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एक्स-मेन: एपोकैलिप्स, तुम्हारे रंग-ढंग पुराने हैं

एक्स-मेन सीरीज की सबसे हौव्वे वाली पिच्चर आ गई है, स्पॉइलर समेत रिव्यू इधर है.

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हमारे घरों में एक पिंटू भैया होते थे. वो सब कर सकते थे. एंटीना सुधार सकते थे, सीधी बाउंड्री पर चढ़ जाते, हाथ छोड़कर साइकल चला लेते. घर पर कोई काम हो उन्ही को याद किया जाता. फिर वो आटा पिसाना हो या फूफा को स्टेशन से लाना. उनकी सबसे पटती थी. उनसे सब डरते थे. बड़ों को वो संस्कारी नजर आते, अपनी उम्र वालों को सबसे नए नॉनवेज सुनाते. पिंटू भैया भरोसा थे. वोल्वरिन है न, उसको देखकर पिंटू भैया याद आ जाते हैं.
ब्रायन सिंगर चाहे जितना कह लें कि एक्स-मेन माने वोल्वरिन नहीं होता, मानने का जी नहीं करता. और यहां हम लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं. बताने से रोक नहीं पा रहे कि एक्स- मेन एपोकैलिप्स में वोल्वरिन है. खुश हो चुके हों तो आगे पढ़िए, सिर्फ डेढ़-दो मिनट को हैं.

फिल्म में क्या है? दुनिया में कहीं कुछ बुरा हो रहा हो तो उसमें एक नाम जरुर आता है. मैग्नेटो. वजह भी होती है. उसके साथ पहले ही इससे भी ज्यादा बुरा हो रखा होता है. एरिक अच्छा-भला अपने परिवार के साथ रह रहा होता है पोलैंड में. मार्वल्स वालों के अपने पैंतरे हैं. किसी को सुधरा हुआ दिखाना हो तो मजदूर दिखा देते हैं. एरिक भला आदमी है, पर मुसीबतें  यहां भी आ जाती हैं. फिर बुरा आदमी हो जाता है. मैग्नेटो बन जाता है.
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माइकल फैसबेंडर मैग्नेटो के रोल में धंस चुके हैं. रात के सवा तीन बजे भी आप उन्हें जगा कर कह दें कि ऑव्शव्हिट्स में उसकी अम्मा को मार दिया गया था. वो वही गुस्सा दिखा सकते हैं जो एपोकैलिप्स में दिखता है.

एपोकैलिप्स कौन है? ट्रेलर देख-देख ये भान तो हो चुका है कि एपोकैलिप्स पिछले समय से आया कोई बड़का विलेन है. सही समझे हैं, वो पहला म्यूटेंट है, उसका जिक्र बाइबल में भी है. पर एपोकैलिप्स चाहता क्या है? समझिए कि वो ऐसी पैरलल पॉवर है, जो न सिर्फ आपके बने-बनाए सिस्टम को नकारती है, बल्कि तबाह भी करना चाहती. एपोकैपिल्स का उद्देश्य कोई सरकार पलटना या किसी को सबक सिखाना नहीं है. वो सच में सब उलट देना चाहता है. आप सारा वक़्त उम्मीद करते हैं कि एपोकैलिप्स कुछ बड़ा करेगा. उसके पास ताकत है. वो कुछ भी कर सकता है. पर वो छुट्टा सांड सा घूमता है. उसे अपने काम निकालने के लिए बाकी के म्यूटेंट चाहिए. जब सब दूसरे से ही कराना है तो विलेन क्यों बने? अपने चार हॉर्समैन की बैट्री चार्ज करने को.

एपोकैलिप्स वो विलेन है जो बकैती में खर्च ज्यादा हो गया. ऑस्कर आइजैक की आवाज गूंजती है. फिलिम वालों को लगा होगा ये बड़ा एपिक सा फील देगा पर ये सब दस साल पहले ही सुहाता था.

83 में कहां थे? सन 1983 है. ये बात लिखते ही कई चीजें समझनी होंगी. प्रोफेसर जेवियर अब तक व्हीलचेयर पर आ चुके हैं. जीन ग्रे अभी जवान हैं. साईक्लॉप्स भी. और जाहिर है बाकी बच्चे भी. यहीं आपको जीन और साइक्लोप्स की केमिस्ट्री भी नजर आती है.  फाम्क जैनसन को जीन ग्रे की तरह देखने के बाद सोफी टर्नर को जीन ग्रे के तौर पर देखना पचता नहीं. सोफी को हम गेम ऑफ थ्रोंस में देख रहे हैं. और जैसा डर था परदे पर उन्हें देखते ही मेरे पीछे वाली सीट से आवाज आई ये तो सांसा स्टार्क है. पर सोफी ने अपना रोल पूरे कांफिडेंस से किया है. और फिल्म खत्म होते-होते आप उनके फैन हो जाते हैं. जेनिफर लॉरेंस से हमें खास किस्म का इश्क न होता तो हम कह देते जीन ग्रे ने मिस्टीक को ओवरटेक कर लिया है. एक बात हम फिर कहेंगे फर्स्ट हाफ के बाद  एक्स मेन: एपोकैलिप्स एक मिस्टीक प्रधान फिल्म है
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एक टुकडा है, जिसमें क्विक सिल्वर तबाह होते स्कूल में एंट्री करता है और स्लो मोशन में कईयों की जान बचाता है. ये सीन डेज ऑफ फ्यूचर पास्ट के पेंटागन किचन सीन की याद दिलाता है. वो सीन भयंकर फेमस हुआ था और जाहिर है उसे भुनाने की कोशिश हुई थी. आपके टिकट का 10% इस एक सीन में वसूल हो जाएगा.

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खटकता क्या है? फिल्म का अंत आपको गार्जियंस ऑफ द गैलेक्सी जैसा लगेगा. ये मार्वल के नाम का असर है क्या?  
पिछली फिल्मों के रिफरेन्स बहुत हैं, और ये बात एक्स-मेन की हर फिल्म में खटकती है. हम मानते हैं कि सीरीज वाली फिल्मों में ऐसा होता है, पर एक्स-मेन में जान-बूझकर करते हैं ये लोग ऐसा. आपने पिछली फिल्में न देखीं तो लगेगा बहुत कुछ छूट रहा है. 
सबसे बड़ी कमी ये लगती है कि आप जेवियर और एपोकैलिप्स की सीधी टक्कर देखना चाहते हैं. और वो टलती-टलती-टलती रहती है. एपोकैलिप्स का बहुत हौव्वा है.जेवियर सीधे उससे लड़ते तो हम ब्रायन सिंगर की उस बात का भरोसा कर पाते कि एक्स-मेन के माने बाकी लोग भी होते हैं.  
मैग्नेटो के ह्रदय परिवर्तन वाले सीन अब बहुत हो गए, इनको ये काहे समझ नहीं आता? 
वोल्वरिन नहीं है, दो मिनट को है बस :(

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