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देश भर में कैंसिल हो रहे 'धुरंधर 2' के पेड प्रिव्यू शोज़, मेकर्स को कितना नुकसान होगा?

हिंदी वर्जन में भी फिल्म प्रीमियर से कुछेक घंटे पहले ही थिएटर पहुंची है लेकिन अन्य भाषाओं में फिल्म टेक्निकल पेच के चलते फंस गई और दर्शकों को बिना देखे ही लौटना पड़ा.

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'धुरंधर 2' प्रीमियर शोज़ में सबसे बड़ी अडवांस बुकिंग हासिल करने वाली फिल्म बन गई है.

Dhurandhar 2 पेड प्रिव्यू से ठीक पहले बड़े पेच में फंस गई है. 18 मार्च को इसे हिंदी समेत तेलुगु, तमिल, मलयालम और कन्नड़ा वर्जन में रिलीज़ किया गया है. हिंदी में तो फिल्म को कुछ खास दिक्कत नहीं हुई. लेकिन बाकी भाषाओं में डिस्ट्रीब्यूटर्स मूवी को डिलीवर ही नहीं कर पाए. इस वजह से साउथ के कई सिनेमाघरों में फिल्म के शोज कैंसिल कर दिए गए. साथ ही लोगों को पैसे रीफंड करने का प्रोसेस भी शुरू हो चुका है.

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'धुरंधर' को केवल हिंदी में रिलीज़ किया गया था. मगर उसकी हाइप को देख मेकर्स ने सीक्वल को दक्षिण भारत की अन्य भाषाओं में भी डब करवा दिया है. हालांकि 18 मार्च को पेड प्रीमियर से कुछ घंटे पहले पता चला कि मूवी का नॉन-हिंदी कॉन्टेन्ट डिलीवर ही नहीं हो पाया है. इससे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और केरल में एक के बाद एक शोज़ कैंसिल होने लगे. रिप्लेसमेंट के तौर पर सिनेमाघर मालिकों ने फिल्म का हिंदी वर्जन चलाने का प्रस्ताव रखा है. जो लोग फिल्म को हिंदी में नहीं देखना चाहते, उनके लिए रीफंड का प्रोसेस भी शुरू कर दिया गया है.

कॉन्टेंट डिलीवरी की ये समस्या हिंदी वर्जन में भी देखने को मिली है. वहां भी मूवी प्रीमियर से एकाध घंटे पहले ही सिनेमाघरों तक पहुंच पाई है. खबर लिखे जाने तक हिंदी वर्जन के सबटाइटल डिलीवर नहीं हो पाए हैं. अब इस पूरी खिचड़ी के पीछे असली वजह सामने आ गई है. इंडिया टुडे के मुताबिक, जब मेकर्स ने सिनेमाघरों को फिल्म का हिंदी वर्जन भेजा था, तबतक तमिल और तेलुगु वर्जन की डबिंग तक पूरी नहीं हुई थी. पोस्ट-प्रोडक्शन की इस देरी से फिल्म अब कई नॉन-हिंदी रीजन्स में प्रीमियर नहीं हो पाएगी. रिपोर्ट है कि इससे मेकर्स को करीब 2 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. हालांकि फिल्म की एडवांस बुकिंग को देखने पर ये आंकड़ा छोटा नज़र आता है.

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शायद आपके मन में ये सवाल उठे कि आखिर फिल्में डायरेक्टर्स के पास से सिनेमाघरों तक कैसे पहुंचती हैं. तो हम इस पूरे प्रोसेस को अगले एक मिनट में समझाते हैं. दरअसल, भारत में फिल्मों को थिएटर तक डिलीवर करने के दो आसान तरीके होते हैं. एक- फिजिकल तरीका और दूसरा, डिजिटल. फिजिकल डिलीवरी में मूवी को एक खास हार्ड ड्राइव में डालकर भेजा जाता है. CRU कहलाने वाला ये ड्राइव काफी मजबूत होता है और आसानी से खराब नहीं होता. कॉन्टेंट डिलीवर करने के लिए मेकर्स FedEx और UPS जैसी कूरियर सर्विस का इस्तेमाल करते हैं. थिएटर पहुंचने के बाद मैनेजर उस ड्राइव को सिस्टम में लगाता है और फिल्म को अपने सर्वर में कॉपी कर लेता है. फिर उसी सर्वर से मूवी सीधे बड़े पर्दे पर दिखाई जाती है.

डिजिटल डिलीवरी में फिल्म को कहीं कूरियर करने की जरूरत नहीं होती. इसे सीधे सैटेलाइट या तेज इंटरनेट के जरिए थिएटर के सिस्टम में भेज दिया जाता है. यानी जैसे हम ऑनलाइन कोई बड़ी फाइल डाउनलोड करते हैं, थिएटर वाले भी उसी तरह मूवी डाउनलोड कर उसे पर्दे पर चला देते हैं. लेकिन ये प्रोसेस इतना भी आसान नहीं है. फिल्मों की बड़ी फाइल्स को डाउनलोड करने में कई घंटों से लेकर कुछ दिनों तक का समय भी लग सकता है. ऐसे में थिएटर्स में तेज इंटरनेट का होना बेहद जरूरी है. हालांकि 'धुरंधर 2' के केस में जो खिचड़ी हुई है, उसे देखकर कहा जा सकता है कि जियो स्टूडियोज़ ने इस मूवी की फिजिकल डिलीवरी ही की है.

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