमार थे. अपनी पत्नी जेनिफर की मौत के बाद उन्होंने कहीं न कहीं अपनी फिक्र करनी छोड़ दी थी. शुरुआत में जब उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, तो कुछ मौकों पर मैं उनसे मिलने गया था. पर मैं दोबारा उन्हें देखने नहीं गया. ये मुझसे कभी नहीं हुआ. मैं अपने खूबसूरत दोस्त और 'समधी' को कभी उस हालत में नहीं देखना चाहता था, जिस हालत में मैंने उन्हें हॉस्पिटल में देखा था.

बीमारी की हालत में शशि कपूर
...और मैंने आज भी नहीं देखा, जब मुझे बताया गया कि वो चले गए हैं.
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शुरुआत में जो शेर लिखा गया है, वो मुझे इंडस्ट्री के ख्यात लेखक रूमी जाफरी ने भेजा था, जब उन्हें शशि कपूर की मौत के बारे में पता चला. 'how long could I have preserved this exquisite and expensive book of life ; the pages of the book were damaged.'

शशि कपूर के निधन पर उनके घर जाते अमिताभ बच्चन. साथ में हैं उनके बेटे अभिषेक.
वो मुझे प्यार से 'बबुआ' कहते थे और उनके जाने के साथ ही उनकी और मेरी ज़िंदगी के कई शानदार अनपढ़े अध्याय भी चले गए.
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