29 मई को देर रात अमित शाह मणिपुर की राजधानी इम्फाल पहुंचे. 27 अप्रैल को हिंसा शुरू होने के बाद से ये सूबे में उनका पहला दौरा है. इम्फाल में शाह ने राज्यपाल अनुसुइया उइके से मिले. फिर देर रात मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह, उनके कैबिनेट सहयोगियों, खुफिया, सुरक्षा और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठक की. ये औपचारिक दौरा नहीं था. क्योंकि गृहमंत्री के साथ केंद्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला और इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर तपन डेका भी मणिपुर पहुंचे हैं. ये बताता है कि स्थिति किस कदर नाज़ुक है. कि केंद्र को अपने सबसे बढ़िया सिपहसालार मैदान में उतारने पड़े हैं.
क्या मणिपुर में हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि केंद्र सरकार को अपने सबसे बढ़िया सिपहसालार मैदान में उतारने पड़े?
मणिपुर हिंसा का कारण उग्रवाद है या जनजातिय के बीच टकराव?


शाह, गृहमंत्री होने के साथ-साथ पॉलिटिक्स की बढ़िया समझ रखते हैं. बीते दिनों सूत्रों के हवाले से खबर आई थी कि उनकी अध्यक्षता में हुई एक बैठक के बाद मणिपुर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को ताकीद की गई थी - ''ज़्यादा राजनीति मत करो अभी.'' जातीय विद्वेष वाले माहौल में ये एक सटीक सलाह मानी गई.
इसी तरह अजय कुमार भल्ला और तपन डेका की मौजूदगी ये बताती है कि केंद्र, सूबे की ब्यूरोक्रेसी और खुफिया तंत्र से ब्रीफिंग चाहता है और फीडबैक भी देना चाहता है. मणिपुर हिंसा पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान का बयान भी आया. आज जनरल अनिल चौहान ने कहा कि मणिपुर में चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं लेकिन कुछ समय में चीजें ठीक हो जाएंगी. CDS ने कहा कि मणिपुर की हिंसा, उग्रवाद से संबंधित नहीं है. बल्कि यह दो जातियों के बीच का टकराव और कानून व्यवस्था का मामला है. जिसमें हम राज्य सरकार की मदद कर रहे हैं.
सोर्सेज के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक, गृहमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में निर्णय लिया गया कि पहली प्राथमिकता कानून व्यवस्था बहाल करने और फिर राहत अभियान चलाने की होनी चाहिए. इसके लिए सुरक्षा बलों से लूटे गए हथियारों को वापस लेने की चुनौती है और ऐसा करने के लिए सुरक्षा बलों को जरूरी कदम उठाने की छूट दी जाए. सुरक्षा बलों से लूटे गए हथियारों वाले बिंदु पर हम आगे विस्तार से बात करेंगे. फिलहाल मीटिंग में लिए दूसरे फैसलों की चर्चा करते हैं.
राज्य में नेशनल हाइवेज पर दोनों समूहों के प्रदर्शनकारियों ने जगह-जगह पर नाकाबंदी की है. नाकाबंदी माने ये नहीं कि गाड़ी की डिक्की खोलो और आगे बढ़ो. कुकी बाहुल इलाकों में कुकी गुट गाड़ियां रोक कर देख रहे हैं कि कहीं कोई मैतेई लोगों की मदद तो नहीं करने जा रहा. यही काम मैतेई बाहुल इलाकों में मैतेई गुट कर रहे हैं. इस वजह से राज्य में और खासतौर पर इम्फाल में खाद्य और ईधन की आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हुई है. जरूरी चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं. इसीलिए गृहमंत्री की बैठक में कीमतों को नियंत्रित करने के लिए जरूरी कदम उठाने और पेट्रोल, एलपीजी गैस, राशन और अन्य खाद्य जरूरतों को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने का फैसला भी किया गया.
इसके अलावा हिंसा में मारे गए लोगों के लिए राज्य और केंद्र सरकार की ओर से 10 लाख रुपए का मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी का ऐलान भी किया गया. मुआवजे की राशि केंद्र और राज्य सरकार दोनों समान रूप से वहन करेंगे. ये ऐलान ज़रूरी था, क्योंकि अप्रैल के आखिर में शुरु हुई हिंसा में अब तक 80 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. 20 हजार से अधिक लोग शरणार्थी शिविरों में हैं. 1700 से अधिक घर जलाए जा चुके हैं. जिस समूह का नुकसान हुआ है, वो बदला लेने पर आमादा है.
