‘मरीज अस्पताल में भर्ती था. सो रहा था. तभी चूहे ने उसकी उंगलियां कुतर दीं. कभी पैर की. कभी हाथ की.’ ऐसी खबरें आपने खूब सुनी होंगी. पर कभी सोचा है, जब चूहा उंगलियां कुतर रहा था तो मरीज़ को इसका पता कैसे नहीं चला? इसकी एक वजह हो सकती है- नसों का सुन्न हो जाना. यानी उनकी सेंसेटिविटी खत्म हो जाना. लेकिन नसें अचानक से सुन्न नहीं होतीं. पहले नसें कमज़ोर पड़ती हैं. इस दौरान शरीर आपको कई इशारे करता है. अगर इन इशारों को समय रहते समझ लिया जाए तो नसों को बचाया जा सकता है.
नसें कमज़ोर हो रही हैं तो संभल जाएं, ये 3 लक्षण दिखते ही तुरंत डॉक्टर से मिलें
हमारे शरीर में दो तरह की नसें होती हैं– सेंसरी नर्व्स और मोटर नर्व्स. सेंसरी नर्व्स शरीर के हिस्सों (जैसे हाथ-पैर) से संवेदनाएं स्पाइनल कॉर्ड और दिमाग तक पहुंचाती हैं. मोटर नर्व्स दिमाग से आदेश लेकर मांसपेशियों तक पहुंचाती हैं. अलग-अलग बीमारियां अलग-अलग तरह की नसों को प्रभावित कर सकती हैं.


चलिए डॉक्टर से समझते हैं कि नसें कमज़ोर क्यों हो जाती हैं. नसें कमज़ोर होने के लक्षण क्या हैं? क्या कमज़ोर नसें ठीक की जा सकती हैं? और नसें कमज़ोर ही न हों, इसके लिए क्या करें?
नसें कमज़ोर क्यों हो जाती हैं?
ये हमें बताया डॉक्टर आत्मप्रीत सिंह ने.

कुछ बीमारियां ऐसी हैं, जो सीधे नसों पर असर डालती हैं. कुछ लोगों की नसों की बनावट ऐसी होती है कि वो इन बीमारियों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होते हैं. इस वजह से नसें समय के साथ कमज़ोर हो सकती हैं. हमारे शरीर में दो तरह की नसें होती हैं– सेंसरी नर्व्स और मोटर नर्व्स. सेंसरी नर्व्स शरीर के हिस्सों (जैसे हाथ-पैर) से संवेदनाएं स्पाइनल कॉर्ड और दिमाग तक पहुंचाती हैं. मोटर नर्व्स दिमाग से आदेश लेकर मांसपेशियों तक पहुंचाती हैं, जिससे हम चल-फिर पाते हैं. अलग-अलग बीमारियां अलग-अलग तरह की नसों को प्रभावित कर सकती हैं.
नसों के नुकसान का सबसे आम कारण डायबिटीज़ है. अगर डायबिटीज़ कंट्रोल में न हो तो ये सीधे नसों को नुकसान पहुंचा सकती है. डायबिटीज़ खून की छोटी नलियों को नुकसान पहुंचाती है, जिससे नसें भी डैमेज हो सकती हैं. विटामिन्स की कमी भी नसों की कमज़ोरी का बड़ा कारण है. ये हमारे देश में बहुत आम है.
कुछ नसों की बीमारियां लंबे समय तक धीरे-धीरे विकसित होती हैं, जबकि कुछ अचानक से हो जाती हैं. जैसे गुलियन-बैरे सिंड्रोम. इसमें अचानक हाथ-पैरों में कमज़ोरी आ जाती है. चलना-फिरना मुश्किल हो जाता है. कभी-कभी सांस लेने में भी दिक्कत होती है. अगर किसी को अचानक से ऐसी परेशानियां हों तो उसे गुलियन बैरे सिंड्रोम हो सकता है. ये आमतौर पर शरीर के इम्यून रिस्पॉन्स में गड़बड़ी की वजह से होता है. इससे शरीर में बनने वाली एंटीबॉडीज़ गलती से नसों पर हमला कर देती हैं और उन्हें नुकसान पहुंचाती हैं.
हमारी नसों में दो मुख्य परतें होती हैं. बाहरी परत यानी माइलिन शीथ और अंदर की परत यानी एक्सॉन. डायबिटीज़, विटामिन्स की कमी और गुलियन-बैरे सिंड्रोम ज़्यादातर बाहरी परत को नुकसान पहुंचाते हैं. कुछ मामलों में नसों के अंदरूनी हिस्से यानी एक्सॉन पर भी असर पड़ता है. ये सभी बीमारियां सेंसरी और मोटर दोनों तरह की नसों को प्रभावित कर सकती हैं.

