स्टीफेंस में एडमिशन हो गया? तैयार रहना, ये 10 लोग मिलेंगे वहां!
वैसे तो सभी स्टीफेंस वाले 'कूल' होते हैं लेकिन कुछ लोग थोड़े ज़्यादा कूल होते हैं.
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फोटो - thelallantop
सेंट स्टीफेंस कॉलेज. अलग 'क्लास', अलग भौकाल. आप एडमीशन लीजिये, पहिले दिन से ही न बदल गए तो कहियेगा. स्टीफेंस में हवा ही ऐसी बहती है. यहां असेम्बली होती है. कैंटीन नहीं कैफ़े होता है. कैंटीन कह दिया तो आपके नाम की डुग्गी पीट दी जाएगी. फैकल्टी और स्टूडेंट जैसा कुछ नहीं होता. सीनियर मेम्बर्स और जूनियर मेम्बर्स होते हैं. यहां के लोग अलग ही टाइप का पानी पीते हैं, खाना खाते हैं. सोते भी अलग ही तरीके से हैं, तभी तो अलग तरीके से जागते हैं. जानते हैं क्यूं और कैसे अलग होते हैं ये स्टीफेंस के 'लोग': 1) कॉलेज टी-शर्ट का केचुल बना लेते हैं ये
स्टीफेंस वाले नहाने के बाद (नहाने की फ्रीक्वेंसी के बारे में कोई बाद में बात करेंगे) जो टी-शर्ट हर दूसरे दिन
पहन लेते हैं, वो स्टीफेंस की कॉलेज टी- शर्ट है. कुछ लोगों ने तो इतनी श्रद्धा से इस टी-शर्ट को बिना नागा हर
रोज़ पहना है कि जब कुछ और पहन के आते हैं तो लगता है केचुल उतार दी है. 2) मॉर्निंग असेंबली में न सोने वाले
स्टीफेंस स्कूल नहीं है भाई! असेंबली होती है फिर भी. और असेंबली में सब सोते हैं या नींद खुल जाए तो फ़ोन
चलाते हैं. लेकिन कुछ मनचले यहां भी सुबह-सुबह आखें फाड़े बैठे रहते हैं, और प्रिंसिपल के सभी जोक्स पर
नियम से हंसते हैं. इतना तो ऑफिस में कोई अपने बॉस के सड़ू जोक्स पर नहीं हंसता है. 3) कूल लोग
वैसे तो सभी स्टीफेंस वाले 'कूल' होते हैं लेकिन कुछ लोग थोड़े ज़्यादा कूल होते हैं. इनसे बात करने के लिए
थोड़ी हिम्मत जुटानी पड़ती है क्योंकि ये बहुत जल्दी-जल्दी बोलते हैं. हां, कभी जो आप इनसे बात करने पहुंच
गए तो आप पायेंगे कि ये कूल लोग अपनी बात को कूल बोलकर ही ख़तम करते हैं. ये थिएटर भी करते हैं
और जयपुर लिटफेस्ट में भी हो आते हैं. कूल बनने में कसर कोई नहीं छोड़ते. 4) सुपर कूल लोग
कूल लोग का तो फिर भी मज़ाक उड़ जाता है. सुपर कूल लोगों का नहीं. सुपर कूल में कई सब-केटेगरी हैं,
लेकिन कुल मिला-जुला कर ये 'स्टीरियोटाइप' तोड़ने में यकीन रखते हैं. फेसबुक का इस्तेमाल दुनिया बदलने के
लिए करते हैं और 'pseudo intellectual' बातों पर साइड स्माइल देते हैं. हालांकि 'pseudo' की परिभाषा ये
ख़ुद तय कर लेते हैं. और ये किसी को 'जज' नहीं करते. 5) कैफ़े में 'रहने' वाले
स्टीफेंस में कैंटीन नहीं 'कैफ़े' है और अगर कहीं आपने गलती से भी कैंटीन बोल दिया, फिर तो 'stephanians'