दिक्कत ये है कि सुरक्षा बलों के सामने कोई एक टार्गेट नहीं है, जिससे निपटकर वो स्थिति को काबू कर लें. यहां समाज ही समाज से लड़ रहा है. इसीलिए प्रमुख नेताओं और अधिकारियों के साथ बैठक के बाद अमित शाह ने इम्फाल में अलग-अलग प्रतिनिधि मंडलों के साथ मुलाकात शुरू की. शुरुआत हुई मैतेई समुदाय की महिला नेताओं के साथ एक ब्रेकफास्ट मीटिंग के साथ. इस मीटिंग के बाद अमित शाह ने ट्वीट किया,
"मणिपुर में महिला नेताओं (मीरा पैबी) के एक समूह के साथ बैठक की. मणिपुर के समाज में महिलाओं की भूमिका के महत्व पर चर्चा हुई. हम साथ मिलकर राज्य में शांति और समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं."
यहां आगे बढ़ने से पहले मीरा पैबी संगठन के बारे में भी जान लेते हैं. मीरा पैबी. जिसका शाब्दिक अर्थ होता है Women torch bearers यानी मशाल लेकर चलने वाली महिलाएं. इन्हें मणिपुर में गार्डियन ऑफ सिविल सोसायटी के नाम से भी जाना जाता है. ये महिलाएं नशा, महिलाओं के खिलाफ अपराध और सशस्त्र बल अधिकार अधिनियम यानी सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) कानून AFSPA के खिलाफ काम करती हैं. ये महिलाएं रात को शहर की सड़कों पर मशाल के मार्च करती हैं और प्रोटेस्ट भी करती हैं. ये संगठन 2004 में असम राइफल्स के जवानों द्वारा मनोरमा नाम की युवती की हिरासत में हत्या और बलात्कार के खिलाफ प्रदर्शन के बाद दुनिया भर में चर्चा का विषय बना था.
वापस गृहमंत्री के दौरे पर लौटते हैं. मीरा पैबी के अलावा अमित शाह ने अलग-अलग सिविल सोसायटी के लोगों के साथ भी मुलाकात की. मुलाकात के बाद अमित शाह ने कहा कि लोगों ने शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई और आश्वासन दिया कि हम साथ मिलकर मणिपुर में सामान्य स्थिति बहाल करने का मार्ग प्रशस्त करने में अपना योगदान देंगे.
इम्फाल में मैतेई समुदाय के लोगों से मुलाकात के बाद कुकी समुदाय के लोगों से बातचीत के लिए अमित शाह चुराचांदपुर के लिए रवाना हो गए. चुराचांदपुर जिला पहाड़ी इलाके में आता है, जो कि कुकी समुदाय बाहुल्य है. यहां 3 मई को हिंसा की शुरुआत हुई थी. अमित शाह चुराचांदपुर पहुंचे तो वहां से विजुअल्स भी सामने आए. जिनमें अमित शाह के गुजरते काफिले के दोनों ओर सड़क पर लंबी चेन बनाकर महिलाएं खड़ी हैं. कुछ के हाथ में तिरंगा है और कुछ के हाथ में बैनर. इन बैनर्स पर लिखा है,
>>''हम आदिवासी हैं जंगल हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है''
>>''हमारी मांग केंद्र शासित प्रदेश''
>> 'हमें न्याय चाहिए''
यहां एक चीज जो उभर कर आती है वो है अलग राज्य की मांग. इसे समझने के लिए हमें थोड़ा सा पीछे चलना होगा. मणिपुर में उग्रवादी आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है. 1950 के दशक में नागा विद्रोह ज़ोर पकड़ रहा था. एक स्वतंत्र नागा देश की मांग चरम पर थी और इस लड़ाई का असर मणिपुर के कुछ हिस्सों पर भी था. क्योंकि वहां भी ठीक-ठाक नागा आबादी रहती थी (और है).
50 के दशक से चला आ रहा ये उग्र आंदोलन कुछ धीमा पड़ा 1997 में. जब नागा अलगाववादी समूह नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड (इसाक मुइवा) (NSCN-IM) ने भारत सरकार के साथ संघर्षविराम समझौते पर दस्तख़त किया. लेकिन इससे पहले ही इस आंदोलन ने पूरे क्षेत्र पर ऐसे घाव छोड़े जो अभी भी भरे नहीं हैं.
मणिपुर भारत का हिस्सा बना 14 अगस्त 1947 को. मणिपुर के राजा महाराजा बोधचंद्र और भारत सरकार के बीच विलय समझौता हुआ. लेकिन सब इस समझौते के पक्ष में नहीं थे. जैसे, मेइती समुदाय.
