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20 रुपये की रिश्वत, 30 साल चला मुकदमा, बरी होने के अगले दिन कांस्टेबल की मौत

Gujarat HC से बरी होने के बाद Constable ने अपने वकील से कहा कि अब जब मेरी जिंदगी से यह दाग हट गया है, तो अच्छा होगा अगर भगवान अब मुझे अपने पास बुला लें. यह बातचीत CCTV कैमरे में रिकॉर्ड हो गई.

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गुजरात हाईकोर्ट ने कांस्टेबल को बरी कर दिया, लेकिन अगले दिन ही उनकी मौत हो गई (PHOTO-Wikipedia)

कानून और न्याय को लेकर एक मशहूर अंग्रेजी कहावत है, 'Justice Delayed is Justice Denied'. यानी न्याय मिलने में देरी भी एक तरह से न्याय न होने के बराबर ही है. इस कहावत से मिलता-जुलता एक मामला गुजरात में सामने आया है. यहां एक पुलिस कांस्टेबल पर 30 साल तक मुकदमा चला. मुकदमा 20 रुपये की रिश्वत लेने का था. कांस्टेबल इस केस में बाइज्जत बरी हो गए. 30 साल के इंतजार के बाद उन्हें कोर्ट से इंसाफ तो मिला लेकिन बरी होने के अगले ही दिन उनकी मौत हो गई.

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क्या है पूरी कहानी?

ये पूरा मामला अहमदाबाद के वेजलपुर इलाके में तैनात रहे कांस्टेबल बाबू भाई प्रजापति का है. 20 नवंबर 1996 को उनके खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो को शिकायत मिली थी. उस समय बाबू भाई प्रजापति के अलावा उनके दो साथी कांस्टेबल सेवेनकुमार रथवा और नसरुल्लाह खान वेजलपुर थाने में पोस्टेड थे. आरोप था कि उन्होंने शहर में ट्रकों को अवैध रूप से एंट्री करवाने के लिए कथित तौर पर 20 रुपये की रिश्वत ली है. लिहाजा एंटी करप्शन ब्यूरो की टीम ने तीनों कांस्टेबलों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया.

दो दशक बाद आया फैसला

मुकदमा चला और फिर साल 2004 में ट्रायल कोर्ट ने तीनों को 4 साल की सजा सुनाई. तीनों कांस्टेबलों की नौकरी चली गई. इसके बाद तीनों ने इस फैसले को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी. लेकिन हाईकोर्ट में मामला 2 दशक से भी ज्यादा समय तक लंबित रहा. आखिरकार 4 फरवरी, 2026 को जस्टिस एसवी पिंटो ने मामले में फैसला सुनाया. उन्होंने तीनों कांस्टेबलों को इस मामले से बरी कर दिया.

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बाबू भाई प्रजापति पहले अहमदाबाद में ही रहते थे, लेकिन लंबे समय तक चली कानूनी लड़ाई के दौरान अपने गृहजिले पाटन में चले गए थे. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 5 फरवरी की सुबह बरी होने की खबर मिलने के बाद बाबू भाई अपने वकील नितिन गांधी से मिलने गए. गांधी ने बताया कि उन्होंने पुलिस की सेवा से जुड़ी बकाया राशि की वसूली के लिए संभावित कानूनी कदमों पर चर्चा की, क्योंकि प्रजापति की नौकरी 2004 में ही समाप्त कर दी गई थी. 

हालांकि, प्रजापति आगे की कार्रवाई शुरू करने के इच्छुक नहीं थे. दैनिक भास्कर के अनुसार मीटिंग के दौरान, कथित तौर पर उन्होंने अपने वकील से कहा कि अब जब मेरी जिंदगी से यह दाग हट गया है तो अच्छा होगा अगर भगवान अब मुझे अपने पास बुला लें. वकील के मुताबिक, यह बातचीत ऑफिस के CCTV कैमरे में रिकॉर्ड हो गई थी. उस रात प्रजापति अपने भतीजे के घर रुके. लेकिन 6 फरवरी की सुबह पता चला कि प्रजापति की नींद में ही मृत्यु हो गई है.

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