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अजित पवार के बाद NCP किसकी? शरद पवार के अलावा ये नाम सबकी जुबान पर आएंगे

महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री Ajit Pawar के अचानक निधन से Maharashtra की राजनीति में कई सवाल खड़े हो गए हैं. NCP के दोनों धड़ों के विलय की बातें तेज हो गई हैं. वहीं सबसे बड़ा सवाल है कि अजित पवार के बाद एनसीपी की बागडोर किसके हाथ में होगी? सरकार और पार्टी में कौन उनकी जगह भरने वाला है?

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अजित पवार के बाद कौन संभालेगा एनसीपी की कमान? (इंडिया टुडे)

महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार की असामयिक मौत से उनकी पार्टी के सामने नेतृत्व का संकट पैदा हो गया है. चाचा शरद पवार की उंगली पकड़कर सियासत का ककहरा सीखने वाले अजित पवार ने उनकी छांव से निकलकर अपनी अलग राह चुनी. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित गुट) पूरी तरह से अजित पवार की शख्सियत के इर्द-गिर्द रची बुनी थी. लेकिन अब उनके नहीं रहने के बाद सवाल उठने लगे हैं कि अजित पवार की NCP की कमान कौन संभालेगा?

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NCP के भावी नेतृत्व को लेकर कोई भी अटकलबाजी फिलहाल जल्दबाजी होगी. लेकिन पार्टी और परिवार में मौजूद विकल्पों की बात करें तो कई दावेदार सामने आते हैं, जिनकी अपनी ताकत और सीमाएं हैं. दावेदारों की लिस्ट में अजित पवार का परिवार और शरद यादव से अलग होकर आए NCP के स्थानीय क्षत्रप शामिल हैं.

परिवार से सुनेत्रा और पार्थ पवार की दावेदारी

अजित पवार के निधन के बाद बात सिर्फ NCP की नहीं उनके राजनीतिक वारिस को लेकर भी है. ऐसे में अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा एक स्वाभाविक विकल्प के तौर पर सामने आती हैं. सुनेत्रा फिलहाल राज्यसभा सांसद हैं. यूं तो दशकों से अजित पवार के विधानसभा क्षेत्र बारामती में सामाजिक कार्यों के जरिए उनकी सक्रियता रही है. लेकिन राजनीति में उनका डेब्यू साल 2024 के लोकसभा चुनाव में हुआ. उन्होंने बारामती लोकसभा सीट से सुप्रिया सुले को चुनौती दी लेकिन हार गईं.

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लेकिन इस चुनाव के बाद राज्य की सियासत में उनकी एक पहचान बनी. सुनेत्रा की सबसे बड़ी ताकत अजित पवार के समर्थकों का उनसे भावनात्मक जुड़ाव है. साथ ही सुनेत्रा पवार परिवार के राजनीतिक गढ़ बारामती से भी जुड़ी हुई हैं. लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद साल 2024 में अजित पवार ने उनको राज्यसभा में भेज दिया. महायुति गठबंधन की उम्मीदवार के तौर पर उन्हें निर्विरोध चुना गया.

सुनेत्रा पवार की सबसे बड़ी कमजोरी उनकी अनुभवहीनता है. उनके पास स्वतंत्र रूप से संगठन या फिर सरकार में काम करने का कोई अनुभव नहीं है. अब तक उनकी राजनीतिक भागीदारी अजित पवार के साए में प्रतीकात्मक तौर पर ही रही है. ऐसे में NCP को एकजुट रखकर चलना उनके लिए मुश्किल भरा सफर हो सकता है.

अजित पवार के दो बेटे हैं. पार्थ पवार और जय पवार. जय पारिवारिक बिजनेस संभालते हैं. वहीं पार्थ को अजित पवार अपने सियासी वारिस के तौर पर राजनीति में लाए. साल 2019 में मावल लोकसभा सीट से पार्थ को टिकट मिला. तब NCP एकजुट थी. उन्हें पवार परिवार की तीसरी पीढ़ी के तौर पर प्रोजेक्ट किया गया. पार्थ की उम्मीदवारी को अजित पवार द्वारा परिवार के भीतर अपनी राजनीतिक विरासत को स्थापित करने के प्रयास के तौर पर भी देखा गया.

