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सौरभ द्विवेदी ने इरफ़ान खान को याद किया, बेटे बाबिल खान समेत जनता रो पड़ी

बात खत्म होती है और बाबिल दौड़कर सौरभ को गले लगा लेते हैं.

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इरफ़ान के जाने का दुख, सामूहिक दुख है.

लल्लनटॉप अड्डा संपन्न हो चुका है. पर उसका खुमार अभी जारी है. हमारे ऑफिस वाले अब भी अड्डा में की गई मस्ती की थकान महसूस कर रहे हैं. मुद्दे पर आते हैं. अड्डा के तीसरे दिन यानी 20 नवंबर को मंच पर आई फ़िल्म 'क़ला' की टीम. टीम में थे बाबिल खान, स्वास्तिका मुखर्जी, अन्विता दत्त और तृप्ति डिमरी. उनका इंटरव्यू किया हमारी साथी ज़ीशा ने. इस इन्टरव्यू में सेंध लगाते हुए हमारे संपादक सौरभ द्विवेदी ने बाबिल खान को एक कहानी सुनाई. आप भी सुनिए.

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सौरभ ने कहा, 

बात है आज से छह बरस पहले की, जब कुछ जुझारू नौजवानों ने लल्लनटॉप की शुरुआत की थी. तब हमारे पास कैमरे नहीं थे, माइक नहीं थे. हमारा कोई इरादा भी नहीं था कि हम टेक्स्ट से इतर वीडियो में शिफ़्ट होंगे. उस वक़्त हमारे न्यूज़रूम में जो हस्ती आई थी, उनका नाम था इरफ़ान खान. सौरभ द्विवेदी अपने जेएनयू के दिनों में उनकी फ़िल्म 'हासिल' पर क्विज़ खेला करते थे. बात है उस वक़्त की जब इरफ़ान 'मदारी' का प्रमोशन कर रहे थे. इसी सिलसिले में वो इंडिया टुडे की बिल्डिंग में आए. इसी बिल्डिंग से लल्लनटॉप ऑपरेट करता है.

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सौरभ द्विवेदी स्टेज से जनता को कहानी सुनाते हैं:

जिनको शूट का आइडिया नहीं है, उनको बता देता हूं. इरफ़ान भाई पैनल पर बैठे कट्टरपंथियों से ज़रूरी किस्म की मुठभेड़ कर रहे थे. पीसीआर में इरफ़ान भाई की वाइफ और बाबिल की मां सुतापा मैम बैठी थीं.

सौरभ ने उनको जाकर बताया कि मैम नमस्ते, मेरा नाम सौरभ है. हम छोटी-सी वेबसाइट चलाते हैं. नाम है लल्लनटॉप. हम इरफ़ान भाई के काम के मुरीद हैं. सुतापा का जवाब था, हम आपको जानते हैं. इरफ़ान आपको बहुत पढ़ते हैं. बहुत सराहते हैं.

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बाबिल को संबोधित करते हुए सौरभ आगे कहते हैं:

वो हमारी लल्लनटॉप ज़िंदगी का पहला इनाम था. इरफ़ान भाई न्यूज़रूम में आए. हमसे बात की. आगे भी ये सिलसिला चलता रहा. दुख हमें बहुत अकेला करता है, बहुत व्यक्तिगत होता है. पर इरफ़ान भाई के जाने का दुख सामूहिक था. बाबिल मुझे नहीं पता था कि मैं तुमसे इस तरह मंच पर मुखातिब होऊंगा.

सौरभ अपनी बात रख रहे हैं और इस बीच उनकी आंखों में आंसू हैं. ऑडियन्स में मौजूद कई लोगों की आंखों में भी आंसू थे. इसी बीच स्टेज के दूसरे कोने में खड़े बाबिल दौड़कर आते हैं और सौरभ को बाहों में भर लेते हैं. गले मिलकर अपनी जगह पर वापस लौट जाते हैं. सौरभ दोबारा शुरू करते हैं:

एक और बात बता दूं. हम पत्रकारों को ये सिखाया जाता है कि भावुक नहीं होना है. आपको ऑब्जेक्टिव रहना है. कभी अपने हिस्से की खुशी और आंसू जाहिर नहीं करने हैं.

पर कभी-कभी ऐसा होता है कि आप खुद को रोक नहीं पाते. ऐसा ही सौरभ के साथ भी हुआ. कोविड की पहली लहर में जब सब बंद था. सौरभ के घर में लल्लनटॉप का स्टूडियो बना था. जब इरफ़ान दुनिया से गए, सौरभ समेत स्टूडियो में मौजूद रजत सेन और अमितेश फफककर रोए.

सौरभ ने आगे कहा:

जब इंटरव्यू के दौरान बाबिल ने एक जवाब देते हुए, लोकप्रियता के सारे पैमानों को किनारे रखकर भीतर के सात्विक गुस्से के साथ कहा: मुझे डेब्यू शब्द से नफ़रत है. मुझे लगा कि मेरे हिस्से के इरफ़ान भाई अभी मौजूद हैं.

बात खत्म होती है और बाबिल फिर से दौड़कर सौरभ को गले लगा लेते हैं. 

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