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फिल्म रिव्यू: 83

'83' जीते जी अमर हुए लोगों की कहानी है. वो नींव के पत्थर, जिनकी वजह से आज भारतीय क्रिकेट की इमारत इतनी बुलंद है.

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'83' फिल्म रिव्यू.
अगर ये कोई बचपन में दादी/नानी द्वारा सुनाई जाने वाली प्रेरक कहानी होती, तो इसकी शक्ल कुछ ऐसे होती.
"किसी ज़माने की बात है. 15 लोगों का एक समूह दूर विदेश की धरती पर गया. इनमें 14 खिलाड़ी थे और एक उनका मैनेजर. इनका मकसद था एक ऐसे खेल की सबसे बड़ी ट्रॉफी जीतना, जिसमें उनकी टीम को कोई सीरियसली नहीं लेता था. न उनके अपने देश वाले, न उनको भेजने वाली संस्था, न देश-विदेश के पत्रकार और खेल विशेषज्ञ, न कोई और. यहां तक कि उस टीम के कई खिलाड़ी खुद को भी सीरियसली नहीं लेते थे. लेकिन टीम का मुखिया अड़ियल था. उसे एक काम सौंपा गया था और उसका मज़बूत इरादा था कि वो अपनी ज़िम्मेदारी को कामयाबी में बदलकर लौटेगा. ये 14-15 लोग तमाम बाधाओं से लड़ते-भिड़ते आगे बढ़ते रहे और इतिहास बनाकर ही लौटे. आज हमारा देश उस खेल का सिरमौर है."
दंतकथाओं जैसी अविश्वसनीय किंतु अद्भुत घटना थी इंडियन क्रिकेट टीम का 1983 वर्ल्ड कप जीतना. ज़ाहिर है जब इस कहानी पर फिल्म बनी, तो उम्मीदों का आसमान छूना लाज़मी था. क्या कबीर खान की '83' उन उम्मीदों को पूरा कर पाती है? आइए जानते हैं.
सबसे पहले तो ये बता दें कि हमने किसी इललीगल लिंक से फिल्म नहीं देखी है, बाकायदा मीडिया वालों के लिए आयोजित प्रेस शो देखा है. तो 'रिलीज़ से पहले कैसे देख ली', 'टेलीग्राम पर आ गई क्या' जैसे सवालों पर ब्रेक लगाइयेगा. इस डिस्क्लेमर के साथ फिल्म पर बात शुरू करते हैं. # फिल्म नहीं 'टाइम मशीन' है '83' ऐसी फिल्म है, जिसकी कहानी के बारे में हम चाहकर भी कोई स्पॉइलर नहीं दे पाएंगे. पूरी कहानी हम सबको पता है. लेकिन जो पता है उसे परदे पर पेश कैसे किया गया है, ये बात अहम है. और इस फ्रंट पर '83' सेंचुरी लगाती है. '83' का वर्ल्डकप हमारी यादों का हिस्सा है. हममें से ज़्यादातर लोगों ने ये वर्ल्ड कप देखा नहीं है. हमने उसके बारे में या तो आर्टिकल्स पढ़े हैं, या तस्वीरें देखी हैं या फिर यूट्यूब पर उपलब्ध वीडियो फुटेज को देखा है. लेकिन इन सब तरीकों से हमने सिर्फ जानकारी हासिल की. एक हिस्टॉरिकल इवेंट के बारे में अवेयर हुए. लेकिन उन पलों को जीना कैसा रहा होगा, ये हमको नहीं पता. कबीर खान की '83' हमें टाइम ट्रेवल करवाकर उस दौर में ले जाती है और पौने तीन घंटे आप वो पूरा टूर्नामेंट जीते हैं. ये इस फिल्म का सबसे बड़ा अचीवमेंट है.
ये तस्वीर हर इंडियन क्रिकेट फैन के जीवन का हिस्सा है.
ये तस्वीर हर इंडियन क्रिकेट फैन के जीवन का हिस्सा है.

