देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) में कर्मचारियों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है. इंडिया टुडे की रिपोर्ट एक खबर में बताया गया है कि पिछले 6 महीने में TCS ने करीब 30 हजार कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है. आगे भी छंटनी का संकेत दिया है.
TCS में 30000 कर्मचारियों की छंटनी IT सेक्टर के असली संकट का सिर्फ 'ट्रेलर' तो नहीं?
टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में कर्मचारियों की संख्या घटने के पीछे घरेलू और विदेशी कारण हैं. यह कटौती अस्थायी और स्थायी दोनों तरह के बदलावों का नतीजा है.
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रिपोर्ट बताती है कि चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही (1 अक्टूबर से 31 दिसंबर 2025) के बीच TCS में 11,151 कर्मचारी कम हो गए. इससे पहले यानी सितंबर तिमाही (एक जुलाई से 30 सितंबर के बीच) में कंपनी ने 19,755 कर्मचारियों की छंटनी की थी.
कंपनी की तरफ से जारी बयान के मुताबिक पिछले साल दिसंबर के आखिर में TCS में 5 लाख 82 हजार 163 कर्मचारी काम कर रहे थे. इसी वजह से एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या यह छंटनी महज TCS तक सीमित है, या फिर पूरा IT सेक्टर छंटनी संकट के मुहाने बैठा है. क्या भारत का आईटी सेक्टर किसी गहरे और लंबे समय तक चलने वाले रोजगार संकट की ओर बढ़ रहा है?
जानकारों का कहना है कि टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में कर्मचारियों की संख्या घटने के पीछे घरेलू और विदेशी कारण हैं. ModxComputers के फाउंडर सार्थक शर्मा ने इंडिया टुडे से कहा कि यह कटौती अस्थायी और स्थायी दोनों तरह के बदलावों का नतीजा है. ModxComputers ग्राहकों की जरूरत के हिसाब से पर्सनल कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी है.
सार्थक ने बताया कि पिछले एक-डेढ़ साल में अमेरिका और यूरोप की कंपनियों ने टेक्नोलॉजी की मद में होने वाला अपना खर्च घटाया है. इसकी वजह महंगा कर्ज और जियो पॉलिटिकल टेंशन है. भारत की आईटी कंपनियों की करीब 70 पर्सेंट कमाई अमेरिका और यूरोप से होती है. इस वजह से टीसीएस समेत बाकी कंपनियों की कमाई पर असर पड़ा है. उन्होंने यह भी कहा कि बैंकिंग-फाइनेंस और रिटेल जैसे सेक्टर्स में बड़े पैमाने पर नई टेक्नोलॉजी पर खर्च 15 पर्सेंट से 20 पर्सेंट तक घटा है. आमतौर पर कंपनियां बड़े प्रोजेक्ट्स में अपने पूरे काम को डिजिटल बनाती हैं. फिर चाहें कोर बैंकिंग सिस्टम में बदलाव की बात हो या ऑटोमेशन लाना. कंपनियां इस तरह के बड़े प्रोजेक्ट्स अब टाल रही हैं या इन्हें हमेशा के लिए रोक दिया गया है. कई कंपनियों ने पुराने सॉफ्टवेयर अपडेट कराने और टेक्नोलॉजी पर होने वाला खर्च कम कर दिया है.
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भारत की IT कंपनियों में एट्रिशन रेट में भारी गिरावट आई है. एट्रिशन रेट के तेजी से गिरने का मतलब यह है कि अब कर्मचारी पहले की तरह नौकरी छोड़कर दूसरी कंपनियों में नहीं जा रहे हैं. कुछ साल पहले, जब IT सेक्टर काफी तेजी से आगे बढ़ रहा था और इस सेक्टर में नौकरियों की भरमार थी, उस समय कर्मचारी आसानी से बेहतर पैकेज या नए अवसरों के लिए जॉब बदल लेते थे. इसी वजह से उस समय एट्रिशन रेट काफी ज्यादा रहता था.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2021-22 में जहां एट्रिशन रेट 20-22 पर्सेंट था, जबकि 2024-25 में एट्रिशन रेट घटकर 11–13 पर्सेंट रह गया है. ModxComputers के फाउंडर सार्थक शर्मा का कहना है कि इससे ऐसी स्थिति पैदा हो गई है जहां नए कर्मचारियों की मांग बहुत कम है. इस वजह से कर्मचारियों की कुल संख्या में कमी आई है.
