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15 साल में 47 हजार लोग मुंबई लोकल से कटकर मर गए, 15 हजार की तो पहचान भी नहीं हो पाई

मुंबई लोकल से साल 2002 से 2024 के बीच 72 हजार लोगों ने अपनी जान गंवाई.

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मुुंबई लोकल की सांकेतिक तस्वीर.(क्रेडिट - इंडिया टुडे)

मुंबई की लाइफ लाइन कही जाने वाली मुंबई लोकल को लेकर भयावह आंकड़े सामने आई है. हर साल हजारों लोग इससे कटकर अपनी जान गंवा देते हैं. हाल में एक RTI के जरिए खुलासा हुआ कि बीते 15 सालों में (साल 2009- साल 2024 के बीच) 46 हजार 979 लोगों ने अपनी जान गंवाई, जिसमें से 14 हजार 513 शव ऐसे हैं जिनकी पहचान भी नहीं की जा सकी. यानी हर तीसरे शव की पहचान नहीं की जा सकी. 

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टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक, ऑर्थोपेडिक डॉ. सरोश मेहता ने एक RTI दायर की थी. RTI में बीते 22 सालों में लोकल ट्रेन्स के कारण हुई मौतों के बारे में जानकारी सामने आई है. इसके मुताबिक, साल 2002 से 2024 के बीच 72 हजार लोगों ने अपनी जान गंवाई. ये मौतें सेंट्रल रेलवे, हार्बर लाइन, और वेस्टर्न रेलवे में आने वाले ट्रैक्स पर हुई थी. इसमें से ज्यादात्तर मौते ट्रैक क्रॉस करते समय या फिर ट्रेन से गिरने के कारण हुईं.

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि कई बार इन हादसों में शव इस हालत में होता है कि उनकी पहचान करना भी मुश्किल हो जाता है. मोबाइल फोन, ID कार्ड  या ऐसा कोई भी सबूत नहीं मिलता जिससे उनके परिजनों तक पहुंचा जा सके.

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शव की पहचान न होने पर क्या करती है पुलिस?

एक पुलिस अधिकारी ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया,

“जब किसी शव की पहचान नहीं हो पाती, तो उसे 15 दिन से एक महीने तक मोर्चरी में रखा जाता है. इस दौरान उसकी तस्वीरें मुंबई के सभी पुलिस स्टेशनों पर भेजी जाती है ताकि अगर किसी के गुमशुदा होने की रिपोर्ट दर्ज हुई हो तो उससे मिलान किया जा सके."

उन्होंने आगे बताया, 

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"अगर इसके बाद भी जब कोई परिजन सामने नहीं आता, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शव का अंतिम संस्कार या फिर उसे दफन कर दिया जाता है. (अगर शव के धर्म की पहचान की जा सकी हो तो ही) साथ ही, शव के कुछ कपड़े या निजी सामान पुलिस रिकॉर्ड में संभाल कर रख लिए जाते हैं, इस उम्मीद में कि शायद भविष्य में उनका परिवार सामने आए.

शव की पहचान के लिए पुलिस की पहल

इस स्थिति को देखते हुए GRP (गवर्नमेंट रेलवे पुलिस) ने 'Shodh' नाम से एक वेबसाइट बनाई, जहां अज्ञात शवों की तस्वीरें और उससे जुड़ी जानकारियां अपलोड की जाती थीं. ताकि परिजनों तक पहुंचा जा सके. लेकिन कुछ समय बाद इस प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया.

इसके बाद पुलिस ने पहचान के लिए रेलवे स्टेशनों पर मृतकों की तस्वीरों के बैनर लगाने शुरु किये लेकिन यात्रियों ने इसे डिस्टर्बिंग बताया जिसके बाद बैनर्स को वहां से हटा दिया गया. इसके बाद भी GRP की टीमें कई बार टैटू, कपड़े के टैग, या दूसरे सबूतों के जरिए परिजनों तक पहुंचने में सफल होती हैं. लेकिन ऐसा हर बार नहीं होता. 

डॉ. मेहता बताते हैं कि कई बार मोर्चरी में अज्ञात शवों को रखने की जगह नहीं होती, इस कारण उन्हें ज्यादा समय तक नहीं रखा जा सकता. और जल्द ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाता है. 

डॉ. मेहता ने बताया कि साल 2012 के बाद मौतों के आंकड़ों में कमी आई है. अपवाद के तौर पर कोविड के समय मौत के आंकड़ों में भारी गिरावट आई लेकिन लोगों के वापस काम पर लौटने के बाद से ये संख्या बढ़ ही है. बीते पांच सालों से ये संख्या बढ़ रही है.

डॉ. मेहता के मुताबिक, बाउंड्री वॉल और क्लोज्ड-डोर कोच के जरिए ट्रैक क्रॉस करने या ट्रेन से गिर कर होने वाली मौतों को रोका जा सकता है. उन्होंने बताया,“रेलवे ने फुट ओवर ब्रिज और एस्केलेटर बनाने शुरू तो किए हैं, इसके बाद भी साल हजारों लोग अपनी जान गवां रहे हैं. ये बताता है कि रेलवे का जीरो डेथ का मिशन अब भी दूर है.”

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