'83' ऐज़ अ फिल्म अच्छी है या बुरी, ये बाद की बात है. इन सबसे बढ़कर '83' एक ज़रूरी फिल्म है. हमने अब तक सिर्फ सुना या पढ़ा ही था कि 1983 में टीम इंडिया एक अंडरडॉग थी, उसमें किसी को भरोसा नहीं था, वगैरह. लेकिन उनके संघर्ष की इंटेंसिटी क्या थी, ये हम इस फिल्म को देखकर महसूस कर पाएंगे. नई पीढ़ी को भारत के वन ऑफ दी बिगेस्ट स्पोर्टिंग इवेंट से यूँ पर्सनल तरीके से कनेक्ट करना, इस फिल्म का सबसे बड़ा हासिल साबित होगा. # संवाद: चुटीले भी, दमदार भी '83' एक और उजला पक्ष इसकी राइटिंग है. सुमित अरोड़ा और कबीर खान के लिखे डायलॉग्स आपको भावुक भी करेंगे और सीटी मारने पर भी मजबूर करेंगे. कई उदाहरण हैं, जैसे टीम इंडिया के दौरे पर निकलने से पहले कोच से मज़ाक उड़ाते लहजे में पूछा जाता है, 'इस बार तो ईस्ट अफ्रीका भी नहीं है, हराओगे किसको?'. 83 से पहले हुए दो वर्ल्ड कप्स में इंडिया ने सिर्फ एक मैच जीता था. वो भी ईस्ट अफ्रीका नाम की कमज़ोर टीम के खिलाफ. जिस नाम के किसी देश का अस्तित्व ही नहीं है. इस तथ्य की रोशनी में वो सवाल कोच के साथ-साथ दर्शकों को भी चुभता है. स्मार्ट राइटिंग का एक और उदाहरण तब दिखता है, जब इंडियन टीम का एक मेंबर वेस्ट इंडीज़ के फास्ट बोलर जोएल गार्नर का डिस्क्रिप्शन देता है. वो कहता है, 'पौने साथ फुट की तो उसकी हाइट ही है. हाथ ढाई-तीन फुट और ऊपर जाता है. उसपर दो-तीन फुट उछलकर बॉल फेंकता है. 12 फुट की उंचाई से जब बॉल आती है, तो उसका पैनिक ही अलग होता है". आप राइटर के इस नज़रिए से वेस्ट इंडीज़ के बोलिंग अटैक को परखते हैं और आपको एहसास होता है कि उनसे भिड़ना कितना बड़ा टास्क रहा होगा.
इसी तरह एक और सीन में प्रेस की अपमानजनक बातों से परेशान टीम इंडिया चाहती है कि उनका कप्तान इसका जवाब दे. कप्तान इस मांग के जवाब में जो कहता है, वो सीन कमाल बन पड़ा है. अच्छी राइटिंग का एक और उदाहरण है वो सीन.
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वो अपने, जो मज़ाक उड़ाते हैं.
# प्लेइंग इलेवन कमाल है फिल्म की स्टारकास्ट को मेंशन किए बिना आगे बढ़ना नाइंसाफी होगी. ये साफ़ महसूस होता है कि हर एक एक्टर केयरफुली कास्ट किया गया है. रणवीर, ताहिर राज भसीन, जीवा, साकिब सलीम, जतिन सरना, चिराग पाटिल, हार्डी संधू, एमी विर्क, निशांत दहिया, आदिनाथ कोठारे, साहिल खट्टर, धैर्य करवा, दिनकर शर्मा... ये सब अपने-अपने किरदारों में घुस गए हैं. इस हद तक कि आपको पूरा समय स्क्रीन पर क्रिकेटर्स ही दिखेंगे, एक्टर नहीं. रणवीर सिंह ने तो करिश्मा ही कर दिया है. वो सिर्फ और सिर्फ कपिल लगे हैं. कपिल का एग्रेशन उन्होंने अपने अंदर जैसे जज़्ब कर लिया है. जब वो बोलते हैं तो ये एग्रेशन दिखता है, जब वो नहीं बोलते तब उनकी आंखों में इसे साफ़ महसूस कर सकते हैं. कपिल का जज़्बा, कपिल की आग रणवीर की आंखों में साफ़-साफ़ रिफ्लेक्ट होती है. ये रोल रणवीर के करियर का बेस्ट न भी माना जाए, तो भी टॉप-थ्री में तो आएगा ही.
पंकज त्रिपाठी ने अपना रोल ईमानदारी से किया है. एक लम्बे अरसे बाद स्क्रीन पर पंकज त्रिपाठी का निभाया किरदार दिखा है, पंकज त्रिपाठी स्वयं नहीं. समझदार लोग इस फर्क को समझ जाएंगे. दीपिका के करने के लिए कुछ ख़ास था नहीं. वो बस हैं.
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ये रणवीर सिंह हैं ही नहीं, कपिल देव हैं.