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लेकिन लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद पार्थ ने सक्रिय राजनीति से अपने कदम पीछे खींच लिए. उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र में कोई नेटवर्क नहीं बनाया और न ही कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ने की कोई कोशिश की. हालांकि अजित पवार और पवार परिवार के साथ जुड़ा नाम उनको राजनीतिक तौर पर प्रासंगिक बनाए रखने के लिए काफी है. लेकिन चुनावी असफलता और फिर सक्रिय राजनीति से दूरी मौजूदा परिस्थितियों में उनके दावे को कमजोर करता है. पार्टी भविष्य के लीडर के तौर पर उनमें निवेश कर सकती है.

प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे भी रेस में

अजित पवार के बाद प्रफुल्ल पटेल NCP में नंबर दो की हैसियत रखते थे. वे NCP के सबसे अनुभवी रणनीतिकार और संस्थापक सदस्यों में से हैं. पूर्व केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल की पहचान दिल्ली में शरद पवार के मैसेंजर के तौर पर रही है. लेकिन साल 2023 में NCP के विभाजन के दौरान वह अजित पवार खेमे में चले गए. उनके आने से अजित गुट को संगठनात्मक मजबूती और वैधता मिली. 

प्रफुल्ल पटेल की ताकत दिल्ली की सत्ता से बेहतर संबंध और पार्टी तंत्र की बेहतर समझ है. संकट के समय पार्टी को एकजुट रखने वाले संकटमोचक के तौर पर उनका सम्मान किया जाता है. लेकिन पटेल कभी भी जननेता नहीं रहे हैं. महाराष्ट्र में उनका कोई चुनावी आधार नहीं है. उनकी पहचान वाइट कॉलर और एसी रूम वाली पॉलिटिक्स करने वाले नेता की रही है. ऐसे में NCP नेताओं का उनके पीछे लामबंद होना आसान नहीं है. छगन भुजबल से लेकर सुनीत तटकरे जैसे स्थानीय क्षत्रप शायद ही उनको नेता मानें.

सुनील तटकरे ने कॉपरेटिव और स्थानीय निकाय की राजनीति से उभर कर महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी पहचान बनाई है. उन्होंने कोंकण क्षेत्र को NCP के सबसे मजबूत गढ़ बनाने में अहम भूमिका निभाई है. तटकरे महाराष्ट्र सरकार में जल संसाधन और ग्रामीण विभाग जैसे अहम मंत्रालय भी संभाल चुके हैं.

साल 2023 में पार्टी में हुए विभाजन में तटकरे ने अजित पवार का साथ चुना. इस भरोसे का उन्हें इनाम भी मिला. NCP (अजित पवार गुट) के महाराष्ट्र यूनिट का अध्यक्ष बनाया गया. पार्टी संगठन की कमान संभालने के चलते कार्यकर्ताओं और जिला स्तरीय कमेटियों पर उनकी अच्छी पकड़ है. सुनील तटकरे संगठनात्मक तौर पर मजबूत हैं लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव कोंकण के इलाके तक ही सीमित है. अजित पवार की तरह उनकी अपील पूरे राज्य में नहीं है.

धनंजय मुंडे और छगन भुजबल जैसे नाम भी चर्चा में

इनके अलावा धनंजय मुंडे और छगन भुजबल जैसे नामों पर भी विचार किया जा सकता है. मुंडे अजित पवार खेमे के गिने चुने नेताओं में से हैं, जिनकी जनता के बीच एक अपील है. लेकिन ओबीसी मूल के मुंडे को मराठा सपोर्ट बेस वाली पार्टी में स्वीकार्यता मिल पाएगी ये बड़ा सवाल है. इसके अलावा उनके साथ कई विवाद भी नत्थी हैं. जिनमें बीड के सरपंच संतोष देशमुख की हत्या से जुड़े आरोप शामिल हैं, जिन पर मचे राजनीतिक हंगामे के चलते महाराष्ट्र सरकार से उनको इस्तीफा देना पड़ा था.

छगन भुजबल महाराष्ट्र के सबसे वरिष्ठ ओबीसी नेताओं से में एक हैं. भुजबल ने राजनीति की शुरुआत शिवसेना से की थी. फिर शरद पवार के साथ जुड़े. उन्होंने महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री, पीडब्ल्यूडी और खाद्य और नागरिक आपूर्ति जैसे विभागों की जिम्मेदारी संभाली है.

