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दिल्ली में CM फेस न बताना BJP की मजबूरी या रणनीति, या फिर इतिहास ने कदम बढ़ाने से रोका?

Delhi Vidhan Sabha Chunav के लिए BJP ने अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है. आम आदमी पार्टी (AAP) ने कहा है कि BJP संकट में है क्योंकि उनके पास कोई नेता है ही नहीं. इस मसले पर दिल्ली में BJP का चुनावी इतिहास क्या कहता है?

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दिल्ली चुनाव के लिए भाजपा ने CM कैंडिडेट की घोषणा नहीं की है. (तस्वीर: PTI)

दिल्ली के चुनावी मुकाबले में आम आदमी पार्टी (AAP) और भाजपा आमने-सामने है. वहीं कांग्रेस इसको त्रिकोणीय बनाने के प्रयास में है. AAP की ओर से अरविंद केजरीवाल फिर से मख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं. वहीं भाजपा का CM फेस कौन है (BJP CM Candidate)? ये सवाल तो है ही, साथ ही AAP इस मुद्दे को चुनाव में भुनाने का भी प्रयास कर रही है. BJP की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में चुनावी कैंपेन की शुरुआत की. उन्होंने AAP सरकार को "आपदा" कहकर संबोधित किया. इसी के जवाब में AAP ने भाजपा का "दूल्हा" खोज लिया. उन्होंने अपने पलटवार में कहा कि AAP नहीं बल्कि भाजपा आपदा में है क्योंकि उनके पास मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं है.

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AAP ने इसको लेकर एक मजाकिया वीडियो भी जारी किया. 

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राष्ट्रीय सहारा से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार रत्नेश मिश्र इस बारे में कहते हैं,

BJP ने दिल्ली में मदन लाल खुराना के बाद कभी कोई चेहरा बनने ही नहीं दिया. इस बीच एक्सपेरिमेंट जरूर किए. 2008 में जब डॉ हर्षवर्धन दिल्ली भाजपा के प्रमुख थे, तब विजय कुमार मल्होत्रा को CM कैंडिडेट बनाया गया. 2013 में जब विजय गोयल दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष थे तब डॉ हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाया. कभी भाजपा के पास साहिब सिंह वर्मा और केदारनाथ साहनी जैसे बड़े नेता थे लेकिन अभी उनके पास ऐसा कोई नाम नहीं है.

Narendra Modi in Delhi
दिल्ली में एक जनसभा को संबोधित करते PM मोदी. (तस्वीर: PTI, 3 जनवरी 2025)
बिना CM फेस के चुनाव लड़ने से फायदा या नुकसान

दिल्ली में पहली बार भाजपा ने 1993 में सरकार बनाई. मदन लाल खुराना ने पार्टी का नेतृत्व किया. पार्टी को बड़ी जीत मिली लेकिन उस साल भी BJP ने आधिकारिक रूप से अपना CM फेस नहीं बताया था. वो तो उनकी सफल चुनावी नीतियों की खूब तारीफ हुई, इसके कारण पार्टी ने उनको CM बनाया. 

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इसके बाद 1998 में जब विधानसभा चुनाव हुआ तब तक पार्टी में कई बड़े बदलाव हो गए थे. चुनाव से करीब 6 महीने पहले, मदन लाल खुराना और साहिब सिंह की आपसी लड़ाई के कारण सुषमा स्वराज CM बन गई थीं. इस चुनाव में भाजपा ने उनको अपना CM फेस बनाया. कांग्रेस तब शीला दीक्षित के नेतृत्व में आगे बढ़ रही थी. BJP ने स्वराज को दीक्षित की महिला उम्मीदवारी के काट के रूप में देखा. लेकिन सफलता नहीं मिली. भाजपा की बुरी हार हुई.

ये भी पढ़ें: कहानी उस दिल्ली की जहां शीला दीक्षित से पहले भी कांग्रेस की सरकार थी

इसके बाद 2003 और 2008 के चुनाव में दिल्ली की सत्ता कांग्रेस के पास रही. 2003 में भाजपा ने मदन लाल खुराना को और 2008 में विजय कुमार मल्होत्रा को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में पेश किया था. 2013 में दिल्ली की राजनीति में अरविंद केजरीवाल का उदय हो गया था. पार्टी ने डॉ हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाया. BJP दिल्ली में सबसे बड़ी पार्टी बनी लेकिन बहुमत नहीं मिला. जिस कांग्रेस के खिलाफ केजरीवाल चुनाव लड़े, उसी के साथ मिलकर उन्होंने सरकार बना ली, पर बाद में पीछे हट गए. 2015 में फिर से चुनाव हुए.

