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वेब सीरीज़ रिव्यू: मुखबिर

ये एक कमज़ोर सीरीज़ है, जिसमें क्लीशे चीज़ों की भरमार है.

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'मुखबिर' की कहानी का प्लाट 1965 के भारत-पाक तनाव के दौर में सेट किया गया है.

पाकिस्तान, जंग, कश्मीर, जासूसी.... यही कुछ keywords हैं जिसके इर्द-गिर्द बुनी गई है सीरीज ‘मुखबिर’. यह कहानी मलोय कृष्णा धर की लिखी किताब ‘Mission to Pakistan’ से प्रेरित है. इस किताब में 60 और 70 के दशक में, भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौर में पाकिस्तान गए एक भारतीय जासूस की पर्सनल और सरहद पार मुश्किलों से भरी ज़िन्दगी के बारे में बात की गई है. वे पाकिस्तान जासूसी करने गए, वहां एक लड़की से शादी की, परिवार बसाया और फिर सेना ने उन्हें गिरफ्तार भी किया. सारी जिंदगी उनकी माँ उनका इंतज़ार करती रही.

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अब आते हैं मुखबिर की कहानी पर

कहानी का प्लाट 1965 के भारत-पाक तनाव के दौर में सेट किया गया है. 1962 के युद्ध से भारत उभरा भी नहीं था कि पकिस्तान के पैटन टैंक्स भारत की खुफिया एजेंसी और सरकार के लिए परेशानी का सबब बन चुके थे. यह पैटन टैंक्स भारत के टैंक्स की तुलना में अधिक शक्तिशाली थे. इस जानकारी से ज्यादा खुफिया एजेंसी के पास और कुछ भी नहीं था. इसके लिए भारत को एक एजेंट की ज़रूरत थी जो पाकिस्तान में उन्ही लोगों के बीच रहकर ज़रूरी जानकारी भारत को दे सके. यह ज़िम्मा सौंपा जाता है एक ऐसे लड़के को जो बहुत  ही चालाक है और जिसे पकड़ पाना बहुत ही मुश्किल. ऐसा मानना है खुफिया एजेंसी के अफसर SKS Moorthy का. इस लड़के का नाम है कामरान बक्श. मूर्ति की मुलाकात कुछ साल पहले कामरान से हुई थी और तभी से कामरान उनके साथ जासूसी का काम करने लगा था.

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रिकॉर्ड्स की जांच करने पर मूर्ती को बुखारी फैमिली के बारे में पता चलता है. इस परिवार में उस्मान, उनकी पत्नी और 3 बच्चे थे. एक रेस्टोरेंट में लगी आग के कारण पूरा परिवार ख़त्म हो गया था लेकिन एक बच्चे की डेड बॉडी नहीं मिल पाई थी. इस बच्चे का नाम था हरफन, जो उस वक़्त कामरान की ही उमर का था. SKS Murthy कामरान को हरफन के नाम से पाकिस्तान भेजने का प्लान बनाते हैं.

उस्मान का भाई शमीम, शमीम का परिवार और उनकी मां पाकिस्तान में ही रहते हैं. कामरान को हरफन के नाम से शमीम के घर प्लांट किया जाता है. यहां से शुरू होता है पाकिस्तान में कामरान की जासूसी का दौर.

1965 के तनाव भरे दौर में ISI,सेना, पुलिस, प्रेम और ऐसी कई चुनौतियों से जूझते हुए हरफन बनकर गया कामरान सारी जानकारियों के साथ भारत लौट पाता है या नहीं? यह तो मुखबिर देख कर ही आपको पता चलेगा.

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अभी बात करते हैं किरदारों के बारे में

सीरीज में लीड रोल में दिख रहे हैं ज़ैन खान दुर्रानी. ज़ैन विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म शिकारा में भी नज़र आ चुके हैं. इसके अलावा वे रेडियो पर  ‘लम्हे विथ ज़ैन’ नाम से शो भी कर चुके हैं.

जासूस के रोल में ज़ैन का किरदार ज़्यादा असरदार नज़र नहीं आता है. उनके किरदार की भावनाएं या उनके expressions उतनी सफाई से दिखाई नहीं देती है कि देखने वाले उन्हें महसूस कर सके या उनके साथ-साथ चल सके.