इसके बाद 1964 में यूनाइटेड नैशनल लिबरेशन फ्रंट (UNLF) का गठन किया गया. इस संगठन ने भारत से अलग होने की मांग की. तब कई छोटे-छोटे विद्रोही समूह या मैतेई विद्रोही समूह बने. इन्हें कहा गया valley rebels माने घाटी के उग्रवादी. मसलन, People’s Revolutionary Party of Kangleipak (PREPAK) और People’s Liberation Army (PLA). इन्होंने दो फ़्रंट्स पर मोर्चा खोला था. भारत के ख़िलाफ़ और नागा विद्रोही समूहों के ख़िलाफ़. इन ग्रुप्स को हथियार और ट्रेनिंग मिलती थी चीन से.
इन मेइती समूहों के जैसे ही कूकी और ज़ोमी समुदायों ने भी अपने ग्रुप्स बनाए. वो भी नागा आक्रमणों के भोगी थे. 1993 में NSCN ने कूकी गांवों/क़बीलों पर हमला किया था और इस नरसंहार में हज़ारों कूकी बेघर हो गए थे. और, ऐसा नहीं था कि ये "दुश्मन का दुश्मन - दोस्त" वाली नीति के तहत काम कर रहे थे. इनमें आपस में भी तनाव था. अलग-अलग ट्राइब्स में तो तनाव था ही, एक ट्राइब में भी कई धड़े थे. मिसाल के तौर पर, मेइती समुदाय के मुसलमानों का अपना ग्रुप था. हालांकि, इसमें से बहुत सारे ग्रुप्स समय की मार मारे गए. जिससे पिछले कुछ सालों में इनकी एक्टिविटी कम हुई.
जिस तरह मैतेई गुटों के उग्रवादी गैंग बने, उसी तरह पहाड़ी जनजातियों ने भी हथियार उठाए. इनमें से कई गुट हाल के सालों तक सक्रिय थे. मार्च के महीने में एन बीरेन सिंह सरकार के आदेश पर चुराचांदपुर इलाके में ''अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई'' हुई. कुकी समूहों ने कहा कि इसमें पक्षपात हो रहा है. इसके बाद चुराचांदपुर में बवाल हुआ और बिरेन सिंह ने अचानक यूनाइटेड पीपल्स फ्रंट (UPF)और कुकी नेशनल ऑर्गनाइज़ेशन KNO के साथ हुआ ''suspension of operations'' SOO समझौता वापिस ले लिया. ये दो संगठन कुकी उग्रवादियों के लिए umbrella organisation की तरह थे. SOO एक तरह का सीज़फायर ही था. इसके जाते ही चुराचांदपुर और बाकी पहाड़ी इलाके बारूद के ढेर पर सवार हो गए. जिसे सिर्फ एक चिंगारी की ज़रूरत थी. हाल के दिनों में हमने मैतेई और कुकी दोनों गुटों को उग्रवादियों की तरह ही हथियार लूटते और हिंसा करते देखा है.
जैसे हमने पहले बताया, कुकियों और ज़ोमियों का आंदोलन तो दूसरे समूहों के अग्रेशन को काउंटर करने के लिए बना था, लेकिन फिर इन्होंने स्वायत्त कूकी-लैंड की मांग शुरू कर दी. कूकी लैंड की मांग क्या है? कितनी वाजिब है? इसका इतिहास क्या है? पहले ये मांग एक स्वायत्त देश की थी, जिसमें भारत, म्यानमार और बांग्लादेश के कूकियों को बसाने का मक़सद था.
बीते 15 मई को मणिपुर के 10 विधायकों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को चिट्ठी लिखी थी. ये सभी विधायक आदिवासी समुदाय से हैं. इन विधायकों ने केंद्र सरकार से आदिवासियों के लिए अलग राज्य की मांग की थी. विधायकों ने चिट्ठी में लिखा कि राज्य सरकार आदिवासियों की रक्षा करने में बुरी तरह फेल रही है. इन 10 विधायकों में 7 विधायक सत्ताधारी भाजपा के थे. जबकि 2 विधायक बीजेपी की सहयोगी कुकी पीपल्स अलायंस और एक निर्दलीय विधायक शामिल थे. आज अमित शाह का इन विधायकों से मुलाकात भी प्रस्तावित है. इस बारे में अभी तक का अपडेट यही है.