नसें कमज़ोर होने के लक्षण
- नसों की कमज़ोरी का सबसे आम लक्षण सुन्नपन है.
- शरीर के किसी हिस्से में संवेदना कम होना या खत्म हो जाना भी एक संकेत है.
- हाथ या पैर में चींटियां चलने जैसा एहसास होना.
- झनझनाहट महसूस होना.
- कभी-कभी करंट जैसा लगना.
- कई बार शरीर के किसी एक खास हिस्से में अचानक सुन्नपन आ जाता है.
- ये लक्षण एक हाथ या दोनों हाथों में, या एक पैर या दोनों पैरों में दिखाई दे सकते हैं.
- जैसे व्यक्ति को चलते समय ज़मीन का ठंडा-गर्म महसूस नहीं होता.
- नसों के डैमेज की वजह से उसका बैलेंस नहीं बन पाता है.
- यानी आम लक्षण हैं- सुन्नपन, झनझनाहट, चींटियां चलना, सेंसेशन कम होना, अचानक करंट लगना.
- करंट जैसा दर्द अक्सर तब होता है, जब स्पाइन में डिस्क स्लिप होकर नस पर दबाव डालती है
- इस स्थिति में दर्द नस के रास्ते (नर्व रूट) के साथ फैलता है, जिसे शॉक लाइक या करंट सेंसेशन कहते हैं

क्या कमज़ोर नसें ठीक की जा सकती हैं?
कमज़ोर नसें ठीक की जा सकती हैं. सबसे पहले ये पता लगाना ज़रूरी है कि नसें कमज़ोर क्यों हो रही हैं? आम कारणों में डायबिटीज़, विटामिन की कमी और पीठ या गर्दन के दर्द शामिल हैं, जिसमें नस दब सकती है. इसलिए पहले कारण पता करना ज़रूरी है. कारण पता चलने के बाद इलाज शुरू होता है. अगर नसों को ज़्यादा नुकसान हुआ है तो रिकवरी धीमी हो सकती है. ये भी हो सकता है कि रिकवरी पूरी तरह न हो. कुछ बीमारियां जैसे- गुलियन बैरे सिंड्रोम पूरी तरह ठीक की जा सकती हैं. अगर इसके लक्षण शुरू होते ही 2–3 दिन के अंदर इलाज मिल जाए तो लगभग पूरी रिकवरी हो सकती है. कुछ इम्यून सिस्टम से जुड़ी नसों की बीमारियां भी सही इलाज से पूरी तरह ठीक हो सकती हैं.
अगर शुगर कंट्रोल में नहीं है तो नस डैमेज लगातार रह सकता है इसलिए डायबिटीज़ के मरीज़ों में शुगर कंट्रोल करना बहुत ज़रूरी है. इससे नसों को हुआ नुकसान कुछ हद तक या पूरी तरह ठीक हो सकता है. अगर विटामिन्स की कमी है तो उसे सुधारें. तब रिकवरी हो सकती है. अगर नस पर डिस्क का ज़्यादा दबाव है तो कुछ मामलों में सर्जरी की ज़रूरत पड़ सकती है. कुछ बीमारियों जैसे लेप्रोसी में भी नसों को नुकसान होता है लेकिन सही और पूरा इलाज करने पर ये भी ठीक हो सकता है.

नसें कमज़ोर ही न हों, इसके लिए क्या करें?
- अपना शुगर लेवल कंट्रोल में रखें
- ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रखें
- विटामिन्स की कमी न होने दें
- अपनी डाइट अच्छी रखें
- डाइट में विटामिन्स, फल, सब्ज़ियां और नट्स शामिल करें
- इनसे पोषक तत्वों की कमी या बीमारियां होने का चांस घट जाता है
- रोज़ 45 मिनट टहलें. इससे नसें ठीक रहेंगी और उन्हें नुकसान पहुंचने का चांस लगभग नहीं होगा या कम होगा.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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