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कनाडा ने चीन से 'दोस्ती' बढ़ाई, ये EV डील जानकर ट्रंप को चक्कर आ जाएंगे!

जिस ग्रीनलैंड पर ट्रंप दावा कर रहे हैं, वहां कनाडा अपनी सेना भेजने की सोच रहा है. दूसरी तरफ उसने अमेरिका के 'कट्टर कारोबारी दुश्मन' देश चीन के साथ इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) को लेकर बहुत बड़ी डील कर ली है.

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अमेरिका से दूर और चीन के पास जा रहा कनाडा (india today)

‘आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे’. हिंदी में ये एक कहावत है, जिसका सीधा मतलब है- ‘लालची को कुछ नहीं मिलता.’ अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप एकदम इसी मुहावरे की सड़क पर भागते दिख रहे हैं. ग्रीनलैंड के मुद्दे पर उन्होंने सहयोगी यूरोपीय देशों को भी ‘दुश्मन’ बना लिया है. अब पड़ोसी कनाडा को भी नहीं छोड़ रहे. अपने नक्शे में कनाडा को अमेरिका का बताने लगे हैं. हालात ऐसे कर दिए हैं कि कनाडा न सिर्फ अमेरिका से दूर भागने लगा है बल्कि इस 'नए दुश्मन के दुश्मन' से दोस्ती गांठनी भी शुरू कर दी है. 

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यानी कनाडा अमेरिका से दूरी और चीन से पींगे बढ़ाने लगा है.

डेनमार्क के उपनिवेश जिस ग्रीनलैंड पर ट्रंप दावा कर रहे हैं, वहां कनाडा अपनी सेना भेजने की सोच ही रहा है. दूसरी तरफ उसने अमेरिका के 'कट्टर कारोबारी प्रतिद्वंद्वी' (biggest business rival) देश चीन के साथ इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) को लेकर बहुत बड़ी डील की है. इंडिया टुडे से जुड़े सम्राट शर्मा की रिपोर्ट के अनुसार, कनाडा ने चीन से आने वाले इलेक्ट्रिक व्हीकल पर लगने वाले टैरिफ में 'भयानक' कमी कर दी है. पहले ये टैरिफ 100 फीसदी का था, लेकिन अब इसे घटाकर सिर्फ 6.1 फीसदी कर दिया गया है.

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कनाडा ने ये फैसला ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ यानी सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र के नियमों के तहत किया है. यानी कनाडा ने पड़ोसी अमेरिका से ज्यादा तरजीह देने वाले देश के तौर पर चीन को स्वीकार कर लिया है. 

कनाडा और चीन में हुई इस ट्रेड डील के तहत पहले फेज में 49 हजार चीनी इलेक्ट्रिक गाड़ियों को कनाडा में आने की इजाजत दी गई है.

इस फैसले से कनाडा का संदेश साफ है. वह अमेरिका से साफ-साफ दूरी बनाना चाहता है. और ये बिल्कुल भी हैरतअंगेज नहीं है. कभी बेहद अच्छे पड़ोसी रहे कनाडा को नीचा दिखाने में ट्रंप ने कोई कमी नहीं छोड़ी है. वो कनाडा को अमेरिका के नक्शे में दिखाकर अपनी साम्राज्यवादी सोच की खुली घोषणा कर रहे हैं. ऐसे में कनाडा की चीन से मिलीभगत की शुरुआत हैरान नहीं करती. 

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हालांकि, ये अचानक नहीं हुआ कि कनाडा अमेरिका से दूरी बनाने लगा. अमेरिका से हटकर चीन की ओर जाने की एक पूरी प्रक्रिया है, जो सालों से कनाडा में चल रही थी. धीरे-धीरे लेकिन लगातार कनाडा अमेरिका से दूर होता गया और धीरे-धीरे ही चीन के करीब जाता गया. 

साल 1990 में कनाडा के कुल आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी 64.6 फीसदी होती थी. वहीं इसमें चीन का हिस्सा सिर्फ 1 फीसदी था. लेकिन 2010 तक कनाडा के टोटल इंपोर्ट में अमेरिका की हिस्सेदारी घटकर 50.4 फीसदी रह गई. चीन का हिस्सा बढ़कर 11 फीसदी हो गया.

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कनाडा ने धीरे-धीरे कारोबार में अमेरिका से दूरी बनानी शुरू की (india today)

साल 2020 आते-आते इसमें अमेरिकी हिस्सा 50 फीसदी से भी नीचे चला गया. कनाडा का अमेरिका से आयात गिरकर 48.9 फीसदी पर आ गया और इसमें चीन का हिस्सा उछलकर 14.1 फीसदी तक पहुंच गया. अनुमान लगाया जा रहा है कि EV को लेकर ये नई डील कनाडा के कुल कारोबार में चीन की हिस्सेदारी को और बढ़ा सकती है. यह अमेरिका के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है. 

यूरोप भी खोल सकता है दरवाजे

खबर ये भी है कि कनाडा के बाद यूरोप भी धीरे-धीरे चीनी EV के लिए अपने दरवाजे खोल सकता है. बात जब कारोबारी प्रतिद्वंद्विता की हो तो अपने नुकसान से ज्यादा दुश्मन का फायदा तकलीफ देती है. अमेरिका के साथ यही होने की आशंका है. यूरोप पहले ही अमेरिका के साथ टकराव के मूड में है. ट्रंप की टैरिफ धमकियों से वो भी हलकान है. अगर ट्रंप ने अपने नाटो सहयोगी देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी पर अमल किया तो यूरोप भी 93 अरब यूरो के अमेरिकी निर्यात पर जवाबी शुल्क लगा सकता है. ये वही नाटो देश हैं, जो ग्रीनलैंड और डॉनल्ड ट्रंप के बीच खड़े हैं.

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