समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बुधवार को पार्टी का इलेक्शन कैंपेन लॉन्च किया. गाजीपुर से. गाजीपुर मुख्तार अंसारी का किला है. मुख्तार की पार्टी कौमी एकता दल का सपा में मर्जर अक्टूबर के महीने में ही हो गया था. जून में पहली बार मर्जर हुआ था. तब अखिलेश ने बवाल काट दिया था. फिर शिवपाल ने काटा. अंत में मुलायम ने काटा. फिर सब चुप हो गये. अखिलेश रोये. शिवपाल ने धक्का दिया. अमर ने तंज कसा. आजम चुप रहे. मंच से मुलायम ने बोला- पार्टी के कुछ लोग पीछे पड़े थे कि विलय नहीं होना चाहिए. पर मैं शिवपाल का धन्यवाद करता हूं कि पार्टी के साथ विलय हो गया. अब पूर्वांचल में हमारी ताकत बढ़ेगी. लोग देखेंगे. अफजाल अंसारी ने कहा- मैं दावा कर रहा हूं. नरेंद्र मोदी ने भी गाजीपुर में रैली की. पर जो भीड़ नेताजी की रैली में आई है, उसकी चौथाई भीड़ भी मोदी की रैली में नहीं आई थी.अखिलेश यादव गाजीपुर की रैली में नहीं गए. गाजीपुर में चंदौली-सकलडीहा पुल का उद्घाटन होना था. ये पुल अंसारी बंधुओं का ड्रीम प्रोजेक्ट था. पर अखिलेश यहां नहीं गए. उन्होंने लखनऊ से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये उद्घाटन कर दिया. मुलायम ने परिवार की जंग के बाद सबको झटके दिये. कहा जा रहा था कि भाई की कुर्बानियों की बात कर रहे थे पर बेटे के पीछे ही खड़े थे. क्योंकि बेटे की बातें तो सारी मान ही रहे थे. रामगोपाल को वापस लाये. बड़े नेताओं को अखिलेश के नीचे लाये. पर कौमी एकता दल से मर्जर कर अखिलेश को बड़ा झटका दिया. सारे झटकों की शुरूआत भी मुख्तार की पार्टी से हुई थी. पर इतने घमासान के बाद मुख्यमंत्री बेटे की बात को धंसोर कर मुलायम ने कौमी एकता दल से विलय क्यों किया? क्या है ये पार्टी? https://www.youtube.com/watch?v=cAKAceI6R5c
क्या है ये कौमी एकता दल? क्यों शिवपाल इसके सपोर्ट में हैं? क्या सच में सपा को इसकी जरूरत है?
उत्तर प्रदेश की राजनीति है. कुछ अनोखा तो होना चाहिए. कौमी एकता दल मुख्य रूप से गुंडीशियन (गुंडा+पॉलिटिशियन) मुख़्तार अंसारी की पार्टी है. मुख़्तार अंसारी की गाजीपुर में चलती है. तो पार्टी उसी जिले के आस-पास घूम रही है. लोग कहते हैं कि ये कम्युनल पार्टी है. मुसलमानों की. पर बहुत सारे लोगों का कहना है कि ऐसा नहीं है. नाम के अनुरूप ही ये पार्टी हिन्दू-मुसलमान दोनों के लिए है. ऐसा लग भी रहा है. क्योंकि इस पार्टी ने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल यानी बनारस, गाजीपुर, बलिया, मऊ और नजदीकी बिहार के बक्सर जिले में मुसलमानों के अलावा प्रभुत्व वाले हिन्दू समुदाय के लोगों को भी खुद से जोड़ लिया है. ध्यान देने लायक बात ये है कि इस एरिया में अशरफ मुसलमान ना के बराबर हैं. 'अंसारी' बहुल मुसलमान ज्यादा हैं. जो मुस्लिम समाज के निचले तबके से आते हैं. जाहिर है कि इनको एक हीरो की तलाश है.वैसे तो मुख्तार समाज में नासूर है, पर राजनीति में नेल पॉलिश है
मुख़्तार अंसारी वैसे तो गाजीपुर जिले के BJP विधायक कृष्णानंद राय की हत्या में दोषी और सजायाफ्ता है. पर जिले के लोग इस बात को कम्युनल राजनीति से नहीं जोड़ते. ऐसा माना जाता है कि ये 'अंडरवर्ल्ड' की आपसी लड़ाई का नतीजा था, 'क्योंकि गाजीपुर में दंगे नहीं होते'. पर गाजीपुर के नजदीक ही मऊ में 2005 में दंगे हुए थे. वहां पर मुख़्तार का नाम आया था. मीडिया में इसकी एक फोटो भी आई थी. जिसमें ये खुली जीप में बन्दूक लेकर खड़ा था. हालांकि इस बात ने उतना ज्यादा तूल नहीं पकड़ा है, जितना दंगे की बात में तूल होता है. इसके अलावा मुख़्तार अंसारी पर हर तरह के अपराधों का आरोप है. वो जेल में सजा काट रहा है और बाहर पॉलिटिकल काम-काज दोनों भाई अफजाल और सिबगतुल्ला संभालते हैं. 