भ्रष्टाचार के एक मामले में जेल की सजा काट चुके 78 साल के भुजबल ने सियासी वापसी के लिए अजित पवार का साथ चुना. उनकी सबसे बड़ी ताकत उत्तरी महाराष्ट्र में उनका ओबीसी जनाधार है, जो मुश्किल परिस्थितियों में भी उनके साथ खड़ा रहा है. हालांकि उम्र, गिरता स्वास्थ्य और अतीत से जुड़े विवाद छगन भुजबल के रास्ते के सबसे बड़े कांटे हैं. पार्टी का नेतृत्व करने के बजाए सामूहिक नेतृत्व की व्यवस्था में उनकी भूमिका अहम हो सकती है.

शरद पवार फिर से संभालेंगे कमान?

अजित पवार के साथ सियासत कर रहे NCP के तमाम क्षत्रपों की सियासत शरद पवार के साथ ही चमकी है. छगन भुजबल, धनंजय मुंडे, सुनील तटकरे, मकरंद पाटिल नितिन जादव से लेकर प्रफुल्ल पटेल तक को शरद पवार ने सियासी छांव दी है. तभी राजनीतिक अलगाव के बाद भी कभी दोनों तरफ से संबंधों में कटुता नहीं रही. अब सवाल है कि पुराने संबंधों की बुनियाद पर फिर से NCP का कुनबा जुड़ सकता है? क्या शरद पवार इस दिशा में कोई पहल करेंगे?

सवाल मौजूं इसलिए भी है कि 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद अजित पवार और शरद पवार के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलने लगी थी. NCP से जुड़े नेता भी परिवार की एकजुटता की दुहाई देने लगे थे. छगन भुजबल ने तो यहां तक कह दिया कि शरद पवार के कहने पर ही वो अजित पवार के साथ गए थे. विधानसभा चुनाव के बाद भुजबल और शरद पवार की मुलाकात हुई थी. वहीं अजित पवार और शरद पवार के बीच भी कई मुलाकातें हुई थीं.

आजतक मराठी को दिए इंटरव्यू में भी अजित पवार ने पवार परिवार के साथ आने के संकेत दिए थे. पुणे के पिंपरी चिंचवाड़ नगर निगम चुनाव में तो NCP के दोनों गुट साथ मिलकर लड़े भी थे. इसके लिए अजित पवार और सुप्रिया सुले की बात भी हुई थी.

यही नहीं NCP के दोनों गुट 5 फरवरी को होने वाले जिला परिषद चुनाव में एक साथ घड़ी के चुनाव चिह्न पर लड़ रहे हैं. घड़ी चुनाव चिह्न NCP (अजित गुट) को मिला है. सीनियर पत्रकार प्रकाश अकोलकर ने बताया, 

दोनों पार्टियां एक सिंबल पर जिला परिषद चुनाव लड़ रही हैं, जोकि एक तरह से अनौपचारिक विलय का संकेत हैं. अब यह सवाल नहीं रह गया है कि कौन किसमें विलय करेगा. विपक्ष में केवल दो ही दल बचे हैं, कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी).

यानी अकोलकर इशारा कर रहे हैं कि विलय के बाद भी NCP महायुति गठबंधन के साथ बनी रहेगी. वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को यह सुनिश्चित करना होगा कि अजित पवार की पार्टी के 41 विधायक शरद पवार की तरफ वापस नहीं जाए.

बहरहाल अजित पवार के रहते हुए NCP के अधिकतर विधायक और नेता उनके साथ थे. लेकिन सियासत में दुश्मन को दोस्त बनाने की कला में पारंगत शरद पवार NCP के तमाम क्षत्रपों को साधने का दांव चल सकते हैं. अजित पवार की गैर मौजूदगी में शरद पवार से लेकर सुप्रिया सुले और रोहित पवार तक परिवार के साथ मजबूती से खड़े हैं. देखना होगा कि शरद पवार परिवार के साथ NCP को भी एकजुट करने के लिए आगे आते हैं या नहीं.

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: अजित पवार विमान हादसे की पूरी कहानी

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