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बुलडोजर एक्शन पर याचिका, सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, कहा- 'पहले हाईकोर्ट जाएं'

SC shifts contempt plea to HC: सुप्रीम कोर्ट ने 'बुलडोज़र जस्टिस' पर अवमानना याचिका की सुनवाई से इनकार कर दिया है. कोर्ट का कहना है कि इस फैसले को लेकर पहले ही आदेश दिए जा चुके हैं. अब इसके पालन की जिम्मेदारी हाईकोर्ट की है.

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सुप्रीम कोर्ट में 'बुलडोज़र जस्टिस' वाले फैसले पर याचिका की सुनवाई हुई. (फोटो-इंडिया टुडे)

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  • सुप्रीम कोर्ट ने 16 जुलाई को बुलडोजर एक्शन से जुड़ी अवमानना याचिकाओं को सुनने से इनकार करते हुए कहा कि ये याचिकाएं संबंधित हाईकोर्ट या निचली अदालत में दायर होनी चाहिए।
  • कई राज्यों में बुलडोजर एक्शन को लेकर विवाद और आरोपों के कारण, जिनमें अवैध निर्माण गिराने के मामले शामिल हैं, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई सीमित करने का फैसला किया।
  • सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि बुलडोजर एक्शन के मामलों में फैसले की पुष्टि हाईकोर्टों द्वारा की जाए और हर याचिका की सुनवाई इसी स्तर पर सुनिश्चित की जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने 16 जुलाई को बुलडोजर एक्शन से जुड़ी अवमानना याचिकाओं (Contempt Plea) को सुनने से इनकार कर दिया है. इन याचिकाओं में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘बुलडोज़र जस्टिस’ के खिलाफ जाकर कुछ घरों को गिराया गया है. अदालत ने कहा कि इन याचिकाओं की सुनवाई हाईकोर्ट या उनसे निचले कोर्ट में होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि हर केस में फैक्ट्स को लेकर विवाद है, कोर्ट हर फैक्ट पर दावे की पुष्टि नहीं कर सकता है.

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लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिव वी मोहना की बेंच के सामने याचिका पेश की गई. कोर्ट ने आदेश जारी किया कि सभी याचिकाएं संबंधित हाईकोर्ट में दायर होनी चाहिए. 

कई राज्यों में हुए बुलडोजर एक्शन से जुड़ी याचिकाएं 

एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए सीनियर वकील हुज़ैफ़ा अहमदी ने कोर्ट को बताया कि कुछ मस्जिद अवैध रूप से गिरा दिए गए. उन्होंने कहा, राज्यों को ऐसा लगने लगा है कि अदालत चाहे जो भी कहे, वो जमीन पर वही करेंगे जो वो चाहते हैं. 

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एक दूसरी याचिका पेश करते हुए सीनियर वकील उदय सिंह ने बताया कि महाराष्ट्र में कुछ इमारतों पर बुलडोज़र एक्शन लोकल नेताओं के कहने पर हुआ है. ये सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है. उन्होंने ये भी दलील दी कि कई घर जानबूझकर गिराए गए और  उसका जश्न भी मनाया गया. 

सीनियर वकील संजय हेगड़े एक फ्रूट जूस वेंडर की ओर से पेश हुए थे. उन्होंने बताया कि उनके मुवक्किल की दुकान पर बुलडोज़र चलाया गया, जिसमें एक टीवी एंकर बैठा था और उसने घटना का लाइव टेलीकास्ट किया था.

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कोर्ट ने क्या तर्क दिया?

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बताया कि नवंबर 2024 में ‘बुलडोज़र जस्टिस’ फैसले में कुछ अपवाद बताए गए थे. जैसे पब्लिक स्पेस में अगर अतिक्रमण हुआ है तो उसपर ये नियम लागू नहीं होते हैं. जस्टिस बागची ने भी सख्त टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि नवंबर 2024 वाले जजमेंट में इस मामले को इसलिए उठाया गया था क्योंकि देश भर में किसी अपराध के आरोपी व्यक्तियों की संपत्तियों को चुन-चुन कर ढहाने का आरोप था. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि अवैध निर्माण वाले इमारतों को भी बचा लिया जाए. 

हालांकि, बेंच ने ये भी कहा कि अगर नगर निगम के अधिकारीयों और अवैध अतिक्रमण करने वालों के बीच आपसी मिलीभगत हो, तब बुलडोज़र एक्शन ज़रूरी हो जाता है. लेकिन बुलडोज़र एक्शन में भेदभाव नहीं होना चाहिए. 

कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया है कि नवंबर वाले फैसले को कानून के तौर पर नहीं देखना चाहिए, उसे संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही निर्देश जारी कर दिए हैं. अब हाई कोर्ट और निचले कोर्ट की ज़िम्मेदारी है कि वो इसका अनुपालन करें. 

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