रविंद्र मेटकर कभी महीने के महज 150 रुपये कमाया करता था. यानी एक दिन की कमाई सिर्फ 5 रुपये. लेकिन फिर उन्होंने खेती शुरू की और आज 15 करोड़ रुपये का कृषि उद्यम खड़ा कर दिया है. रविंद्र मेटकर ने जब खेती का काम करना शुरू किया तो बस एक फॉर्मूला अपनाया कि ‘किसान बाजार की कीमतों को कंट्रोल नहीं कर सकते. लेकिन वे लागत को नियंत्रित कर सकते हैं और पैदावार बढ़ा सकते हैं.’
कभी दिन के 5 रुपये कमाता था ये किसान, अब इतना पैसा है कि Oxford University ने लेक्चर के लिए बुलाया है
Amravati farmer Oxford University invite: एक किसान कभी खेती-बाड़ी करके महीने का 150 रुपये कमाता था. लेकिन फिर उसने काम करने का एक अलग तरीका अपनाया और 15 करोड़ रुपये का एग्रीकल्चर बिजनेस खड़ा कर दिया. अब उनके काम करने के तरीके को जानने के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने उन्हें 'AI For Every Mind' इवेंट में आमंत्रित किया है.
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रविंद्र मेटकर ने इसी मंत्र पर काम करते हुए करोड़ों रुपये का टर्नओवर हासिल कर लिया. अब उनके काम करने के तरीके पर बात करने के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने उन्हें एक इवेंट में आमंत्रित किया है. इसमें वे बताएंगे कि कैसे उन्होंने बाहर से खाद ना खरीदकर खुद से फर्टिलाइजर बनाना और प्रोडक्शन बढ़ाया.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मेटकर को 'AI For Every Mind' थीम पर आधारित ग्लोबल रिसर्च कॉन्फ्रेंस में इनवाइट किया गया है. ये इवेंट 1 से 5 मई तक यूनाइटेड किंगडम में ऑक्सफोर्ड के सैड कॉलेज में आयोजित होगा.
इसमें वह सस्टेनेबल फार्मिंग, खर्चों को कम करते हुए बिजनेस वैल्यू को बढ़ाना, फ्लेक्सिबल फार्मिंग (यानी सूखा, बाढ़ और लू जैसी परिस्थितयों के लिए खेती को मजबूत बनाना) और कुक्कुट पालन पर बात करेंगे. इवेंट में रविंद्र ये भी बताएंगे कि कैसे ट्रेडिशनल प्रैक्टिस के साथ मॉर्डन इनोवेशन का तालमेल बिठाया जा सकता है.
परिवार को मिली जमीन और खेती की शुरूरविंद्र मेटकर का खेती करने का जुनून परिवार से मिली जमीन के बाद शुरू हुआ था. उन्होंने 1994 में अमरावती यूनिवर्सिटी से कॉमर्स में मास्टर डिग्री पूरी की थी. उनके पिता राज्य सरकार के ग्रेड 4 के कर्मचारी थे. रिश्तेदारों ने उनके परिवार को चार एकड़ जमीन दी थी, जिसे बेचकर उन्होंने भंडारा जिले में एक एकड़ जमीन खरीदी.
इस जमीन पर रविंद्र मेटकर ने खेती के नए-नए तरीकों पर एक्सपेरिमेंट करना शुरू किया. TOI से बात करते हुए उन्होंने बताया,
“मुझे शुरू में ही यह बात समझ आ गई थी कि किसान बाजार की कीमतों को कंट्रोल नहीं कर सकते. लेकिन वे अपनी लागत को कंट्रोल कर पैदावार बढ़ा सकते हैं. तभी से मैंने खुद से खाद बनाना शुरू कर दिया.”
उनके खेती के मॉडल की खास बात सस्टेनेबिलिटी (लंबे समय तक चलने वाला तरीका) है. वे मुर्गियों (पोल्ट्री) के लिए बाहर से चारा खरीदने के बजाय इसे स्थानीय स्तर पर खुद तैयार करते हैं. खेत में जो वेस्ट निकलता है, उसे फेंकने के बजाय रीसाइकल करके खाद बना लेते हैं. इससे उन्हें बाजार से कम चीजें खरीदनी पड़ती हैं.
रविंद्र भारत के भी कई किसानों के साथ अपनी खेती के तौर-तरीके साझा कर चुके हैं. उनका कहना है कि वह 50 लाख से ज्यादा किसानों को गाइड कर चुके हैं. अगर वे 15 करोड़ रुपये का टर्नओवर हासिल कर सकते हैं, तो कोई भी ऐसा कर सकता है. वे IAS ट्रेनी को भी लेक्चर दे चुके हैं.
रविंद्र मेटकर अभी अपने गांव में करीब 50 एकड़ जमीन पर खेती कर रहे हैं. उनके खेत में कई तरह की फसलें उगती हैं, जिनमें आम, मौसंबी, आंवला, केले, सुपारी और अनाज शामिल हैं. फसलों की खेती के साथ-साथ वे एक पोल्ट्री फार्म भी चलाते हैं.
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