किसी दिन सरकार को धर लीजिए. कहिए मुसलमानों को गरीबी से निकालने के लिए कुछ करती काहे नहीं? अब बॉस ये ना कहना कि मुसलमान गरीब नहीं हैं. आदमी 'कुछ होते हैं/ कुछ नहीं होते' में खर्च हो लेता है. सीरियसली सोचने की जरूरत है. उनके रोजगार के लिए कुछ कीजिए. और कुछ नहीं तो सरकार पर यही दबाव बनाइए कि जैसे एक वर्ग के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की खास तैयारी होती है कुछ जगह, वैसे ही मुसलमानों के लिए भी हो. यहां आप चाहे तो 'सिर्फ मुसलमानों' के लिए भी जोड़ सकते हैं. आपकी पॉलिटिक्स भी हो लेगी, भाई लोग का भला भी होगा, बॉस! ट्रिकी होना होगा, कुर्ता पहनकर गले मिलने से काम नहीं चलेगा. सोचिए सरकारी नौकरियों में मुसलमानों का कितना हिस्सा है? बहुत सीक्रेट बात कह रहा हूं. वर्सेज-वर्सेज ही खेलना है न, सामने वाले को जीभ दिखानी है न? अपने पट्ठों को खूब ट्रेंड करके हर जगह घुसा दीजिए, हर नौकरी में जहां भी वो जा सकते हों, पहुंच जाएं पढ़-लिखकर. कंपटीशन में न बहुत मजा आता है.अब ये जबरन नहीं कह रहे हैं, सोचो न, मुसलमानों के इत्ते नेता हुए, कोई सामने से आकर ठंडे तरीके से क्यों नहीं कहता कि साथ में आओ. प्रेम से बतियाएं, आज के लड़कों से पूछें, उनको क्या चाहिए. इतना खदबदाते काहे हो भाई लोग? इत्ती बेचैनी काहे की? कौन सी जोंक चिपका रखी है. ठंडा पानी पिया करो. नेता हो न? तो पटती क्यों नहीं हिंदुओं से? इधर वाले खराब हों तो आप ही शुरू कर दो. मने एक सड़ी सी बात बता दो, कोई एक नेता ये कहता क्यों नहीं नजर आता कि आओ हम लोग हाथ पकड़ कर रोजगार के लिए कुछ करें. 2011 में बता दिया गया था, 33% मुसलमानों के पास बस रोजगार है. बाकी 67% की कौन सोचेगा मोहन भागवत? नहीं आप तो मुसलमानों के नेता हैं. फिर साध्वी प्राची तो नहीं सोचेंगी उनके बारे में. वक़्त है कि मुसलमानों के एम्पॉवरमेंट के लिए कुछ करें. जो करते भी हैं मीठा- मीठा बोलते हैं, एकता की बात करते हैं. फर्जी-फर्जी सा लगता है. आप खुलकर आते हैं, चेहरा बनकर! लो देखो ये आदमी है मुसलमानों का मसीहा टाइप्स! क्या है न कि जब तक हिंदू-मुस्लिम को एक करने की बात होगी, इस मुल्क में माथाफोड़ी होगी. जब तक स्कूटर पर कृष्ण बने लड़के को ले जाती बुरके वाली औरत की फोटो पर Wow वाले कमेंट आएंगे. कैसेट उलझी रहेगी. उसका इलाज़ है, हमसे सुन लो, हिंदू-मुसलमान कभी एक नहीं हो सकते. न उनको होना चाहिए. हिंदू-हिंदू रहें, मुसलमान-मुसलमान रहें, वैसे ही अच्छे लगते हैं. बस खुश रहें, अपनी- अपनी पहचान में. आपके पापा 6 बार सांसद रहे, भाई विधायक हैं. आप भी सांसद हैं. फैमिली बिलकुल वैसी ही है, जैसी मुलायम सिंह यादव या बाल ठाकरे की हुआ करती है. सारे लोग एक ही व्यवसाय में नाम कमा रहे हैं. आप तो संविधान की बात करते हैं, उसकी शपथ भी लेते होंगे चुनाव जीतने के बाद. उसी संविधान से आपको हक मिला है कि आप क्या बोलने या नहीं बोलने के लिए आज़ाद हैं. आप अंग्रेजी भी बोलते हैं खटाखट. पर आपके ही कुछ भाई और भी हैं. जो नहीं बोल पाते. फिर कहते काहे नहीं कि मदरसों में अंग्रेजी पढ़ाई जाए, तमाम वो मदरसे जहां अंग्रेजी न पढ़ाई जाए, नए तरीके की शिक्षा न दी जाए जो बालकों को बाहर की दुनिया में टिकने के काबिल बनाए, उसे न ग्रांट मिले न मान्यता. कहते काहे नहीं हो? एक भी बार नहीं सुना हमने!