खुफिया एजेंसी के अफसर SKS Moorthy के किरदार में प्रकाश राज ने उम्मीद के मुताबिक़ अच्छा काम किया है. पर्सनल लाइफ के स्ट्रगल जो सुनने और दिखने में फनी लगते हैं लेकिन उनका प्रेशर हर समय बना रहता है. मूर्ति के चेहरे पर उस तनाव को साफ़ पढ़ा जा सकता है.

आदिल हुसैन, रामकिशोर नेगी के किरदार में SKS Moorthy और जोयदीप बर्मन, जिनका किरदार सुनील शानबाग प्ले कर रहे हैं, को लीड करते नज़र आ रहे हैं. उनका रोल बहुत कम है. जो आदिल हुसैन जैसे एक्टर के साथ थोड़ी नाइंसाफी है.

इसके अलावा अतुल कुमार ने ब्रिगेडियर हबीबुल्लाह का किरदार निभाया है जो बहुत ही घटिया टाइप का इंसान है और सीरीज देखते वक़्त आपको यह महसूस भी होता है.

मेजर जनरल आगा  खान का किरदार हर्ष छाया ने निभाया है. जिसमें कुछ नया देखने को नहीं मिलता है. पाकिस्तानी आर्मी के अफसरों को ज़्यादातर इसी तरह दिखाया जाता है. थोडा घमंड, थोडा गुस्सा और बहुत सारी नफरत.

उनकी पत्नी बेगम अनार का किरदार निभाया है बरखा बिष्ट सेनगुप्ता ने. बेगम अनार को कामरान से प्यार हो जाता है लेकिन आगा खान के साथ रहना उनकी ज़रुरत है. उन्हें गाना गाना पसंद है और आगा खान के इन्फ्लुएंस की वजह से रेडियो पर उनके गाने का शौक पूरा हो जाता है. बरखा इस रोल में एलिगेंट और वल्नरेबल दोनों  दिखाई देती हैं.

ज़ैन के अपोजिट नज़र आ रहीं हैं ज़ोया अफरोज. जमीला के किरदार में वो बेहद ख़ूबसूरत नज़र दिख रही हैं. उनका किरदार स्क्रीन पर एक फ्रेशनेस लेकर ज़रूर आता है.

सत्यदीप मिश्रा ने आलमगीर का किरदार निभाया है. जो पाकिस्तान में कामरान बक्श का हैंडलर है. यह उन सब ‘मुखबिरों’ का प्रतिनिधित्व करते हैं जो गुमनामी में रहकर देश के लिए काम करते हैं और उनके परिवार के हिस्से सिर्फ इंतज़ार और दुःख ही आता है. अलमगीर का किरदार बहुत कम समय के लिए ही सही एक इम्पैक्ट ज़रूर क्रिएट करता है.

सीरीज हमें कैसी लगी?

कामरान जो शुरुआत में बहुत ही बेफिक्र सा दिखाई देता है वो जासूस बनकर जब पाकिस्तान जाता है, तो काफी ज्यादा इमोशनल लगने लगता है. इस बदलाव का कोई मज़बूत कारण दिखाई नहीं देता.  प्रकाश राज का किरदार SRS Murthy कामरान को जासूस बनाकर पाकिस्तान भेजने के लिए जो तर्क देता है, वो किसी को भी इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी देने के हिसाब से लॉजिकल नहीं लगता. इसी तरह जासूसी करने गए कामरान को पाकिस्तान में कदम कदम पर, कभी पुलिस तो कभी ISI पहचान ही लेती है और वो किसी न किसी तरह से बच ही निकलते हैं. ये सब थोडा अजीब लगता है.

ओवरऑल ये एक कमज़ोर सीरीज़ है, जिसमें क्लीशे चीज़ों की भरमार है. स्किप कर सकते हैं.

 

ये रिव्यू हमारे साथी दीपक कौशिक ने लिखा है. 

वीडियो: गुल्लक 3 वेब सीरीज़ पिछले दोनों सीज़न के मुकाबले कितनी दमदार है?

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