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छत्तीसगढ़ में चूहे- चिड़िया खा गए 19 करोड़ का धान! सरकारी कागज तो यही कहते हैं

पिछले 10 महीनों में कुल 81,620 क्विंटल धान 'सूखने और क्षति' के नाम पर डॉक्यूमेंट्स में चढ़ा दिया गया. यानी हर घंटे औसतन 11 क्विंटल. हर दिन 272 क्विंटल और हर घंटे एक पूरा ट्रक धान गायब हो रहा है. दिन-रात बिना रुके.

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राज्य में औसतन 3.5% धान सूखने से खराब होता है, और यहां 3.57% है. जो सामान्य सीमा की रेंज में बताया जा रहा है. (फोटो- इंडिया टुडे)

छत्तीसगढ़. जिसे भारत का 'धान का कटोरा' कहा जाता है. प्रदेश इन दिनों एक गंभीर संकट का सामना कर रहा है. सरकारी गोदामों से धान की मात्रा तेजी से कम हो रही है. आधिकारिक तौर पर कहा जा रहा है कि चूहे खा गए, पक्षी चुग गए, दीमक ने खा लिया, हवा में सूख गया या प्राकृतिक नुकसान हुआ. लेकिन आंकड़े और तथ्य कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं. असल में 19 करोड़ के धान में व्यवस्थित और संगठित घोटाले की बात सामने आ रही है.

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इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के महासमुंद जिले में सबसे ज्यादा चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. यहां पिछले 10 महीनों में कुल 81,620 क्विंटल धान 'सूखने और क्षति' के नाम पर डॉक्यूमेंट्स में चढ़ा दिया गया. यानी हर घंटे औसतन 11 क्विंटल. हर दिन 272 क्विंटल और हर घंटे एक पूरा ट्रक धान गायब हो रहा है. दिन-रात बिना रुके. ये नुकसान पांच केंद्रों में बंटा हुआ है-

महासमुंद: 25,780 क्विंटल (3.63%)
बागबाहरा: 18,395 क्विंटल (3.69%)
पिथौरा: 6,828 क्विंटल (2.67%)
बसना: 13,428 क्विंटल (3.79%)
सरायपाली: 17,188 क्विंटल (3.65%)

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अधिकारी इसे सामान्य बता रहे हैं. महासमुंद के जिला मार्केटिंग अधिकारी आशुतोष कोसारिया ने बताया कि 2024-25 का धान सामान्य 5 महीने की बजाय 11 महीने तक रखा गया. राज्य में औसतन 3.5% धान सूखने से खराब होता है, और यहां 3.57% है. जो सामान्य सीमा की रेंज में बताया जा रहा है. बागबाहरा के प्रभारी दीपेश पांडेय ने कहा कि धान बारिश के मौसम में आता है, टारपॉलिन से ढका रहता है. नमी 17% से घटकर 9-10% हो जाती है. 5 महीने में प्रति बोरा 2.5 किलो वजन कम होना स्वाभाविक है. साथ ही दीमक, कीड़े, पक्षी और जमीन पर गिरा धान कीचड़ में मिल जाना भी नुकसान का कारण है.

लेकिन राज्य सरकार के अपने सर्कुलर (12 सितंबर, 2025) के अनुसार 1% कमी पर शो-कॉज नोटिस. 1-2% पर विभागीय जांच और 2% से ज्यादा पर सस्पेंशन, जांच व एफआईआर अनिवार्य है. फिर भी 3% से ज्यादा नुकसान को 'प्राकृतिक' बताकर नजरअंदाज किया जा रहा है.

पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक कवर्धा के कबीरधाम जिले में चारभांठा और बघर्रा केंद्रों से 26,000 क्विंटल धान (लगभग 7-8 करोड़ रुपये) गायब हुआ. शुरू में चूहे-कीड़े की बात कही गई. लेकिन जांच में फर्जी एंट्री, फर्जी बिल, फर्जी मजदूर अटेंडेंस और सीसीटीवी कैमरे बंद करने के सबूत मिले. प्रभारी प्रीतेश पांडेय हटाए गए.

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जशपुर जिले में और बड़ा मामला सामने आया. 2024-25 खरीफ सीजन में कोनपारा सब-सेंटर पर 6.55 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितता पाई गई. रिकॉर्ड में 1,61,250 क्विंटल धान खरीदा दिखा, लेकिन सिर्फ 1,40,663 क्विंटल मिलों/गोदामों को भेजा गया. 20,586 क्विंटल धान (6.38 करोड़ रुपये का) और 4,898 बोरे गायब. एक व्यक्ति गिरफ्तार हुआ, पांच फरार हैं.

छत्तीसगढ़ ने 14 नवंबर 2025 से अब तक 93.12 लाख मीट्रिक टन धान 16.95 लाख किसानों से खरीदा है. 20,753 करोड़ रुपये सीधे खातों में ट्रांसफर किए. 2,740 केंद्रों से ये बड़ा अभियान चल रहा है. लेकिन सवाल यही है, कितना धान वाकई मिलों, राशन दुकानों तक पहुंच रहा है और कितना 'ग्रे जोन' में गायब हो रहा है? अगर चूहे-पक्षी इतना धान खा रहे हैं, तो छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े उपभोक्ता अब किसान या मिल वाले नहीं बल्कि अदृश्य, कुशल और संगठित तत्व हैं. जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, 'धान का कटोरा' खाली होने की कगार पर खड़ा रहेगा.

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