अब चलते हैं सुरक्षा बलों से लूटे गए हथियारों की ओर. उग्रवादियों के हाथ में हथियार, सूबे में सुरक्षा बलों के लिए ख़तरा बनता जा रहा है. इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े सुकृता बरुआ और जिमी लीवोन की रिपोर्ट के मुताबिक़, 27-28 मई की रात के बाद से ही राज्य में हथियार-ख़ानों से बंदूक़ें और गोला-बारूद चुराने की कोशिशें की जा रही हैं. पूर्वी इंफ़ाल में तैनात मणिपुर राइफ़ल्स की 7वीं बटालियन के कैंप के गेट के सामने सौ-एक लोग जुटे थे. मक़सद था, हथियार क़ब्ज़ाना. लेकिन सेक्योरिटी पर्सनल्स ने उन्हें तितर-बितर कर दिया. पोरोमपत पुलिस थाने में भी ऐसा ही प्रयास किया गया था. लेकिन वहां भी पुलिस स्थिति को अपने कंट्रोल में रखने में सफल रही. आंसू गैस का इस्तेमाल कर भीड़ को तितर-बितर कर दिया.
इंडियन एक्सप्रेस अखबार में सोर्सेज के हवाले से 18 मई को छपी खबर के मुताबिक हिंसा के शुरुआती कुछ दिनों में मणिपुर पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज, दो पुलिस स्टेशन्स और इम्फाल में IRB बटालियन कैम्प से 1 हजार से अधिक हथियार और 10 हजार राउंड से अधिक बुलेट्स लूटे गए. सोर्सेज के मुताबिक चुराचंदपुर में भी हथियारों के लूटपाट की घटना हुई. आजाद भारत में हथियारों की इतनी बड़ी लूट की कोई घटना हमें ध्यान नहीं आती है. इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक राज्य सरकार के सलाहकार और सीआरपीएफ के पूर्व डीजी कुलदीप सिंह ने कहा,
"हम रिकवरी कर रहे हैं. अब तक हमने 456 हथियार और 6,670 गोलियां बरामद की हैं. इनमें मेइती और कुकी दोनों गुटों द्वारा लूटे गए हथियार शामिल हैं. राज्य में अभी भी कुछ तनाव है. लेकिन हमें उम्मीद है कि जल्द ही स्थिति सामान्य हो जाएगी."
एक्सप्रेस की रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि सुरक्षाकर्मियों ने कई जगहों से हथियार बरामद किए हैं. इनपुट्स के आधार पर ऑपरेशन्स चलाए जा रहे हैं. कुछ-एक जगहों पर हथियार और कारतूस पड़े मिल रहे हैं. और कुछ जगहों पर आरोपियों को हथियार सहित पकड़ा जा रहा है.
मणिपुर में जातीय और उग्रवादी हिंसा का इतिहास पुराना है. बावजूद इसके पिछले कुछ दिनों से राज्य में जो हो रहा है, वो अभूतपूर्व है और संभवतः इतिहास में इसके सबसे ख़राब जातीय संघर्षों में से एक के रूप में दर्ज किया जाएगा. राजनीतिक टिप्पणीकारों का कहना है कि इस अराजकता की पीछे बहुत से कारण हैं. इसी में एक कारण बीरेन सिंह-2.0 सरकार का भी है. अपने दूसरे कार्यकाल में अफीम के बागानों पर कार्रवाई की, बेदखली अभियान चलाए और अपने बयानों में चुराचंदपुर के कुकी समुदाय पर आरोप लगाए कि वो म्यांमार से "विदेशियों" को आश्रय दे रहे हैं. इसी बीच उन्होंने मणिपुर में राष्ट्रीय जसंख्या रजिस्टर NRC की बात छेड़ दी. टाइमिंग और कॉन्टेंट, दोनों लिहाज़ से इस बयान पर सवाल उठाए गए. कि जब केंद्र इस बारे में फूंक फूंक कर कदम रखता है, तो बिरेन सिंह ने अपने से ये चर्चा क्यों छेड़ दी? इन वजहों से राज्य की दक्षिणी पहाड़ी उबाल पर थी. जिस तरीके़ से हाल में हिंसक घटनाएं हुईं, उसे नियंत्रित कर पाने में राज्य सरकार के प्रयासों पर भी सवाल उठ रहे हैं. उन्होंने कुकी गुटों को सीधे-सीधे आतंकवादी कह दिया. इसका नतीजा ये हुआ कि तंत्र और कुकियों में जो संबंध खराब थे, और खराब हो गए. इसीलिए यहां सबसे गंभीर सवाल बिरेन सिंह सरकार की कार्यप्रणाली पर ही हैं. और चूंकि केंद्र में भी बिरेन सिंह वाली पार्टी की ही सरकार है, ये पूछा जाएगा कि डबल इंजन से विकास के वादे का क्या हुआ. क्योंकि जहां शांति नहीं, वहां विकास की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती.
वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: मणिपुर में जारी हिंसा के बीच गृहमंत्री अमित शाह के दौरे से क्या असर पड़ेगा?
















.webp?width=120)

.webp?width=120)
