अचानक एक गंभीर बीमारी और आपकी सारी ‘जमा पूंजी’ खत्म हो सकती है. एक सर्वे में पता चला है कि तमाम हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम के बावजूद लोगों को अस्पताल के खर्च के लिए अपनी जेब ढीली करनी पड़ रही है. इनमें भी ज्यादा से ज्यादा लोग निजी अस्पतालों की ओर रुख करते हैं. सरकारी अस्पतालों में इलाज सस्ता है, लेकिन वहां मरीजों के भर्ती होने की संख्या में गिरावट आई है.
हेल्थ इंश्योरेंस लेकर भी 'सुरक्षित' नहीं आपका पैसा, सरकारी सर्वे ने हकीकत दिखा दी
सरकारी और प्राइवेट इलाज के खर्च में भी बड़ा अंतर है. 2025 में प्राइवेट अस्पताल में भर्ती का खर्च सरकारी अस्पताल से 7.6 गुना ज्यादा था, जबकि 2017-18 में यह 6.8 गुना ज्यादा था. National Statistical Office (NSO) की ‘हाउसहोल्ड सोशल कंजम्प्शन: हेल्थ’ की रिपोर्ट में ये बातें सामने आई हैं. ये सर्वे 2025 में 1 लाख 39 हजार 732 घरों के सर्वे पर आधारित है.


National Statistical Office (NSO) की ‘हाउसहोल्ड सोशल कंजम्प्शन: हेल्थ’ की रिपोर्ट में ये बातें सामने आई हैं. ये सर्वे 2025 में 1 लाख 39 हजार 732 घरों के सर्वे पर आधारित है.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, NSO के डेटा से तीन बड़ी बातें सामने आई हैं. पहला ये कि लोग अब ज्यादा प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं. दूसरा, प्राइवेट इलाज का खर्च सरकारी अस्पतालों के मुकाबले बहुत तेजी से बढ़ा है. और तीसरा ये कि लोगों की जेब से होने वाला खर्च महंगाई दर से भी ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. डेटा के अनुसार, भारत में लोगों के पास हेल्थ इंश्योरेंस पहले से काफी ज्यादा हैं, लेकिन इलाज पर अपनी जेब से खर्च अभी भी बहुत ज्यादा बना हुआ है.
NSO के मुताबिक साल 2017-18 के वक्त गांवों में 14 फीसदी और शहरों में 19 फीसदी लोगों के पास किसी न किसी तरह का हेल्थ इंश्योरेंस था. साल 2025 आते-आते इंश्योरेंस धारकों की संख्या काफी बढ़ी. नए डेटा के अनुसार, गांवों में करीब 47 फीसदी और शहरों में 44 फीसदी लोगों के पास कोई न कोई हेल्थ इंश्योरेंस है.
इसके बावजूद अगर किसी को अस्पताल में भर्ती होना पड़े तो उन्हें औसतन करीब 34 हजार रुपये अपनी जेब से खर्च करने पड़ते हैं. ये रकम 2023-24 में एक औसत भारतीय परिवार के मासिक खर्च का लगभग 1.64 गुना है. इसका मतलब है कि अगर अचानक इलाज का खर्च परिवार पर आ जाए तो यह उसके लिए बड़ा आर्थिक झटका बन सकता है.
शहरों के मुकाबले गांव में इलाज का ये खर्च थोड़ा कम है. यहां लोग अस्पताल के लिए 31 हजार 500 रुपये अपनी जेब से खर्च कर रहे हैं. शहरों में ये आंकड़ा लगभग 38,700 का है. इस डेटा में प्रसव के लिए अस्पताल में भर्ती का केस शामिल नहीं है.
सरकारी-प्राइवेट इलाज के खर्च में अंतर
सर्वे के अनुसार, सरकारी और प्राइवेट इलाज के खर्च में भी बड़ा अंतर है. 2025 में प्राइवेट अस्पताल में भर्ती का खर्च सरकारी अस्पताल से 7.6 गुना ज्यादा पाया गया. 2017-18 में यह 6.8 गुना ज्यादा था. लेकिन ज्यादा पैसा लगने के बाद भी ज्यादातर लोग इलाज के लिए जाते प्राइवेट अस्पताल में ही हैं. वहीं सस्ता इलाज देने के बावजूद सरकारी अस्पताल लोगों का विश्वास नहीं जीत पा रहे. गांवों में सरकारी अस्पतालों में भर्ती का हिस्सा 45.7 फीसदी से गिरकर 39.2 फीसदी हो गया. वहीं, शहरों में 35.3 प्रतिशत से घटकर 32.2 प्रतिशत रह गया.
हालांकि, ऐसे इलाज जिनमें भर्ती होने की जरूरत नहीं है, उनके डेटा की बात करें तो गांवों में सरकारी अस्पतालों का इस्तेमाल थोड़ा बढ़कर 33 फीसदी से 35 फीसदी हो गया. लेकिन शहरों में गिरावट जारी रही. यहां यह आंकड़ा 26 प्रतिशत से घटकर 25 प्रतिशत हो गया.
इस सर्वे से ये बात भी सामने आई है कि निजी अस्पतालों के ज्यादा इस्तेमाल और वहां बढ़ती फीस की वजह से लोगों की जेब से होने वाला खर्च कुल स्वास्थ्य महंगाई से भी ज्यादा तेजी से बढ़ा है. यानी अस्पताल के खर्चे में जितनी महंगाई बढ़ी, लोग उससे ज्यादा अपनी जेब से खर्च करने को मजबूर हैं. डेटा के अनुसार, 2016-17 से 2025 के बीच की अवधि में अस्पताल में भर्ती होने का खर्च 1.88 गुना बढ़ा है. बिना भर्ती इलाज का खर्च 1.42 गुना बढ़ गया. जबकि इसी पीरियड में स्वास्थ्य महंगाई 1.52 गुना और कुल महंगाई 1.43 गुना बढ़ी है.
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