एंट्री-लेवल और मिड-लेवल नौकरियों पर सबसे ज्यादा मारइन बदलावों का सबसे ज्यादा असर जूनियर और मिड-लेवल कर्मचारियों पर पड़ा है. सार्थक शर्मा के मुताबिक IT सर्विस कंपनियों ने एंट्री-लेवल हायरिंग में 30 पर्सेंट से 40 पर्सेंट तक कटौती की है. उन्होंने कहा, “रोजगार पर सबसे ज्यादा नकारात्मक असर एंट्री और जूनियर लेवल पर पड़ा है. पारंपरिक तकनीकों से जुड़े मिड-लेवल इंजीनियर्स और सपोर्ट रोल्स पर भी दबाव बढ़ रहा है.”
वहीं, खास किस्म के स्किल्स वाले प्रोफेशनल्स की मांग अब भी बनी हुई है. जैसे कि क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सिक्योरिटी, डेटा इंजीनियरिंग, AI गवर्नेंस और क्लाउड आर्किटेक्चर जैसे क्षेत्रों में हायरिंग जारी है. क्लाइंट डिलीवरी और सेल्स और मार्केटिंग से सीधे जुड़े सीनियर पदों पर फिलहाल ज्यादा असर नहीं पड़ा है.
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सिर्फ TCS तक सीमित नहीं है छंटनीस्टेलर इनोवेशंस (Stellar Innovations) के वाइस प्रेसिडेंट (HR) अजीत राय ने कहा कि TCS में हो रही कटौती पूरे IT सेक्टर में चल रहे बदलाव का संकेत है. राय का कहना है कि टीसीएस में छंटनी के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका से कंपनी को कम आर्डर मिलना है. आसान भाषा में कहें तो जो अमेरिकी कंपनियां टीसीएस से अपने सॉफ्टवेयर वगैरा खरीदती थीं वह टैरिफ को लेकर अभी भी उलझन में हैं और अपने खर्चें टाल रही हैं. भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील न होने से कंपनियों में चिंता बनी हुई है.
स्टेलर इनोवेशंस के वाइस प्रेसिडेंट (HR) अजीत राय के मुताबिक, भले ही वैश्विक सुस्ती एक कारण हो लेकिन ऑटोमेशन और AI नौकरियों पर सबसे ज्यादा दबाव डाल रहे हैं. सबसे ज्यादा असर मिड-लेवल इंजीनियर्स और इससे जुड़े कर्मचारियों पर पड़ा है. उन्होंने यह भी कहा कि Infosys और Wipro जैसी आईटी कंपनियों से पिछले दो सालों में 42,000 से ज्यादा कर्मचारी बाहर हो चुके हैं.
IT सेक्टर में लंबा खिंचेगा छंटनी का ये दौरजानकारों का मानना है कि IT सेक्टर एक अस्थायी मंदी नहीं, बल्कि लंबी अवधि के बदलाव के दौर से गुजर रहा है. अजीत राय राय बताते हैं, “कंपनियां अब बड़े पैमाने पर भर्ती के दौर से बाहर आ चुकी हैं. अब फोकस मैनपावर की संख्या से ज्यादा अच्छे टैलेंट पर है.” वहीं ModxComputers के सार्थक शर्मा का मानना है कि अब सिर्फ बेसिक कोडिंग स्किल्स से नौकरी सुरक्षित नहीं रह सकती. उन्होंने कहा, “करियर को लंबा और सुरक्षित बनाने के लिए AI कोडिंग, साइबर सिक्योरिटी, डेटा एनालिटिक्स और डोमेन कंसल्टिंग में दक्षता जरूरी है.”
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Infosys की राह जुदाएक तरफ TCS ने बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की कटौती की है, वहीं इंफोसिस (Infosys) ने अलग रणनीति अपनाई है. बेंगलुरु स्थित इस IT कंपनी ने चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में 5,043 नए कर्मचारी जोड़े हैं. यह लगातार छठवीं तिमाही में हेडकाउंट बढ़ने का संकेत है. Infosys अब तक करीब 18,000 फ्रेशर्स को हायर कर चुकी है. वित्त वर्ष 2025-26 में 20,000 कर्मचारियों को ऑनबोर्ड करने के ट्रैक पर है. यह जानकारी इंफोसिस के चीफ फाइनेंस ऑफिसर (CFO) जयेश संघराजका ने दी.
वहीं जानकारों का कहना है कि आईटी सेक्टर की कंपनियों में छंटनी का ट्रेंड अस्थायी नहीं है. पहले भी कंपनियां छंटनी करती थीं लेकिन हालात सुधरने पर दोबारा भर्ती कर लेती थीं. लेकिन अब ऐसा नहीं होने वाला है. उन्होंने कहा कि कंपनियां अब ऑटोमेशन, नई टेक्नोलॉजी का पहले से ज्यादा इस्तेमाल कर रही हैं. इसका मतलब ये हुआ कि जो काम मशीनें या सॉफ्टवेयर कर सकते हैं, उनके लिए इंसानों की जरूरत खत्म की जा रही है.
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