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लोकसभा में कम हो जाएंगी दक्षिण भारत की सीटें? अमित शाह को सफाई क्यों देनी पड़ी

केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री M K Stalin की आशंका को खारिज किया है कि परिसीमन में दक्षिण के राज्यों की सीटें घट जाएंगी. स्टालिन से पहले RSS ने भी इस मुद्दे पर चिंता जाहिर की थी.

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अमित शाह ने स्टालिन की आशंकाओं को खारिज किया है. (इंडिया टुडे)

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन (M K Stalin) ने 25 फरवरी को परिसीमन को लेकर आशंका जाहिर की थी. उन्होंने कहा कि अगर जनसंख्या के आधार पर परिसीमन किया गया तो राज्य में आठ लोकसभा सीटें कम हो जाएगीं. लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने उनकी आशंकाओं को खारिज किया है. उन्होंने कहा कि संसदीय क्षेत्रों के परिसीमन में किसी क्षेत्र के साथ अन्याय नहीं होगा.

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 26 फरवरी को कोयंबटूर में बीजेपी के एक कार्यक्रम के दौरान अमित शाह ने कहा, 

नरेंद्र मोदी सरकार ने लोकसभा में क्लियर किया है कि परिसीमन के बाद आनुपातिक आधार पर किसी भी दक्षिणी राज्य की एक भी सीट कम नहीं होगी.

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दक्षिण के राज्यों को आशंका है कि विशुद्ध रूप से जनसंख्या पर आधारित परिसीमन से उनको नुकसान होगा क्योंकि उन्होंने उत्तर की तुलना में अपनी जनसंख्या को नियंत्रित किया है. परिसीमन नई जनगणना के आधार पर की जाएगी.

परिसीमन एक संवैधानिक आदेश है, जिसे हर जनगणना के बाद किया जाना चाहिए, ताकि जनसंख्या के लेटेस्ट आंकड़ों के आधार पर सीटों की संख्या और उनकी बाउंड्री को फिर से समायोजित किया जा सके. लेकिन लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या में साल 1976 से कोई बदलाव नहीं हुआ है.

विपक्षी दल खास कर दक्षिण में अच्छा प्रदर्शन करने वाली पार्टियां पिछले कुछ समय से जनसंख्या के आधार पर होने वाले परिसीमन के बारे में बात कर रहे हैं. उनका मानना है कि परिसीमन से आम चुनावों में नॉर्थ इंडिया में अच्छा प्रदर्शन करने वाले दलों को फायदा होगा जिसमें बीजेपी शामिल है. सितंबर 2023 में महिला आरक्षण विधेयक पर संसद में बहस के दौरान तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी DMK ने परिसीमन पर चिंता जाहिर की थी. महिला आरक्षण विधेयक नए परिसीमन के बाद ही लागू होना है. DMK नेता कनिमोझी ने सदन में एम के स्टालिन का एक बयान पढ़ा, 

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इसमें दावा किया गया कि यदि जनगणना के आधार पर परिसीमन किया जाएगा तो इससे दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा.

कनिमोझी का सपोर्ट करते हुए तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा, आंकड़ों के मुताबिक, केरल में सीटों में कोई बदलाव नहीं होगा. जबकि तमिलनाडु में केवल 26 फीसदी सीटें बढ़ेंगी. लेकिन मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों में सीटों की संख्या 79 फीसदी बढ़ जाएगी.

सीटों की संख्या कैसे तय होगी?

परिसीमन के बाद किस राज्य को कितनी सीटें मिलेंगी, यह आधार औसत जनसंख्या पर निर्भर करेगा. जिसे परिसीमन आयोग निर्वाचन क्षेत्रों को बनाने के लिए तय करेगा. अभी परिसीमन आयोग का गठन नहीं हुआ है. साल 1977 में सीटों की संख्या स्थिर होने के बाद से प्रत्येक सांसद औसतन लगभग 10 लाख 11 हजार लोगों का प्रतिनिधित्व करता था. हालांकि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की आबादी एक समान होना असंभव है. खासकर छोटे राज्यों में. लेकिन प्रयास किया जाता है कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की आबादी इस औसत के आसपास रहे.