दिक्कत आपके साथ है, आप बोलते तब हैं जब हज की सब्सिडी की बात आए. मदरसों की ग्रांट की बात आए. कुछ करना हो तो टोपी पहन के खजूर खिलाने का काम अच्छा कर लेते हो आप. किसी ने मुसलमानों के खिलाफ कुछ कहा हो और आपको काउंटर करना हो. सामने से आया पलटाना ही है तो ये काम कैरम बोर्ड की किनारी ही अच्छी कर लेती है. आप क्या कर रहे हो? 'भाई इग्नोर मार' नहीं कहता कोई? औंगे-पौंगे हर बयान पर कोई बाइट लेने को मरा जा रहा रिपोर्टर आपके मुंह में माइक दे देता है, और आप भक्क से वही बोल देते हो जो वो कहलवाना चाहता है. इससे ज्यादा सब्र तो हाईस्कूल में प्रपोज करने के पहले लड़के कर लेते हैं. टेपरिकॉर्डर नहीं हैं आप.'लिविंग रियलिटी ऑफ मुस्लिम इन वेस्ट बंगाल' वाली रिपोर्ट में पता क्या कहा गया था. पश्चिम बंगाल के मुसलमान सबसे गरीब हैं. यू ट्यूब, वेबसाइट है अच्छी सी. लगभग सारे वीडियो मिल जाते हैं वहां, आपका वो वाला कोई वीडियो नहीं मिला जिसमें आप वेस्ट बंगाल के मुसलमानों की बेहतरी के धांसू-धांसू आईडिया बता रहे थे. वहां 80% परिवार 5000 और लगभग 35% मुसलमान 2500 रुपए से कम कमाते हैं महीने का. उन पर मुंह क्यों नहीं खोलते भाई? वो मुसलमान नहीं हैं या उनकी आपको फ़िक्र नहीं?
यहां 22% से ज्यादा मुसलमान कभी स्कूल नहीं गए. और आप बतिया रहे हैं कि भारत माता की जय नहीं बोलेंगे. हू केयर्स ब्रो? नीति आयोग वाले कहते हैं, गरीबी रेखा से नीचे 25% मुसलमान हैं. माने हर चौथा मुसलमान गरीब है, और आप मुसलमानों के नेता. आप कहते हैं भारत माता की जय नहीं बोलेंगे लोल. करनी ही है तो बुनकरों की बात कीजिए, जुलाहों की कीजिए. महिलाओं की कीजिए. आपको पता है हजार मुसलमानों में 951 औरतें हुआ करती हैं, जबकि हिन्दुओं में ये आंकड़ा कम है उनमें हजार के पीछे 939 औरते ही हैं. पहली जंग आप जीत गए. महिला सशक्तिकरण की. औरतें ज्यादा हैं तो सुधार भी जल्दी होगा.अब आगे बढ़िए. अच्छी हेल्थ फैसिलिटीज के लिए आवाज उठाइए. मुस्लिम बहुल इलाकों में पोलियो को लेकर अंधविश्वासी लोग रहते हैं. पोलियो तक नहीं पिलाते थे. बच्चों को ये सोचकर कि गलत असर हो जाएगा. कम से कम इसी पर बोल दीजिए. और पांच बच्चे- दस बच्चे वाले टंटों में मत पड़िए. पोतड़े आपको बदलने नहीं होते, न वो भगवा वालों को. टंटों में पड़ना ही है तो परिवार नियोजन को लेकर बातें करिए. मैं तो चाहूंगा, किसी दिन न्यूज पर 'ओवैसी का विवादित बयान' की बजाय कॉपर-टी, कंडोम और नसबंदी की बात करते ओवैसी फ्लैश हों. अहो! क्या नजारा होगा. आत्मा जुड़ा जाएगी. उन तमाम मुसलमानों का सपना सच करने की तरफ ये ओवैसी का कदम होगा, जो चाहते हैं उनके भी दो बच्चे धारी वाली टाई पहनकर 'बाय-बाय अब्बा, बाय-बाय अम्मी' करते स्कूल वाली पीली बस में बैठें. फिर खाक किसी को फर्क पड़ता है, आप किसी की जय कहें कि न कहें.
आपका, 'ओवैसी का विवादित बयान' वाली हेडिंग से चट चुका आशीष प्रदीप














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