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सब्जी के ऊपर धनिया लेने वाला देश कैशलेस हो जाए तो इंकलाब हो जाएगा

प्रधानमंत्री ने 'मन की बात' में कैशलेस इकॉनमी की ओर बढ़ने की बात की थी.

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फोटो - thelallantop
सोचिए एक आदमी दस रूपए के गोलगप्पे खाता है. 'एक्स्ट्रा चटनी विथ पापड़ी' भी लेता है. इसके बाद आदमी दस रुपए अपने वॉलेट से निकालता है. नहीं, जेब वाले से नहीं. अपने मोबाइल के ई-वॉलेट से. गोलगप्पे वाला उसका मुंह देख रहा है. अभी उसके ठेले तक पे-टीएम नहीं पहुंच पाया है. उसे रोज रात को दिन भर की बिक्री के बाद नोट और सिक्कों को गिनने की आदत है. हाथ में आए रुपए उसे सुकून देते हैं. उसे इस 'इनविजिबल करेंसी' के बारे में कुछ नहीं पता. आजकल चीजें बहुत तेजी से बदल रही हैं. पता नहीं हम उनके हिसाब से बदल रहे हैं या नहीं. या सब कुछ सिर्फ ऊपर ही ऊपर थोपा जा रहा है. नोटबंदी के फैसले के बाद प्रधानमन्त्री मोदी ने रविवार को पहली बार 'मन की बात' की. कैश के लिए लाइन में खड़े पूरे देश से उन्होंने कैशलेस इकॉनमी की तरफ बढ़ने को कहा. उन्होंने कहा कि ये व्हाट्स-एप चलाने से भी ज्यादा आसान है. इन्टरनेट बैंकिंग की तरफ बढ़ने की बात की. लोगों से इन सब चीजों के बारे में सीखने की अपील की. उन्होंने युवाओं से लोगों को इसके बारे में सिखाने को कहा. सरकार ने इसे बढ़ावा देने के लिए डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड से होने वाले ट्रांजैक्शन के सर्विस चार्ज को भी ख़त्म कर दिया है. लेकिन जैसा कि होता है, हर चीज में कुछ बुरी और कुछ अच्छी बातें होती हैं. तो जिस कैश-लेस इकॉनमी की बात मोदी कर रहे हैं क्या ये आसान चीज है? कैशलेस इकॉनमी क्या है? इस तरह की अर्थव्यवस्था में कैश का कम से कम इस्तेमाल होता है. सारे ट्रांजैक्शन डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, नेट बैंकिंग से होते हैं. बहुत से देश इस तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं. कनाडा में 1 जनवरी, 2013 के बाद, कनाडा की करेंसी नहीं छप रही है. वहां 56 प्रतिशत से ज्यादा लोग कैश से ज्यादा डिजिटल वॉलेट से ट्रांजेक्शन पसंद करते हैं. यहां कार्ड का यूज 70 प्रतिशत तक है जो पूरे विश्व के औसत 40 प्रतिशत से ज्यादा है. इसके अलावा स्वीडन, साउथ कोरिया तेजी से इस और बढ़ रहे हैं. केन्या जैसे गरीब देशों में भी कैशलेस इकॉनमी पर जोर दिया जा रहा है. इसमें अच्छा क्या है? 1. हार्वर्ड के इकोनॉमिस्ट केनेथ रोगोफ का कहना है कि ज्यादातर कैश 'अंडर ग्राउंड इकॉनमी' के रूप में विश्व भर में घूम रहा है. इसी को आसान भाषा में काला धन कहा जाता है. कैशलेस इकॉनमी से इस पर लगाम लगाई जा सकती है. 2. कैश की वजह से ड्रग ट्रैफिकिंग, ह्यूमन ट्रैफिकिंग, उगाही, हवाला, अवैध घुसपैठ जैसे अपराध आसानी से होते हैं. कैशलेस होने पर इनको कंट्रोल किया जा सकता है. 3. चोरी, डकैती जैसे खतरे कम होते हैं. 4. इसका हेल्थ फैक्टर भी होता है. इससे नोटों से फैलने वाले जर्म्स नहीं फैलते. इसमें गड़बड़ क्या है? 1. इससे आपकी बैंकिंग को हैकर्स का ख़तरा बढ़ जाता है. 2. ज्यादातर डेटा सरकारों के पास होता है. इसका पॉलिटिकल इस्तेमाल किया जा सकता है. 3. करोड़ों लोगों के पास डेबिट या क्रेडिट कार्ड नहीं है. उनके रोजमर्रा के काम रुक जाएंगे. भारत के लिए इसे अपनाने में क्या मुश्किलें हैं? 1. इस देश की अपनी समस्याएं हैं. अभी इसे कैशलेस इकॉनमी बनने में बहुत समय है. ये सोच से जुड़ी हुई चीज भी है. ये बात ठीक है कि ज्यादातर लोगों के हाथ में आज स्मार्टफोन हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सारे लोग टेक्नोलॉजी फ्रेंडली हो गए हैं. 2. गूगल इंडिया और बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले साल लगभग 75 परसेंट ट्रांजैक्शन भारत में कैश से हुए. विकसित देशों जैसे यूएस, जापान, फ्रांस, जर्मनी वगैरह में 20-25 परसेंट ट्रांजैक्शन कैश से हुआ था. 