हालांकि इस आधार औसत पर कोई प्रतिबंध नहीं है कि यह कितनी होनी चाहिए. अगर 10 लाख 11 हजार के औसत को बरकरार रखा जाए तो लोकसभा सीटों की संख्या करीब 1400 हो जाएगी. (केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के 2025 के जनसंख्या अनुमान के आधार पर)

इस आधार पर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की संयुक्त सीटें तीन गुनी बढ़ जाएंगी. अभी इन दोनों राज्यों में 85 सीटें है जो बढ़कर 250 हो जाएगी. वहीं बिहार और झारखंड की सीटों में भी करीब तीन गुना की बढ़ोतरी होगी. इनकी सीटों की संख्या 54 से बढ़कर 169 हो जाएगी. इसी तरह राजस्थान की सीटें 25 से बढ़कर 82 हो जाएंगी.

लेकिन तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 76 तक पहुंचेगी जोकि दोगुने से भी कम है. वहीं केरल की सीटें 20 से बढ़कर 36 हो जाएगी. हालांकि इस जनसंख्या आधार को बरकरार रखने की संभावना नहीं के बराबर है क्योंकि नए संसद भवन में लोकसभा में केवल 888 लोगों के बैठने की व्यवस्था है. इसका मतलब है कि हर निर्वाचन क्षेत्र की आसत जनसंख्या को बढ़ाना होगा.

यदि परिसीमन के लिए जनसंख्या का औसत आधार दोगुना करके 20 लाख कर दिया जाए तो लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 707 हो जाएगी. इस फॉर्मूले से भी दक्षिण के राज्य घाटे में रहेंगे. इस फॉर्मेले के तहत तमिलनाडु की सीटें 39 ही बनी रहेगी लेकिन केरल की दो सीट कम हो जाएगी. इसके उलट उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीटें बढ़कर 126 हो जाएंगी, जबकि बिहार और झारखंड में कुल मिलाकर 85 सीटें होंगी.

2025 के जनगणना के अनुमानों के आधार पर प्रत्येक सीट पर औसतन 17 लाख 84 हजार वोटर्स होंगे. और कुल जनसंख्या 25 लाख 8 हजार होगी. पिछले साल RSS ने भी इस पर चिंता जताई थी. संघ से जुड़ी पत्रिका ऑर्गनाइजर ने अपने संपादकीय में कहा था कि दक्षिण के राज्य बेहतर तरीके से जनसंख्या नियंत्रण का काम कर रहे हैं. इसलिए अगर जनगणना के बाद आधार जनसंख्या में बदलाव किया गया तो दक्षिण के राज्यों की कुछ सीटें कम हो जाएंगी.

कौन करता है परिसीमन और कब होता है?

भारत में चुनाव करवाना और उनके नतीजों का औपचारिक ऐलान करना चुनाव आयोग का काम है. आयोग की ही देखरेख में परिसीमन भी होता है. इसके लिए समय-समय पर एक परिसीमन आयोग का गठन होता है. ये आयोग चुनाव प्रक्रिया से जुड़े सभी स्टेकहोल्डर्स मसलन राजनैतिक दलों आदि को सुनता है, स्वयं जानकारी इकट्ठा करता है. और फिर अपनी रिपोर्ट देकर परिसीमन की अनुशंसा करता है.

भारत के इतिहास में लोकसभा सीटों के परिसीमन के लिए चार दफा आयोग बनाए गए - 1952, 1963, 1973 और 2002 में. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बार परिसीमन आयोग बनाने से पहले सरकार ने इसके खाके पर काम शुरू कर दिया है. जिसमें प्रतिनिधित्व को लेकर मौजूदा व्यवस्था से छेड़छाड़ नहीं होगी, बल्कि ‘जनसांख्यिकी संतुलन’  को ध्यान में रखकर एक ‘ब्रॉडर फ्रेमवर्क’ पर विचार जा रहा है.

जब 2002 में परिसीमन हुआ था तो निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ था यानी 1973 से लोकसभा सदस्यों की संख्या 543 ही है. माने कहा जा सकता है कि 1971 की जनसंख्या के आधार पर ही 2024 में भी लोकसभा सीटें तय हो रही हैं. 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 42वां संविधान संशोधन विधेयक बिल लेकर आई थीं, जिसमें 2001 तक निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निधारण पर रोक लगाने का प्रस्ताव था. उन्होंने फैमिली प्लानिंग को बढ़ावा देने का हवाला देते हुए संसद में यह प्रस्ताव दिया था. 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 91वां संविधान संशोधन विधेयक पेश कर इस रोक को 2026 तक बढ़ाने का प्रस्ताव दिया. पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने भी जनसंख्या स्थिरीकरण एजेंडे का हवाला देकर रोक को बरकरार रखा था.

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