2015 के चुनाव में भाजपा ने फिर से वही नीति अपनाई. भारत की पहली महिला IPS ऑफिसर किरण बेदी, केजरीवाल के साथ अन्ना आंदोलन में एक्टिव रही थीं. उन्होंने BJP के रास्ते राजनीति में एंट्री ली. भाजपा ने किरण बेदी को अरविंद केजरीवाल का “काट” समझ लिया. और उन्होंने अपना CM फेस बना दिया. जब चुनाव परिणाम आएं तो आंकड़ों में भाजपा बहुत पीछे नजर आई और कांग्रेस तो कहीं थी ही नहीं. 70 में से 67 सीटों पर AAP को और 3 सीटों पर BJP को जीत मिली.

2020 के चुनाव में भाजपा ने मुख्यमंत्री पद के लिए किसी नाम का एलान नहीं किया. हालांकि, मीडिया में मनोज तिवारी की खूब चर्चा हुई. पार्टी ने उनको चुनाव को लीड करने का मौका दिया. राजनीतिक हलकों में चर्चा रही कि अगर दिल्ली में BJP की सरकार बनती है तो तिवारी CM पद के दावेदार हो सकते हैं. हालांकि, आधिकारिक रूप से पार्टी ने उनको कभी CM फेस के रूप में पेश नहीं किया.

चुनावभाजपा CM फेसBJP के परिणाम
1993कोई नहींसरकार बनाई
1998सुषमा स्वराजबुरी हार हुई
2003मदन लाल खुरानासरकार नहीं बनी
2008विजय कुमार मल्होत्रासरकार नहीं बनी
2013डॉ हर्षवर्धनसबसे बड़ी पार्टी बनी लेकिन सरकार नहीं बनी
2015किरण बेदीबहुत बुरी हार हुई
2020कोई नहींबुरी हार हुई
अन्य राज्यों में BJP की क्या नीति रही है?

हाल में राज्यों में हुए सभी चुनावों में भाजपा बिना मुख्यमंत्री उम्मीदवार के ही आगे बढ़ी. दिल्ली के संदर्भ में ये अलग इसलिए है क्योंकि बाकी के राज्यों में पार्टी के पास बड़े नाम थे, इसके बावजूद BJP ने CM कैंडिडेट की घोषणा नहीं की. हालांकि, कश्मीर को इसका अपवाद कह सकते हैं. वहां उनके पास इतना बड़ा कोई नाम नहीं था. दिल्ली में भी वही स्थिति है. 

2023 में राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में चुनाव हुए. राजस्थान में पार्टी के पास वसुंधरा राजे और गजेंद्र सिंह शेखावत जैसे नाम थे. छत्तीसगढ़ में रमन सिंह और ओपी चौधरी जैसे नेता थे. वहीं मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान थे. बिना CM फेस की घोषणा के इन तीनों राज्यों में भाजपा की सरकार बनी. रत्नेश मिश्र इस पर कहते हैं,

इन राज्यों में मोहन यादव और भजनलाल शर्मा जैसे आम कार्यकर्ताओं को मुख्यमंत्री बनाया गया. ये सब पार्टी के आम कार्यकर्ता थे. यहां चुनाव में भी मोदी फैक्टर ने ही काम किया था. इस मामले में BJP, इन राज्यों में भी एक्सपेरिमेंट ही कर रही थी.

2024 में झारखंड, हरियाणा और महाराष्ट्र में भी विधानसभा के चुनाव हुए. झारखंड में बाबूलाल मरांडी और महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस जैसे नेताओं का विकल्प होने के बावजूद पार्टी ने उन्हें CM कैंडिडेट नहीं बनाया. इसके बाद महाराष्ट्र में तो भाजपा की जीत हो गई, लेकिन झारखंड में पार्टी की हार हुई. 

हरियाणा में भी भाजपा ने चुनाव से पहले आधिकारिक तौर पर मुख्यमंत्री उम्मीदवार के नाम का एलान नहीं किया था, हालांकि नायब सिंह सैनी चुनाव कैंपेन को लीड कर रहे थे. आधिकारिक तौर पर एलान न होने के चलते पार्टी के कई नेता चुनाव के दौरान अपनी दावेदारी पेश करते रहे. जानकार बताते हैं कि पार्टी ने इसको एक स्ट्रेटजी की तरह इस्तेमाल किया. दावेदारों को और उनके समर्थकों को एक तरह से उलझन में रखा कि अगर उन्होंने कुछ कमाल के परिणाम दिए तो इस रेस में उनके नंबर बढ़ सकते हैं. इसमें अनिल विज और राव इंद्रजीत जैसे नाम शामिल थे.

दिल्ली में कब है चुनाव?

5 फरवरी को दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग होनी है. 8 फरवरी को नतीजे घोषित किए जाएंगे. AAP ने सभी 70 सीटों के लिए उम्मीदवारों का एलान कर दिया है. वहीं कांग्रेस ने 21 और भाजपा ने 29 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं.

वीडियो: दिल्ली चुनाव: AAP और भाजपा में पोस्टर वॉर, चुनावी हिंदू और चुनावी मुस्लिम कहा

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