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समलैंगिक जोड़े शादी नहीं कर सकते पर परिवार तो बना सकते हैं, हाई कोर्ट का अहम फैसला

यह फैसला एक समलैंगिक जोड़े के मामले में आया, जिन्हें जबरन अलग कर दिया गया था. कोर्ट ने कहा कि सेक्सुअल ओरिएंटेशन गरिमा और स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण हिस्सा है, और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजी स्वतंत्रता का हिस्सा है.

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भारत में समलैंगिक शादी को कानूनी मान्यता नहीं मिली है. (सांकेतिक तस्वीर- इंडिया टुडे)

मद्रास उच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा कि भारत में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं मिली है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि LGBTQIA+ समुदाय के लोग परिवार नहीं बना सकते.

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बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और वी लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने सुप्रियो बनाम भारत सरकार मामले का हवाला दिया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि समलैंगिक जोड़ों को विवाह का मौलिक अधिकार नहीं है. लेकिन कोर्ट ने यह भी कहा कि विवाह ही परिवार बनाने का एकमात्र तरीका नहीं है. समलैंगिक समुदाय में 'चुने हुए परिवार' की अवधारणा को मान्यता मिल चुकी है.

यह फैसला एक समलैंगिक जोड़े के मामले में आया, जिन्हें जबरन अलग कर दिया गया था. एक पार्टनर (हिरासत में ली गई महिला) को उसके परिवार ने जबरदस्ती रोक रखा था. दूसरी पार्टनर (याचिकाकर्ता) ने पुलिस से मदद मांगी, लेकिन पुलिस ने मदद नहीं की और हिरासत में ली गई महिला को उसके माता-पिता के साथ जाने के लिए मजबूर किया. परिवार ने भी उसके साथ मारपीट की.

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रिपोर्ट के मुताबिक हिरासत में ली गई महिला की मां ने दावा किया कि उनकी बेटी नशे की आदी है और याचिकाकर्ता ने उसे भटकाया. लेकिन कोर्ट ने महिला से बात की और मां के दावों को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि महिला ने स्पष्ट किया कि वह याचिकाकर्ता के साथ जाना चाहती है और उसे परिवार ने जबरन रोका और मारपीट की.

कोर्ट ने यह भी कहा कि हिरासत में ली गई महिला की मां जस्टिस लीला सेठ जैसी नहीं हैं, जिन्होंने अपने बेटे विक्रम सेठ की समलैंगिकता को स्वीकार किया था. कोर्ट ने कहा कि समाज अभी भी रूढ़िवादी है और हर माता-पिता लीला सेठ की तरह नहीं सोचते.

कोर्ट ने कहा कि सेक्सुअल ओरिएंटेशन गरिमा और स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण हिस्सा है, और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजी स्वतंत्रता का हिस्सा है.

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कोर्ट ने 'क्वीयर' शब्द के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाया, जिसका मतलब 'अजीब' या 'असामान्य' होता है. उसने कहा कि समलैंगिक लोगों के लिए उनकी यौन पहचान पूरी तरह सामान्य होती है, तो उन्हें 'क्वीयर' क्यों कहा जाए?

कोर्ट ने फैसला दिया कि हिरासत में ली गई महिला को अपनी पार्टनर के साथ रहने का अधिकार है और उसके परिवार को उसे रोकने का कोई हक नहीं है. कोर्ट ने पुलिस की निष्क्रियता की आलोचना की और कहा कि पुलिस को भविष्य में ऐसे जोड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी.

कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया कि वह LGBTQIA+ समुदाय की शिकायतों पर तुरंत और उचित कार्रवाई करे. साथ ही, हिरासत में ली गई महिला के परिवार को उसकी निजी स्वतंत्रता में दखल देने से रोका गया.

वीडियो: तारीख़: धारा 377 को सुप्रीम कोर्ट ने किन मौलिक अधिकार के खिलाफ कहा था?

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