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आज फिर रिकॉर्ड स्तर पर गिरा रुपया, जानें डॉलर के मुकाबले अब कहां है

हफ्तेभर में रुपया 1.18% फिसला है. महीनेभर में डॉलर के बरक्स रुपये में 2.3% की गिरावट दर्ज की गई है. इस सप्ताह रुपये का कमजोर प्रदर्शन इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि एशिया की ज्यादातर मुद्राएं अमेरिकी डॉलर इंडेक्स में कमजोरी के बावजूद हल्की मजबूती दर्ज करने में सफल रहीं.

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महीनेभर में डॉलर के बरक्स रुपये में 2.3% की गिरावट दर्ज की गई है (फोटो क्रेडिट: Business Today)

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 23 जनवरी को अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. पिछले 6 महीने में रुपये में आई यह सबसे तेज साप्ताहिक गिरावट है. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक शुक्रवार को रुपया 92 के स्तर के बेहद करीब पहुंच गया. बाद में यह 91.96 के ऑल टाइम लो तक फिसल गया. हालांकि, कारोबार के आखिर में यह 91.94 पर बंद हुआ. इस तरह पर्सेंट के हिसाब से रुपया 23 जनवरी, 2026 को 0.34% गिरकर बंद हुआ.

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वहीं हफ्तेभर में रुपया 1.18% फिसला है. महीनेभर में डॉलर के बरक्स रुपये में 2.3% की गिरावट दर्ज की गई है. इस सप्ताह रुपये का कमजोर प्रदर्शन इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि एशिया की ज्यादातर मुद्राएं अमेरिकी डॉलर इंडेक्स में कमजोरी के बावजूद हल्की मजबूती दर्ज करने में सफल रहीं.

मेकेलाई फाइनेंशियल सर्विसेज (Mecklai Financial Services) के वाइस प्रेसीडेंट कुनाल कुरानी ने रॉयटर्स से कहा, “यह काफी हद तक वैसा ही है जैसा हमने 2025 के अधिकांश हिस्से में देखा. वैश्विक संकेत चाहे जैसे भी हों, रुपया लगातार दबाव में रहता है.”

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रिकॉर्ड निचले स्तर तक क्यों लुढ़का रुपया?

विदेशी संस्थागत निवेशकों की तरफ से भारतीय शेयर बाजारों से लगातार पैसे निकालने से रुपया लगातार दबाव में दिख रहा है. इसके अलावा भारत के आयातकों की तरफ से डॉलर की मांग में तेजी से रुपया बुरी तरह टूटा है. पिछले काफी समय से विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपनी हिस्सेदारी घटाते रहे. जनवरी की शुरुआत से अब तक भारतीय शेयरों से विदेशी निवेशकों ने करीब 3.5 अरब डॉलर कीमत के शेयर बेचे हैं. भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब 32 हजार करोड़ रुपये बैठती है. 

वहीं, आयातकों और कॉरपोरेट कंपनियों ने आगे और गिरावट की चिंता में हेजिंग बढ़ाई है. यहां हेजिंग बढ़ाने का मतलब है कि आयातक और कंपनियां मानकर चल रही हैं कि आने वाले दिनों में रुपया और कमजोर हो सकता है. इसलिए वे पहले से ही डॉलर खरीदने या उसकी कीमत लॉक करने लगे हैं ताकि भविष्य में डॉलर महंगा होने पर उन्हें ज्यादा नुकसान न उठाना पड़े. इसके अलावा निर्यातकों ने फॉरवर्ड मार्केट में डॉलर की बिक्री धीमी कर दी. इन वजहों से डॉलर की सप्लाई घटी और रुपये पर दबाव और बढ़ गया. फॉरवर्ड मार्केट में भविष्य की किसी तारीख के लिए आज ही कीमत तय कर ली जाती है. 

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