2012 में बनी इस पार्टी के दो ही एमएलए हैं. मुख्तार और सिबगतुल्ला.एक जमाने में मुख़्तार ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया था. पर नेतागिरी में आने के बाद अपना स्टाइल चेंज कर दिया. अब वह 'सामाजिक समरसता' की बात करता है. अफजाल अंसारी सपा से सांसद भी रह चुके हैं गाजीपुर के. कई पार्टियां बदली हैं. दोनों भाई किसी विज़न या किसी विकास के लिए नहीं जाने जाते. प्रतिनिधि हैं बस एक तबके के. क्योंकि कोई और नहीं है. https://www.youtube.com/watch?v=-SNYbzFvWdQ
उत्तर प्रदेश के चुनाव में अब 'मुस्लिम' नेल पॉलिश की जरूरत है
पर अभी उत्तर प्रदेश में राजनीति कुछ अलग ही चल रही है. 2017 में विधानसभा चुनाव हैं. इसके लिए जोर-शोर से तैयारी चल रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यूपी की लगभग 90 फीसदी सीटें जीत ली थीं. तो अब मामला मुश्किल है. बीजेपी चुनाव के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है. इससे बाकी पार्टियां ज्यादा सचेत हैं. पर दादरी और कैराना की घटना और कई जगह दलित समुदाय के साथ मार-पीट ने बीजेपी को पीछे धकेल दिया है. जबकि सपा ने ओबीसी और मुस्लिम वोट से ही अपनी राजनीति की है. लेकिन बसपा से खतरा है क्योंकि उन्होंने 100 से ज्यादा टिकट मुसलमानों को दिए हैं. इसके लिए अंसारी ब्रदर्स की कौमी एकता दल को अपनी तरफ खींचने का प्रयास किया गया.जून में शिवपाल सब कुछ तय कर ही चुके थे पर ऐन मौके पर अखिलेश नाराज हो गए और सब कैंसल करवा दिया. अखिलेश को लग रहा था कि इससे उनकी विकासपरस्त वाली छवि को धक्का लगेगा और बीजेपी को अंसारी बंधुओं के खिलाफ ध्रुवीकरण का मौका मिल जाएगा. जब दोस्ती होते-होते भी न हो पाई तो यह ताकतवर अंसारी बंधुओं के लिए सेल्फ रेस्पेक्ट का मामला हो गया.चोट खाए हुए मुख़्तार और अफजाल ने प्रदेश की सब छोटी मुस्लिम पार्टियों को इकठ्ठा करना शुरू किया. लगभग 15 ऐसी पार्टियां मिल गईं. इस फ्रंट का नाम 'इत्तेहाद फ्रंट' रखा था. ऐसे तो चुनाव में इनका कोई वजूद नहीं है. क्योंकि इनमें से पीस पार्टी को छोड़कर किसी के पास एक विधायक तक नहीं है. पर अगर ये मिल के लड़ें, तो आजमगढ़, बनारस, गाजीपुर, मऊ, बलिया तक के चुनाव समीकरण बिगाड़ सकते हैं. तो मुलायम सिंह यादव इसको छोड़ना नहीं चाहते थे. सितंबर में यादव परिवार के गृहयुद्ध के बाद अखिलेश ने कहा कि जो नेताजी कहेंगे वही मान्य होगा. https://www.youtube.com/watch?v=W7zVHViz_Pg
तजुरबा नहीं सिखाता, आदर्शों पर चलना?
उत्तर प्रदेश में 18 फीसदी मुसलमान हैं. पूर्वांचल के कुछ इलाकों में ये संख्या और ज्यादा है. और इसी एरिया में अंसारी ब्रदर्स अपना खूंटा गाड़ चुके हैं. वहीं दलितों पर अत्याचार के बाद मायावती भी अपना वोट बैंक बढ़ाने में लगी हुई हैं. ऐसे में समाजवादी पार्टी को कौमी एकता दल की बहुत ही जरूरत थी. क्योंकि किसी भी सूरत में वो वोट नहीं कटने देना चाहते हैं. 2012 में 'आपराधिक छवि' के चलते अखिलेश ने मुख़्तार को पार्टी में शामिल नहीं किया था. पर अब जरूरत महसूस हो रही है. वहीं अंसारी ब्रदर्स को पता है कि अगर वोट काटकर वो कुछ विधायक बना भी लेते हैं, तो राज्य की राजनीति में ज्यादा कुछ नहीं कर पाएंगे. अगर सपा के साथ आ जाते हैं, तो मंत्री पद की भी संभावना रहेगी. अखिलेश विकास की छवि के भरोसे चुनाव जीतना चाहते हैं. राजनीति में यह अच्छी-आदर्श बात है. लेकिन उनके पिता मुलायम सिंह यादव को 49 साल का राजनीतिक तजुरबा है. ये तजुरबा बिलाशक उन्हें आदर्शवादी राजनीति से रोकता ही होगा.ये भी पढ़ें:

















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