फिल्म के कुछेक सीन्स तो बेहद शानदार बन पड़े हैं. जैसे कपिल की टीम बस में कॉमेडी स्पीच. या फिर वो सीन, जब श्रीकांत एक पार्टी में विदेशी पत्रकार को जवाब देते हुए एक कहानी सुनाते हैं. या फिर वो सीन जब कपिल बड़ा कारनामा करते हैं और उन्हें खुद पता नहीं होता. वो अम्पायर से जाकर पूछते हैं और अम्पायर एक लाइन का पावरफुल जवाब देते हैं. जवाब क्या था ये नहीं बताऊंगा. परदे पर फील कीजियेगा उसे. इस फिल्म में गला भर देने वाले मोमेंट्स की भरमार है. कई बार आपकी आंखें छलकने की कगार तक पहुंच जाएंगी, इस बात की गैरंटी है. # मैन ऑफ दी मैच रणवीर, मैन ऑफ़ दी सीरीज़ कबीर ख़ान इस फिल्म के कैप्टन कबीर ख़ान बिलाशक मैन ऑफ़ दी सीरीज़ अवॉर्ड के हकदार हैं. उन्होंने एक सुनी-सुनाई कहानी को अंत तक बिखरने नहीं दिया है. वो दर्शकों को अंत तक बांधे रखने में कामयाब रहे हैं. वो दर्शकों के दिल का करेक्ट वाला तार छूते हैं. मुझे लगता है ये इकलौती बात इस फिल्म की कामयाबी का कारण बनेगी. असीम मिश्रा की सिनेमैटोग्राफी भी काफी उम्दा है. क्रिकेट मैचेस का फिल्मांकन इस ढंग से हुआ है कि मैच नकली नहीं लगते. ऊपर से रियल फुटेज को बड़ी कुशलता से मिक्स किया गया है. उसकी वजह से मैच एकदम से रियल लगने लगते हैं.
ऐसा नहीं है कि फिल्म में कोई कमी न हो. कुछेक चीज़ें हैं जिन्हें कमियों के खाते में गिना जा सकता है. एकाध ग़लत फैक्ट, एकाध जगह अननेसेसरी ड्रामा वगैरह. लेकिन फिल्म का ओवरऑल इम्पैक्ट इतना ज़बरदस्त है कि आप ख़ुशी-ख़ुशी ऐसी बातों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं. जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा था ये फिल्म अच्छी या बुरी होने से ज़्यादा ज़रूरी फिल्म है.
Team
टीम इंडिया.

'83' जीते जी अमर हुए लोगों की कहानी है. वो नींव के पत्थर, जिनकी वजह से आज भारतीय क्रिकेट की इमारत इतनी बुलंद है. उनकी ये इनक्रेडिबल कहानी ज़रूर-ज़रूर देखिए. ये फिल्म बनी ही सिनेमाघरों एक लिए है. OTT रिलीज़ का इंतज़ार मत कीजिए, टेलीग्राम का मोह छोड़ दीजिए, सिर्फ और सिर्फ बड़े परदे पर देखिए. इससे कम ये फिल्म डिज़र्व नहीं करती.

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