3. नोटबंदी के बाद पे-टीएम जैसी मोबाइल ट्रांजैक्शन कंपनियों और ई-वॉलेट कंपनियों के बिजनेस में चार गुनी बढ़ोत्तरी हो गई है. इनकी पहुंच शहरों तक सीमित है. लेकिन ये देश तो ज्यादातर गांवों और कस्बों में बसता है. इन जगहों के लोग इन नए तरीकों के आदी नहीं हैं. ये लोगों की आदत से जुड़ा मसला है. 4. जातीय समीकरण, धार्मिक उठा-पटक, पितृसत्ता, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा से जकड़े समाज से अचानक इतना ज्यादा टेक्नोलॉजी ओरिएंटेड हो जाने की उम्मीद करना थोड़ा ज्यादा ही है. 5. 2016 में RBI ने कहा था कि बैंकों ने अब तक 697.2 मिलियन डेबिट कार्ड और 25.9 मिलियन क्रेडिट कार्ड जारी किए हैं. 6. यहां जितने लोग हैं, उतने कार्ड नहीं हैं. किसी के पास एक है, किसी से पास एक से ज्यादा हैं. किसी के पास एक भी नहीं है. ज्यादातर कार्ड का प्रयोग ATM से रुपए निकालने, ऑनलाइन पेमेंट करने, जिन जगहों पर पॉइंट ऑफ़ सेल मौजूद हैं वहां खरीदारी के लिए स्वाइप करने में होता है. गांव, कस्बों में समस्याएं 1. भारत में लोकल और कस्बाई लेवल पर लगभग 30 करोड़ लोग रहते हैं. इनकी पूरी अर्थव्यवस्था हार्ड-कैश पर ही निर्भर है. देश में ज्यादातर खरीदारी छोटे स्तर पर की जाती है. 2. करोड़ों लोगों के पास अब भी बैंक अकाउंट नहीं हैं. गांवों में बैंक लोगों की पहुंच से बहुत दूर हैं. देश में डिजिटल इंडिया की बात हो रही है लेकिन इसका काम भी ठीक नहीं चल रहा है. बहुत सी जगहों पर बात करने के लिए टॉवर तक नहीं हैं, इन्टरनेट तो बहुत दूर की बात है. 3. देश में लगभग 1.45 मिलियन पॉइंट ऑफ़ सेल हैं जिन्हें बैंकों ने देश भर के 2 लाख ATM में इंस्टॉल किया है. काउंटर में कैश के बदले सामान खरीदने के मुकाबले इनकी संख्या कुछ भी नहीं है. 4. भारत में असंगठित क्षेत्र में बहुत से लोग काम करते हैं. यहां ज्यादातर काम कैश में ही होता है. 5. किसानों को नए नोट ही मुश्किल से मिल रहे थे. बाद में  सरकार ने कहा कि वो पुराने नोटों से बीज खरीद सकते हैं. क्या सच में ऐसा सोचा जा सकता है कि इन किसानों को ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के बारे में पता होगा और वो इससे बीज खरीदेंगे? दिहाड़ी करके पेट पालने वाले मजदूर कहां जाएंगे, इसका जवाब शायद ही किसी के पास हो. रोज के रोज सब्जी बेचने वाले, रिक्शा चलाने वाले लोग कहां जाएंगे, पता नहीं. देश में गरीब लोग अब तक की सरकारों की मेहरबानी से  बहुत ज्यादा हैं. ये किस 'कार्ड' से 'ट्रांजैक्शन' करेंगे? शहरों की दिक्कतें 1. सिर्फ गांवों में ही ऐसी स्थिति हो, ऐसा नहीं है. शहरों में फिलहाल तो लोग हाथ में कैश ना होने की वजह से परेशान हैं. खर्चे ज्यादा हैं. जिनके पास कार्ड और नेट बैंकिंग की सुविधाएं हैं, उनके सामने भी रोजमर्रा की दिक्कतें हैं. 2. चीजों को खरीदने के लिए ज्यादातर बड़ी दुकान वालों ने मिनिमम परचेज की लिमिट लगाई हुई है. यानी अगर मुझे कम रुपयों का सामान खरीदना है तो भी मुझे उस मिनिमम लिमिट तक की खरीददारी करनी ही होगी. इसके अलावा वो कई तरह के टैक्स भी सामानों में ऐड करते हैं. 3. ऑनलाइन सामानों को आराम से महंगे दामों में बेचा जा सकता है और उनकी क्वालिटी की भी कोई गारंटी नहीं है. लोगों के पास दूसरा चारा नहीं है, इसलिए उन्हें इन्हें खरीदना ही होगा. रोज की चीजें की खरीददारी में बहुत सी दिक्कतें होंगी. 4. सरकार को नोटबंदी के बाद आई समस्याओं को संभालने में ही समय लग रहा है. नोटों की कमी हो रही है. ऐसे समय में कैशलेस होने की तरफ बढ़ने की भी बात करना लोगों के ऊपर दो-तरफ़ा मार है. देश अभी इसके लिए भी तैयार है, कहना मुश्किल है. अभी इसमें वक्त लगना है.
 

ये स्टोरी निशान्त ने की है.

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