समझ जाएंगे कि आप बाहर वाले हैं. खैर, कुछ लोग हैं जो दोपहर में बिस्तर से निकलते हैं और कैफ़े आ के
नाश्ता करते हैं. फिर लंच भी करते हैं. फिर डिनर भी करते हैं और तब अगर कभी मन किया तो वहां से हिलते
हैं. 6) सच्चे stephanian
वैसे तो सच्चे stephanian की पहचान है कि जो स्टीफेंस की मेन बिल्डिंग पर बने क्रॉस पर जाने की तमन्ना
रखता हो. लेकिन जा बहुत कम लोग पाते हैं. पॉपुलर स्टीफेन कल्चर के मुताबिक़ किसी की ग्रेजुएशन तभी पूरी
मानी जाती है जब वो उस क्रॉस पर पहुंच जाता है. 7) इमोशनल लोग
बर्थडे तो सबके आते हैं लेकिन इन लोगों के दोस्तों के बर्थडे आते हैं तो ये पटेल चेस्ट जाकर पाऊट वाली, साड़ी
वाली, जीभ बहार निकालने वाली, खाना खाने वाली, हर प्रकार की फोटोज का ग्लॉसी प्रिंट निकलवा लाते हैं.
फिर कार्ड बनाते हैं. ये न भी करें तो यही सारी फोटोज लेकर फेसबुक पर संविधान-लेंथ की महामार्मिक पोस्ट
डालते हैं. एक ही बात हर साल लिखते हैं. लेकिन पोस्ट की पहली लाइन होती है - "नॉट टु साउंड क्लिशे
बट..." 8) +168 वाले
ओणम लंच हो या बंगाली लंच, ये बहुत सज-धज कर आते हैं. जो कि अच्छी बात है. लेकिन अगर ये आपके
फेसबुक फ्रेंड हैं तो सावधान! अगले दिन फेसबुक खोलने पर आपको दिल का दौरा आ सकता है. मतलब आपने
सजने पर मेहनत की थी, आप बढ़िया दिख रहे थे ये हमें 2-3 फोटो से ही समझ आ गया था, लेकिन नहीं, ये
नहीं मानेंगे. एल्बम में दो फोटो के बाद जब +168 शो होता है तो उल्टे पांव लॉग आउट करना पड़ता है. 9) मैजिकल लोग
सेमेस्टर एग्जाम शुरू होते ही आम लोग रीडिंग्स जुटाना शुरू कर देते हैं. Jstor, ज़ेरॉक्स शॉप, लाइब्रेरी, सब
जगह मगजमारी कर आते हैं. लेकिन ये लोग ऐसा कुछ नहीं करते, ये पूरे सेमेस्टर की तरह अंत में भी कूल
बने रहते हैं. क्योंकि इनका सीनियर्स के साथ उठना-बैठना होता है, और इनके मेल बॉक्स में पहले ही पुराने
tutorial नोट्स और रीडिंग मटेरियल पड़े रहते हैं. अक्सर ऐसे काम कड़ी मेहनत के बाद 'मैजिक फोल्डर' बना
कर समाज सेवा में बांट दिए जाते हैं. 10) मीटिंग से फुर्सत मिले तब तो...
ये पढ़ाई करते हैं, लोगों से मिलते हैं, खाना भी खाते हैं, लेकिन बस मीटिंग्स से फुर्सत मिलने पर. ये 20-30
कॉलेज सोसाइटीज़ के मेंबर होते हैं. आधा जीवन प्रमोशन और आधा sponsorship खोजने में गुज़ार देते हैं.
लेकिन इनसे दोस्ती करना बहुत फायदेमंद होता है. रोज ही किसी न किसी सोसाइटी के इवेंट में ये आपके लिए
चाय-पानी का जुगाड़ कर सकते हैं.
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